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कहां तक जाएगा यह गलियारा
हर्ष कक्कड
Updated Thu, 29 Nov 2018 06:13 PM IST
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करतारपुर कार्यक्रम
सिख तीर्थयात्रियों के लिए प्रसिद्ध करतारपुर साहिब गुरुद्वारा जाने के लिए करतारपुर कॉरिडोर को खोलने पर पाकिस्तान की सहमति स्वागतयोग्य है, हालांकि इसे सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए। यह गुरुद्वारा अंतरराष्ट्रीय सीमा से करीब तीन-चार किलोमीटर अंदर पाकिस्तान में है। इसे खोलने की मांग दशकों से हो रही थी। भारत ने पहली बार 1988 में इसका प्रस्ताव रखा था।
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बीते 22 नवंबर को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक हुई, जिसमें कॉरिडोर के निर्माण को मंजूरी दी गई। भारत की ओर से उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने संयुक्त रूप से इसकी आधारशिला रखी। पाकिस्तान की तरफ से प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा आयोजित समारोह में भारत के दो केंद्रीय मंत्रियों के साथ नवजोत सिंह सिद्धू भी मौजूद थे। कॉरिडोर की आधारशिला रखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख की आलोचना करते हुए कहा, कौन-सी सेना संघर्षविराम का उल्लंघन कर दूसरी ओर के सैनिकों को मारती है? कौन-सी सेना अपने लोगों को भेजकर अमृतसर और पठानकोट में हमले करना सिखाती है? इसी कारण कैप्टन ने पाकिस्तान में होने वाले कॉरिडोर के शिलान्यास समारोह में शामिल होने का निमंत्रण ठुकराया। नवजोत सिद्धू के पाकिस्तानी समारोह में भाग लेने पर उनकी सहमति न होने की वजह भी यही थी।
पाकिस्तान समर्थकों के साथ जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दल भी मानते हैं कि यह शांति और कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में एक कदम होगा। नवजोत सिंह सिद्धू ने करतारपुर कॉरिडोर को 'अनंत संभावनाओं वाला गलियारा' बताया। लाहौर में उन्होंने कहा कि ऐसी पहल शांति को बढ़ावा देगी और भारत-पाकिस्तान के बीच दुश्मनी को खत्म करेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने इस कॉरिडोर की तुलना 'बर्लिन की दीवार के टूटने' से की। अपने संबोधन में इमरान खान ने आतंकवादी गुटों पर अंकुश लगाए जाने का जिक्र किए बिना एक बार फिर से वार्ता का संकेत दिया।
पाकिस्तान ने इस कॉरिडोर को खोले जाने के नतीजे का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया होगा। इसका संकेत पाक सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने दिया था, जब वह इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में सिद्धू से मिले थे। कॉरिडोर खोलने का विचार पाक सरकार की तरफ से नहीं, बल्कि वहां की सेना की तरफ से आया है। इसलिए उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी सेना प्रमुख उपस्थित थे। हाल ही में जब भारतीय तीर्थयात्री पाकिस्तान के गुरुद्वारे में गए, तो इस्लामाबाद स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास के सदस्यों को गुरुद्वारे में प्रवेश करने से रोक दिया गया और उन्हें वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्हें सुरक्षाकर्मियों ने नहीं, बल्कि कुख्यात खालिस्तान समर्थक गोपाल सिंह चावला और उसके सहयोगियों ने रोका था। चावला को हाफिज सईद और आईएसआई का करीबी माना जाता है। करतारपुर गुरुद्वारे में 'खालिस्तान जनमत 2020' के साथ चावला की तरफ से बधाई से संबंधित पोस्टर भी लगे थे, जो उद्घाटन समारोह के दौरान स्पष्ट दिख रहे थे। अक्तूबर की शुरुआत में पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि कॉरिडोर खोलने का पाक का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि उसके साथ भारत बातचीत करता है या नहीं। वह भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे। पर कुछ ही समय बाद उनका नजरिया बदल गया।
कॉरिडोर खोलने के पीछे कई उद्देश्य हैं। पहला उद्देश्य भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में सिख समुदाय के बीच अपनी छवि को बदलना है। बीती सदी के अस्सी के दशक में खालिस्तानी आतंकवाद के खात्मे के बाद पंजाब में भारी विकास हुआ है। खालिस्तानी आंदोलन को पुनर्जीवित करने के इच्छुक तत्व अब भी हैं, पर वे नियंत्रण में हैं। हाल के दिनों में पंजाब में पाकिस्तान प्रायोजित 80 से ज्यादा खालिस्तानी मॉड्यूल को ध्वस्त किया गया है। खालिस्तान के नाम पर नई भर्तियां मुश्किल हैं, लेकिन इस कदम से लोगों का दिल जीता जा सकता है। चूंकि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद धीरे-धीरे घट रहा है, इसलिए पाकिस्तान पंजाब में आतंकवाद को पुनर्जीवित करने के लिए बेताब है। पाकिस्तान भारत में शांति बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि उसे लगातार कई समूहों से लड़ना पड़ रहा है, जिसमें तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान फ्रीडम मूवमेंट (बीएफएम) शामिल हैं। अमृतसर में हुए धमाके के पीछे पाकिस्तान का हाथ होने संबंधी कैप्टन का बयान इसी तरफ इशारा करता था। पाकिस्तान जानता है कि कॉरिडोर खोलने से वे खालिस्तान समर्थक समूहों के साथ अंतरराष्ट्रीय सिख समुदाय का भरोसा जीत लेंगे। उनके माध्यम से पाकिस्तान को भारतीय सिख युवाओं का भरोसा जीतने की उम्मीद है, जिन्हें वे आतंकी गुटों में भर्ती करना चाहते हैं। जो गुरुद्वारा जाएंगे, उन्हें खालिस्तान पर पाठ पढ़ाया जाएगा और भारत को चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
अमेरिका स्थित खालिस्तान समर्थक आंदोलन सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने एक सर्कुलर जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि वह श्री गुरुनानक देव जी की 550 वीं जयंती के अवसर पर पाकिस्तान में करतारपुर साहिब सम्मेलन-2019 आयोजित करने की योजना बना रहा है। इस सम्मेलन के दौरान करतारपुर साहिब में मतदाता पंजीकरण की योजना है और जनमत संग्रह पर भी जानकारी दी जाएगी, जिसे 2020 में करने की योजना है। एसएफजे के कानूनी सलाहकार पन्नुम का कहना है कि 'करतारपुर साहिब सम्मेलन पंजाब के सिखों के साथ विदेशी सिख अलगाववादियों की पहली सभा होगा।' वह इस कॉरिडोर को 'खालिस्तान के लिए पुल' बता रहे हैं। दूसरी बात यह कि कॉरिडोर का खुलना कट्टर युवाओं की आवाजाही को आसान बनाएगा। चूंकि इस कॉरिडोर का धार्मिक महत्व है और इससे सिख समुदाय को फायदा होगा, इसलिए कोई भी सरकार इसे बाधित करने का जोखिम नहीं उठाएगी। यानी पाकिस्तान ने अपने फायदे के लिए धार्मिक कार्ड खेला है। कॉरिडोर तो खुल जाएगा, हालांकि इससे होने वाले सुरक्षा प्रभावों पर उद्घाटन से पहले विचार करने की जरूरत है। चूंकि पाकिस्तान भारतीय सुरक्षा चिंताओं पर विचार नहीं करेगा, इसलिए इसकी जिम्मेदारी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों पर रहेगी।