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पश्चिम एशिया संकट और पीएम मोदी का संदेश: एकजुटता और आत्मनिर्भरता ही देश के सबसे बड़े हथियार

Tue, 24 Mar 2026 05:56 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 24 Mar 2026 05:56 AM IST
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सार
लोकसभा में पश्चिम एशिया संकट पर प्रधानमंत्री मोदी के पहले सार्वजनिक संबोधन ने राष्ट्र की चिंताओं को ध्वनित करने के साथ ही समाधान की दिशा भी दिखाई है। ऐसे वैश्विक संकटों में एकजुटता और आत्मनिर्भरता ही देश के सबसे बड़े हथियार हो सकते हैं।
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West Asia crisis and PM Modi s message Solidarity and self reliance greatest weapons india strategy
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : ANI

विस्तार

सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) की महत्वपूर्ण बैठक के एक दिन बाद लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष पर भारत की आधिकारिक रणनीतिक स्थिति को तो स्पष्ट किया ही, इसने राष्ट्र की चिंताओं को ध्वनित करने के साथ ही समाधान की दिशा भी दिखाई है। पिछले महीने की 28 तारीख को ईरान पर अमेरिका व इस्राइल के संयुक्त हमलों से शुरू हुए इस संघर्ष ने होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग को प्रभावित किया है, जहां से दुनिया का 20 फीसदी ईंधन गुजरता है। प्रधानमंत्री का यह कहना निस्संदेह आश्वस्तकारी है कि अब हम पहले के 27 की जगह करीब 41 देशों से कच्चे तेल का आयात कर रहे हैं। लेकिन, जिस तरह से युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा, उसे देखते हुए मांग व आपूर्ति में संतुलन बनाए रखने की चुनौती जरूर होगी। इसके अतिरिक्त, इस युद्ध ने चाबहार, भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारा और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण गलियारा (आईएनएसटीसी), जैसी पश्चिम एशिया में चल रही उन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर भी संकट खड़ा कर दिया है, जिनसे भारत के हित जुड़े हैं। ऐसे में, भारत को अपने उन समझौतों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है, जिनके सफल संचालन के लिए पश्चिम एशिया में शांति अनिवार्य शर्त है। उन वैकल्पिक मार्गों की ओर मुड़ने की भी जरूरत है, जो वैश्विक संकटों में भी हमें कमजोर न पड़ने दें। भारत अपने नागरिकों को कभी अकेला नहीं छोड़ता, जो प्रवासी भारतीयों की वापसी के आंकड़ों में भी दिखता है। गौरतलब है कि करीब 3.75 लाख भारतीय अब तक सुरक्षित लौट चुके हैं, जिनमें 700 से अधिक पढ़ाई करने वाले युवा हैं। हालांकि, यह स्थिति दो मोर्चों पर चुनौती पेश कर सकती है। एक तो लौटने वालों के पुनर्वास की चुनौती होगी, और दूसरा इसके आर्थिक नुकसान भी हैं। भारत को हर वर्ष विदेश में रहने वाले भारतीयों से जितना रेमिटेंस प्राप्त होता है, उसका करीब आधा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है, जहां करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं। इसके अलावा, जिस तेजी से देश ने डिजिटलीकरण को अपनाया है, उसे देखते हुए विदेशी सर्वरों पर निर्भरता एक राष्ट्रीय जोखिम भी पैदा कर सकती है। ऐसे में, प्रधानमंत्री मोदी ने उचित ही सुरक्षा एजेंसियों को सावधान रहने का निर्देश दिया है। जैसा कि कोरोना संकट के समय में भी देखा गया था, ऐसे वैश्विक संकटों का फायदा उठाने के लिए जमाखोरों के गिरोह सक्रिय हो जाते हैं, जिन पर नियंत्रण जरूरी है। ट्रंप का पांच दिन में समझौता करने का दावा मौजूदा स्थितियों में भले ही संशयपूर्ण हो, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का संदेश साफ है कि ऐसे वैश्विक संकटों में एकजुटता और रणनीतिक स्वायत्तता ही देश के सबसे अहम हथियार हैं।
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