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आत्मनिर्भरता की छलांग: पहले स्वदेशी निजी कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 की सफलता मील का पत्थर, भारत खास देशों में शामिल
Mon, 20 Jul 2026 09:50 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 20 Jul 2026 09:50 AM IST
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भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1
- फोटो :
अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
देश के पहले स्वदेशी निजी कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण, जिसे स्काईरूट नामक एक निजी कंपनी ने तैयार किया, भारत के अंतरिक्ष अभियान में एक मील का पत्थर तो है ही, ऐसा करके भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके पास यह क्षमता मौजूद है।
दरअसल, यह ऐतिहासिक छलांग इसलिए संभव हो पाई, क्योंकि केंद्र सरकार ने वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का फैसला किया। उस एक फैसले ने अंतरिक्ष क्षेत्र की तस्वीर बदलकर रख दी। दरअसल 350 किलोग्राम तक के छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने के लिए विक्रम-1 को विशेष रूप से डिजाइन किया गया है, जिसे मांग के अनुसार कभी भी बेहद कम लागत में तेजी से लॉन्च किया जा सकता है।
जाहिर है, यह क्षमता भारत को छोटे उपग्रहों के वैश्विक बाजार में एक बड़ा खिलाड़ी बनाएगी। इससे भारत की वैश्विक बाजार पर पकड़ मजबूत होगी और दुनिया में भारतीय वैज्ञानिकों की साख और बढ़ेगी। आत्मनिर्भर भारत की मिसाल के तौर पर इस रॉकेट में पूरी तरह से कार्बन-कंपोजिट संरचना, 3डी-प्रिंटेड इंजन और स्काईरूट द्वारा विकसित अत्याधुनिक प्रणोदन प्रणालियों का उपयोग किया गया है और इसमें लगा नेविगेशन सिस्टम पूरी तरह से स्वदेशी है, जो अंतरिक्ष में रॉकेट को अपना रास्ता खुद तय करने में सक्षम बनाता है।
इसरो के साथ-साथ निजी कंपनियों के इस क्षेत्र में आने से भारत की तेजी से बढ़ रही अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा मिलेगा। इससे अनुसंधान, इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्रों में हजारों नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और विदेशी निवेश आकर्षित होगा। उल्लेखनीय है कि भारत में अब तीन सौ से अधिक निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप सक्रिय हैं, जो उन दर्जनों विकासशील देशों के लिए पसंदीदा प्रक्षेपण साझेदार भी बन सकते हैं, जो कृषि आंकड़ों, आपदा निगरानी और संचार के लिए उपग्रह पहुंच चाहते हैं।
यह केवल एक व्यावसायिक अवसर नहीं है। यह भू-राजनीतिक अवसर भी है, और विक्रम-1 की यह सफलता दर्शाती है कि भारत अब इसे जल्दी हासिल करने की स्थिति में है। भले ही भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था इस समय लगभग 8.4 अरब डॉलर की है, जो कुल वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लगभग दो प्रतिशत ही है, लेकिन सरकारी अनुमानों के अनुसार, यह आंकड़ा 2033 तक लगभग 44 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
हालांकि स्काईरूट नामक जिस निजी कंपनी ने विक्रम-1 का प्रक्षेपण किया, उसके सामने वैश्विक बाजार में स्थापित खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के अलावा अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों और बीमाकर्ताओं का भरोसा जीतने की चुनौती होगी, लेकिन फिलहाल इस प्रक्षेपण ने देश को गौरवान्वित होने का अवसर दिया है और यह आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।