Exclusive News एक्सक्लूसिव खबरें
Free E-Paper फ्री में ई-पेपर पढ़ें
ऐप डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   US Midterm Election Results relief to New Delhi as curbs on Prez Trump powers will anything change for India

अमेरिकी चुनाव नतीजे: ट्रंप की शक्तियों पर अंकुश से नई दिल्ली को कुछ राहत मिली, क्या भारत के लिए कुछ बदलेगा?

Fri, 06 Nov 2026 08:28 AM IST
Pravin Kaushal प्रवीण कौशल
Updated Fri, 06 Nov 2026 08:28 AM IST
सार

बेशक अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में ट्रंप की शक्तियों पर अंकुश लगने से नई दिल्ली को कुछ राहत मिली हो। पर, इसका यह अर्थ नहीं कि उनके पिछले फैसलों को पूरी तरह पलट दिया जाएगा। डेमोक्रेट्स के लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा। ऐसे में, दिल्ली को सावधानी बरतनी होगी।

विज्ञापन
US Midterm Election Results relief to New Delhi as curbs on Prez Trump powers will anything change for India
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के नतीजे से क्या भारत के लिए कुछ बदलेगा? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पिछले दो वर्षों से भारत को ट्रंप प्रशासन की ओर से लगातार झटके मिलते रहे हैं। इसलिए, मैं समझ सकता हूं कि बुधवार की सुबह भारत में बड़ी संख्या में लोगों को राहत और खुशी क्यों महसूस हुई। अमेरिकी मतदाताओं ने मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को करारी शिकस्त दी। पार्टी को उन सीटों से भी हाथ धोना पड़ा, जिन पर दशकों से उसका कब्जा था। ट्रंप के समर्थन से ओहियो के गवर्नर पद का चुनाव लड़ रहे विवेक रामास्वामी तो भारत में ज्यादातर लोगों का नाश्ता खत्म होने से पहले ही चुनावी दौड़ से बाहर हो गए। नतीजों के बाद ट्रंप ने सफाई दी कि वह खुद चुनाव नहीं लड़ रहे थे। हालांकि, प्रचार के दौरान उन्होंने मतदाताओं से कहा था कि इस चुनाव को ऐसा समझें, मानो वह खुद मैदान में हों।

विज्ञापन


भारत की शिकायतों की फेहरिस्त काफी लंबी है। भारतीय सामान पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया गया। नई एच-1बी वीजा याचिकाओं पर एक लाख डॉलर की फीस लगा दी गई, जिसका सबसे अधिक असर भारतीय इंजीनियरों पर पड़ा। भारत वापस भेजे गए लोगों को हथकड़ियां और बेड़ियां पहनाकर सैन्य विमान से यहां लाया गया। ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ तक बता दिया। वह बार-बार दावा करते रहे कि उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ रुकवाया है, जबकि भारत इसे लगातार खारिज करता रहा। उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने की पेशकश भी की, जबकि भारत ने किसी तीसरे देश की दखलंदाजी को हमेशा अस्वीकार किया है। इतना ही नहीं, संघर्ष समाप्त होने के कुछ ही हफ्तों बाद उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख को व्हाइट हाउस में दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया। ऐसे में, ट्रंप की शक्तियों पर अंकुश लगना स्वागतयोग्य है। लेकिन, दिल्ली में जश्न शुरू करने से पहले मैं थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दूंगा, क्योंकि किसी पर लगाम कसने का मतलब यह नहीं है कि उसके पिछले फैसलों को पूरी तरह पलट दिया जाएगा।
विज्ञापन


डेमोक्रेट्स के लिए भी ऐसा करना संभव नहीं होगा। दरअसल, भारत को प्रभावित करने वाले लगभग सभी बड़े फैसले राष्ट्रपति के अधिकारों, खासकर आपातकालीन शक्तियों के आधार पर लिए गए हैं। टैरिफ हटाने के लिए यदि कोई विधेयक पारित भी होता है, तो उसे ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजना होगा और उनके वीटो करने की पूरी आशंका है। और, वीटो को निष्प्रभावी करने के लिए जरूरी बहुमत डेमोक्रेट्स के पास नहीं है। ऐसे में, फरवरी तक टैरिफ, वीजा शुल्क और रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर दबाव बना रह सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


अगर मुझे मंगलवार से भारत को मिलने वाले सबसे बड़े फायदे का नाम लेना हो, तो वह कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा होगा। भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ईरान युद्ध शुरू होते ही वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। इसके बावजूद, भारत ने अपेक्षा से कहीं बेहतर तरीके से हालात संभाले। चुनाव नतीजे आने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई है। डॉलर कमजोर हुआ है और अमेरिकी बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज (यील्ड) भी घटा है। इससे भारत में महंगाई घट सकती है, रुपये को स्थिरता मिल सकती है और तेल आयात पर होने वाला खर्च भी कम होगा।

डेमोक्रेट्स से भारत के पक्ष में फैसलों की उम्मीद करना स्वाभाविक है, पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ होने वाला है। डेमोक्रेटिक पार्टी कभी भी मुक्त व्यापार की समर्थक नहीं रही है। रूस के मामले में भी डेमोक्रेट्स का रुख ट्रंप से कहीं अधिक सख्त है। ऐसे में, यदि कांग्रेस रूस पर और कड़े प्रतिबंध लगाने का दबाव बनाती है, तो भारतीय तेल रिफाइनरियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। वीजा के मामले में कांग्रेस भारत की मदद कर सकती है। हालांकि, एच-1बी वीजा की फीस तय करना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आता है। कांग्रेस इस फीस को राजनीतिक रूप से विवादास्पद और महंगा मुद्दा जरूर बना सकती है, लेकिन उसे सीधे रद्द नहीं कर सकती। दूसरी ओर, कंपनियां भी अब कर्मचारियों को कैलिफोर्निया बुलाने के बजाय बंगलूरू और हैदराबाद में ही नियुक्ति कर रही हैं। यह बदलाव किसी एक चुनाव के नतीजे से पलटने वाला नहीं है।

घरेलू मोर्चे पर घिरे ट्रंप के फैसले और भी जोखिम भरे हो सकते हैं। यही वह पहलू है, जो मुझे सबसे ज्यादा चिंतित करता है। जब कोई राष्ट्रपति अपने ही देश में राजनीतिक नियंत्रण खोने लगता है, तो अक्सर वह उन क्षेत्रों में अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करता है, जहां उसे अकेले फैसले लेने की छूट होती है। ट्रंप के मामले में ये क्षेत्र व्यापार और विदेश नीति हैं। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन भारत पर अपनी शर्तों के मुताबिक रुका हुआ व्यापार समझौता जल्द करने के लिए दबाव बढ़ा सकता है।

पिछले दो वर्षों में नई दिल्ली का जो रुख रहा है, वह कुल मिलाकर कारगर साबित हुआ है। भारत ने न तो कोई जवाबी कार्रवाई की और न ही दबाव के आगे घुटने टेके। उसने वाशिंगटन के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपने संबंध आगे बढ़ाए। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के साथ भी व्यापार समझौते किए। उसने जहां से भी आर्थिक रूप से फायदेमंद लगा, वहां से तेल खरीदना जारी रखा। भारत को इसी नीति पर आगे बढ़ना चाहिए। भारत किसी भी अमेरिकी राजनीतिक दल के प्रति वफादार रहने के लिए बाध्य नहीं है। अतीत में डेमोक्रेटिक प्रशासन भी भारत के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं, जबकि रिपब्लिकन भारत के लिए मददगार साबित हुए हैं। समझदारी इसी में है कि वाशिंगटन में जिसके पास भी संबंधित अधिकार या प्रभाव हो, उसके साथ हर मुद्दे पर अलग-अलग काम किया जाए, न कि किसी एक राजनीतिक दल पर दांव लगाया जाए।


अमेरिकी मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा अर्थव्यवस्था थी। पेट्रोल, रोजगार, राशन, मकान का किराया और नौकरियां उनकी प्रमुख चिंताएं थीं। उन्होंने किसी विचारधारा के विरोध में ट्रंप को नकारने का फैसला नहीं किया, बल्कि इसलिए नाराज हुए, क्योंकि ट्रंप के कार्यकाल में जीवनयापन लगातार महंगा होता गया। दूसरी ओर, सरकार टैरिफ, युद्ध और राजनीतिक लड़ाइयों में उलझी रही। मुझे लगता है कि लोगों का यह मिजाज सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। हर जगह लोग गुस्से पर आधारित राजनीति से थक चुके हैं। लोग बहुत जटिल चीजें नहीं चाहते; वे बस एक किफायती जीवन, थोड़ी सुरक्षा और कम उथल-पुथल चाहते हैं। ट्रंप को इस हफ्ते पता चल गया कि जब कोई सरकार इन बुनियादी बातों से नजर हटा लेती है, तो क्या होता है।     (लेखक तकनीकी एवं सामाजिक उद्यमी, सार्वजनिक नीति टिप्पणीकार व स्तंभकार हैं।)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed