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बाजार में एक जादू है: जो नहीं जानते कि क्या चाहते हैं, वे बाजार से लाभ नहीं उठा सकते, न ही उसे लाभ पहुंचाएंगे

Fri, 06 Nov 2026 08:20 AM IST
ज्योति भास्कर जैनेंद्र कुमार,प्रख्यात साहित्यकार।
जैनेंद्र कुमार,प्रख्यात साहित्यकार। Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 06 Nov 2026 08:20 AM IST
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सार
बाजार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है, जो जानता है कि वह क्या चाहता है और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, वे न तो बाजार से लाभ उठा सकते हैं, न ही उसे सच्चा लाभ दे सकते हैं। मालूम होता है यह भी लूं, वह भी लूं। हर सामान जरूरी और आरामदायक मालूम होता है। यह सब जादू का असर है।
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magic to market those who do not know what they want can neither derive benefit nor contribute any benefit
दिवाली पर सजे बाजार। (फाइल) - फोटो : amar ujala digital

विस्तार

यह जादू आंख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है, पर जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा है। जेब भरी हो, और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली, पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा। मन खाली है, तो बाजार की अनेकानेक चींजों का निमंत्रण उस तक पहुंच जाएगा। कहीं उस वक्त जेब भरी हो, तब तो फिर वह मन किसकी मानने वाला है! मालूम होता है, यह भी लूं, वह भी लूं। हर सामान जरूरी और आरामदायक मालूम होता है। यह सब जादू का असर है।



जादू की सवारी उतरी कि पता चलता है कि फैंसी चीजों की बहुतायत आराम में मददगार नहीं होतीं, बल्कि खलल ही डालती हैं। थोड़ी देर को स्वाभिमान को जरूर सेंक मिल जाता है, पर इससे अभिमान की गिल्टी को और खुराक ही मिलती है। जकड़ रेशमी डोरी की हो, तो रेशम के मुलायम स्पर्श के कारण क्या वह कम जकड़ होगी? पर, उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ, तो मन खाली न हो। मन खाली हो, तब बाजार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो, तो पानी पीकर जाना चाहिए।


पानी भीतर हो, लू का लू-पन व्यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्य में भरा हो, तो बाजार भी फैला-का-फैला ही रह जाएगा। तब वह घाव बिल्कुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाजार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे। मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा। शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है, जो सनातन भाव से संपूर्ण है। इससे मन बंद नहीं रह सकता।

मन को बंद कर रखना जड़ता है। लोभ को जीतना यह नहीं है कि जहां लोभ होता है मन में, वहां नकार हो! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आंख अपनी फोड़ डाली, तब लोभनीय के दर्शन से बचे, तो क्या हुआ? ऐसे क्या लोभ मिट जाएगा? और कौन कहता है कि आंख फूटने पर रूप दिखना बंद हो जाएगा? क्या आंखें बंद करके हम सपने नहीं देखते हैं? और वे सपने क्या चैन-भंग नहीं करते हैं? इससे मन को बंद कर डालने की कोशिश तो अच्छी नहीं।

ऐसे लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। ऐसे बाजार मानवता के लिए विडंबना हैं और जो ऐसे बाजार का पोषण करता है, वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।

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