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वर्षगांठ: विडंबनापूर्ण घटनाओं के बीच संयुक्त राष्ट्र के वादे-इरादे, विश्वास के संकट में वैश्विक संस्था

Fri, 26 Sep 2025 07:14 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Fri, 26 Sep 2025 07:14 AM IST
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सार
संयुक्त राष्ट्र अपने वर्तमान स्वरूप में आधुनिक चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले लोकतंत्र और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को शामिल न करना सुरक्षा परिषद की संदिग्ध वैधता का प्रमाण है। इसे खुद को प्रासंगिक बनाने के लिए चिंतन और पुनर्रचना करनी होगी।
 
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UN promises and intentions face a crisis of trust Amid ironic events
यूएन। - फोटो : ANI

विस्तार

सैमुअल बेकेट ने अपनी पुस्तक वेटिंग फॉर गोदो में अस्तित्व की निरर्थकता पर बहुत ही गहरे शब्दों में लिखा है कि ‘हम हमेशा कुछ न कुछ ऐसा ढूंढ ही लेते हैं, जिससे हमें यह आभास होता है कि हम मौजूद हैं।’ लगता है कि ये ज्ञानवर्धक शब्द संयुक्त राष्ट्र की बढ़ती अप्रासंगिकता को परिभाषित करने के लिए लिखे गए हो सकते हैं, जो अपनी 80वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस वर्ष की महासभा का विषय ‘बेटर टुगेदर: एट्टी ईयर्स एंड मोर फॉर पीस, डेवलपमेंट एंड ह्यूमन राइट्स’ वास्तविक दुनिया में खो गए उच्च आदर्शों का मिश्रण है।


घटनाओं का यह क्रम संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता के संकट को दर्शाता है। पिछले हफ्ते मंगलवार को, संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने कहा कि इस्राइल ने गाजा में फलस्तीनियों का नरसंहार किया है। गुरुवार को 14:1 के मत के बावजूद संयुक्त राष्ट्र मूकदर्शक बना रहा, जब अमेरिका ने ‘गाजा में तत्काल, बिना शर्त और स्थायी युद्ध विराम तथा सभी बंधकों की तत्काल, सम्मानजनक और बिना शर्त रिहाई’ के प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया। गाजा में इस्राइल का युद्ध 700 दिनों से भी ज्यादा पुराना है। गाजा के ध्वस्त होने के साथ ही मानवता पर इसका बहुत ज्यादा असर पड़ा है-एक अंतहीन युद्ध में बंधकों और दस लाख फलस्तीनियों को बंधक बनाकर रखा गया है।


संयुक्त राष्ट्र में विडंबनापूर्ण घटनाएं साफ दिखाई दे रही हैं। बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, पुर्तगाल, कनाडा, मोनाको, माल्टा और लक्जमबर्ग ने भी ब्रिटेन और फ्रांस के साथ फलस्तीनी राज्य को मान्यता दे दी है। हालांकि, फलस्तीनी राष्ट्र के प्रमुख महमूद अब्बास संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल नहीं हो पाएंगे, क्योंकि अमेरिका ने उनका वीजा रद्द कर दिया है। शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने फलस्तीनी राष्ट्रपति को अपना आभासी भाषण देने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। इस बीच, सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा, जिन्हें कभी अमेरिका ने आतंकवादी घोषित किया था, न्यूयॉर्क में अमेरिका का मेहमान बने हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध संयुक्त राष्ट्र की विफलताओं का महज एक उदाहरण है। दुनिया भर में आम धारणा है कि संयुक्त राष्ट्र में संघर्ष कभी खत्म नहीं होते।

रूस-यूक्रेन युद्ध 1,300 दिनों से भी ज्यादा समय से चल रहा है। हजारों लोगों की मौत के बाद संयुक्त राष्ट्र ने कई प्रस्ताव पारित किए, जिनमें से एक प्रस्ताव सुरक्षा परिषद द्वारा फरवरी में पारित किया गया, जिसमें संघर्ष को ‘शीघ्र समाप्त करने की प्रार्थना’ की गई। सितंबर 2025 में, रूसी ड्रोन पोलैंड में घुस आए और उसके लड़ाकू विमान एस्टोनियाई वायुक्षेत्र में मंडराते रहे, जिससे आशंकाएं और बढ़ गईं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद एक इसके उद्देश्य को रेखांकित करता है-अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, और इसके लिए प्रभावी सामूहिक उपाय करना। युद्ध रोकने के मामले में संयुक्त राष्ट्र का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है। सीरिया में युद्ध 2011 में शुरू हुआ, यमन में 2014 में और लीबिया में संघर्ष 2014 से जारी है। 2025 में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छिड़े हुए हैं और विभिन्न देश क्षेत्रीय सुरक्षा गुटों की मदद ले रहे हैं।

अपने उपन्यास द प्लेग में, अल्बर्ट कामू ने लिखा था कि लोग कहते हैं कि युद्ध मूर्खतापूर्ण है, अधिक समय तक नहीं चल सकता, लेकिन मूर्खता अपना रास्ता निकालने में माहिर होती है। संयुक्त राष्ट्र के संकोच ने दशकों से इसे पुष्ट किया है। संयुक्त राष्ट्र अपनी संरचना के कारण ही विफल है। महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव निष्प्रभावी हैं, कायरता दर्शाते हैं, और जिस संस्था की निंदा की गई, उस पर कोई प्रभाव नहीं डालते। सुरक्षा परिषद की संरचना वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले लोकतंत्र और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को इसमें शामिल न करना सुरक्षा परिषद की संदिग्ध वैधता का प्रमाण है। दरअसल, भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील दो दशकों से भी ज्यादा समय से बदलाव के लिए अभियान चला रहे हैं। अफ्रीका या दक्षिण अमेरिका का इसमें कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

इस बीच पी-5 के सदस्यों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन) ने बहुपक्षवाद को खत्म करने के लिए वीटो को हथियार बना लिया है, जो गाजा और यूक्रेन में हत्याओं के रूप में स्पष्ट है।

संयुक्त राष्ट्र की विफलता केवल युद्धों को रोकने तक ही सीमित नहीं है। इसके संगठनों का समूह मुद्दों को उठाता है और ज्यादातर आक्रोश ही व्यक्त करता है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती इसकी निष्क्रियता पर पनप रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की स्थापना 1988 में हुई थी, फिर भी पेरिस समझौते और दो दर्जन से अधिक कॉप शिखर सम्मेलनों के बावजूद ग्लेशियर पिघल रहे हैं और वैश्विक उत्सर्जन तथा चरम मौसमी घटनाएं तबाही मचा रही हैं। विस्थापितों की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए 1951 में स्थापित अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन वैश्विक दृष्टिकोण को प्रकट करने के लिए जूझ रहा है और यूरोप तथा अन्य जगहों पर अपनाई जा रही जबर्दस्ती की रणनीतियों का मूक दर्शक बना हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति आतंकवाद की सार्वभौमिक परिभाषा पर आम सहमति नहीं बना पाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, अपनी मंशा और क्रियान्वयन के लिए जूझ रहा है-इसने कोविड की उत्पत्ति पर अपनी रिपोर्ट में अस्पष्टता बरती, और महामारी के पांच साल बाद भी चीन से ब्योरे पाने में विफल रहा, और अब तक रोकथाम पर सार्वभौमिक दृष्टिकोण तैयार नहीं कर पाया है।

इसके महत्वाकांक्षी सहस्राब्दी विकास लक्ष्य, जो 2015 के लिए निर्धारित थे, 2030 के लक्ष्यों में बदल गए। अब तक इन लक्ष्यों की उपलब्धियों का रिकॉर्ड अधूरा है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की नाकामियां भी स्पष्ट हैं। निश्चित ही एक वैश्विक निकाय जरूरी है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपने वर्तमान स्वरूप में आधुनिक चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता है। फ्रांत्स काफ्का के द कैसल के हवाले से कहें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र ने केवल ताकतवर देशों के हितों की रक्षा की है। 80 वर्ष पूरे होने के बावजूद यह आशा के इतिहास में एक फुटनोट बनकर रह गया है। इसे अपने संचालन तंत्र को प्रासंगिक बनाने के लिए चिंतन और पुनर्रचना करनी होगी।
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