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कटघरे में ट्रंप की नीतियां: अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार मनमाने फैसले ले रहे हैं, क्या हेनरी किसिंजर सही थे?

Fri, 03 Oct 2025 04:31 AM IST
Surendra Kumar सुरेंद्र कुमार
Updated Fri, 03 Oct 2025 04:31 AM IST
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सार
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जिस मनमाने ढंग से भारत के खिलाफ लगातार फैसले ले रहे हैं, उससे दशकों में विकसित विश्वास और गर्मजोशी पर आधारित बहुआयामी संबंधों को नुकसान पहुंच रहा है। इससे यह भी जाहिर हो रहा है कि उनके लिए रणनीतिक तालमेल नहीं, केवल व्यापार अधिशेष ही मायने रखता है।
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Trump policies in dock US President taking arbitrary decisions was Henry Kissinger right know us politics
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल) - फोटो : PTI

विस्तार

जब हेनरी किसिंजर ने लिखा था कि 'अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक है', तो भारत में शायद ही किसी ने इस पर ध्यान दिया। उन्होंने कंधे उचकाकर इसे खारिज करते हुए कहा कि यह हम पर लागू नहीं हो सकता, कोई भी हम पर अमेरिका का दुश्मन होने का आरोप नहीं लगा सकता। चूंकि हम कभी अंकल सैम के अच्छे दोस्त नहीं रहे, इसलिए हेनरी किसिंजर के कथन का दूसरा हिस्सा हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता! लेकिन, फरवरी 2025 से डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के भारत-विरोधी फैसलों, उनके बोलने के तरीके और इस्तेमाल भाषा ने भारतीयों को नींद से जगा दिया है। दो सौ वर्षों के शोषणकारी ब्रिटिश शासन से आजादी मिलने के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और संवर्धन हेतु अंतरराष्ट्रीय संबंधों की एक नई रणनीति तैयार की, जिसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन कहा गया। शीत युद्ध के दौरान इसने हमारे लिए बहुत काम किया।



संक्षेप में, यह आज की बहुप्रचारित सामरिक स्वायत्तता का अग्रदूत था। भारत को साम्यवादी सोवियत संघ का अनुयायी मानते हुए अमेरिका ने कुछ अवसरों को छोड़कर कभी कोई सहायता नहीं दी। ये अवसर थे- 1962 के चीनी आक्रमण के बाद राष्ट्रपति कैनेडी ने सैन्य उपकरण और अन्य जरूरतों की आपूर्ति के लिए शीघ्रता से प्रतिक्रिया दी, यह अनुरोध नेहरू ने हिचकते हुए किया था और तत्कालीन अमेरिकी राजदूत केनेथ गैलब्रेथ ने इसका जोरदार समर्थन किया था, तथा विवादास्पद पीएल 480, जिसने खाद्यान्न की आपूर्ति को सुगम बनाया और जिससे लाखों लोगों की जान बच गई। भारत की हरित क्रांति में अमेरिकी कृषि वैज्ञानिकों का योगदान भी सराहनीय है। 


भारत-अमेरिका संबंध 1971 में तब सबसे खराब स्थिति में पहुंच गए, जब निक्सन-किसिंजर की जोड़ी ने लोकतांत्रिक भारत का समर्थन करने के बजाय पाकिस्तानी सैन्य तानाशाह जनरल याह्या खान का साथ दिया। यही नहीं, अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया। इससे यह उजागर हुआ कि लोकतंत्र में अमेरिका का विश्वास और मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता कितनी खोखली थी। सोवियत संघ के पतन और 1991-92 में विदेशी निवेश को आमंत्रित करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था के खुलने से स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। अचानक, अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भारत को अपने उत्पादों के लिए एक विशाल बाजार और लाभदायक निवेश स्थल के रूप में देखना शुरू कर दिया। डॉ. मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी, दोनों ने आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को व्यापक बनाया। लेकिन मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा लगाए गए सबसे कड़े प्रतिबंधों से भारत को जोरदार झटका लगा। विडंबना यह है कि मार्च 2000 में वही 21 वर्षों में भारत की यात्रा करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने और प्रधानमंत्री वाजपेयी के साथ मिलकर उन्होंने अमेरिका और भारत के बीच घनिष्ठ संबंधों की संस्थागत नींव रखी।

तब से, पीछे मुड़कर नहीं देखा गया। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार में तेजी से वृद्धि देखी है, जिसमें भारत द्वारा रक्षा और ऊर्जा आयात, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद तथा बाह्य अंतरिक्ष सहित सुरक्षा में सहयोग, द्विपक्षीय निवेश और लगभग तीन दर्जन मिशनों में परस्पर लाभकारी सहयोग शामिल हैं, जो बेहद विविध क्षेत्रों को कवर करते हैं। भारतीय प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बीच बेहतर तालमेल से यह धारणा बनी कि वाशिंगटन और नई दिल्ली में सत्ता परिवर्तन के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों को विस्तारित और गहरा करने के लिए दोनों देशों में द्विदलीय सहमति थी। इसी सकारात्मक भावना के साथ अमेरिका ने हिंद-प्रशांत, क्वाड, आई2यू2, आईएमईसी और अन्य क्षेत्रीय समूहों में भारत की उपस्थिति की मांग की। कई टिप्पणीकारों का मानना था कि भारत-अमेरिका संबंध पहले कभी इतने अच्छे नहीं रहे!

इसलिए जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को टैरिफ किंग कहा, तो हम ज्यादा चिंतित नहीं हुए। लेकिन जब उन्होंने भारतीय निर्यात पर कुल 50 फीसदी टैरिफ लगाया, तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। ट्रंप के सलाहकारों और कैबिनेट सहयोगियों द्वारा भारत के खिलाफ अत्यंत असभ्य भाषा में, रूसी तेल खरीदकर यूक्रेनी संघर्ष को लंबा खींचने का आरोप लगाने से अमेरिका के खिलाफ भारतीय जनमत और अधिक नाराज हो गया। एक सितंबर से एच1बी वीजा शुल्क बढ़ाकर 100,000 अमेरिकी डॉलर कर दिए जाने से इन घोर भेदभावपूर्ण शुल्कों का प्रतिकूल प्रभाव और भी बढ़ गया है, जिससे एच1बी वीजा धारकों में अनावश्यक घबराहट पैदा हो गई है। हालांकि बाद में यह सफाई दी गई कि नई शुल्क व्यवस्था केवल नए वीजा आवेदकों पर लागू होगी, जिसने चिंता को थोड़ा कम किया होगा, लेकिन इसका औचित्य समझ में नहीं आ रहा है। एलन मस्क और बिल गेट्स, दोनों ने एच1बी वीजा का समर्थन किया है। उनकी कंपनी समेत कई अमेरिकी कंपनियों को एच1बी वीजा धारकों से लाभ हुआ है। 70 फीसदी एच1बी वीजा धारक भारतीय तकनीकी विशेषज्ञ हैं। इससे टाटा कंसल्टेंसी और विप्रो को नुकसान हो सकता है, लेकिन लंबे समय में नया शुल्क अमेरिकी तकनीकी बढ़त और नवाचारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। 

भारत-अमेरिका संबंधों की वर्तमान स्थिति की कटु सच्चाई हाल ही में ट्रंप और मोदी के बीच हुए अभिवादन के आदान-प्रदान से बिल्कुल उलट है। मुनीर की पिछली यात्रा के बाद व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और जनरल मुनीर का स्वागत भारत ने देखा है। ट्रंप वैश्वीकरण, बहुध्रुवीयता, बहुपक्षवाद, जलवायु परिवर्तन समझौतों, विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, ब्रिक्स और संयुक्त राष्ट्र के खिलाफ हैं। उनके लिए रणनीतिक तालमेल का कोई महत्व नहीं है, केवल व्यापार अधिशेष ही मायने रखता है। भारतीयों को इस बात का कोई पता नहीं है कि ट्रंप भारत के खिलाफ क्यों शिकंजा कस रहे हैं, जिससे पिछले 25 वर्षों में परिश्रमपूर्वक विकसित किए गए विश्वास, गर्मजोशी और पारस्परिक रूप से लाभकारी बहुआयामी संबंधों को नुकसान पहुंच रहा है। क्या अपने वैश्विक, व्यापक, रणनीतिक साझेदार के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिए? यदि अमेरिका का घनिष्ठ मित्र होने का यही पुरस्कार है, तो हेनरी किसिंजर सही थे! 

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