शहरीकरण की 'अंधाधुन' और बारिश में जलजमाव: मुसीबतों की बाढ़, कार्रवाई का सूखा
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विस्तार
मानसून अभी-अभी आया है और धीरे-धीरे बढ़ रहा है। हालांकि, इस साल मानसून से पहले की बारिश में ही शहरी भारत में बाढ़ आ गई है, जो हर साल आने वाले बुरे सपनों की याद दिलाती है। मुंबई से लेकर गुवाहाटी और बंगलूरू से लेकर गुरुग्राम तक भारत के शहरों में यह नजारा साफ दिखाई देता है। शहरी भारत में लगभग 150 लोकसभा क्षेत्र हैं और यहां लगभग 55 करोड़ नागरिक रहते हैं। शहरों में भूमि क्षेत्र का तीन फीसदी हिस्सा है और वे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 60 फीसदी से अधिक का योगदान करते हैं। वे आर्थिक गतिशीलता के महत्वपूर्ण प्रवर्तक हैं-चाहे वह वस्तुओं का उत्पादन हो या उपभोग, या सेवाओं और रोजगार का एक बड़ा हिस्सा। शहरी भारत करों में भी एक बड़ा हिस्सा देता है। फिर भी, शहरी भारत को परेशानियों की बाढ़ और कार्रवाई के सूखे का सामना करना पड़ रहा है।
भारत की 'सिलिकॉन वैली' बंगलूरू को ही लें। 10 सेंटीमीटर बारिश के बाद बाढ़ ने इसकी गति रोक दी। आईटी पार्क और प्रौद्योगिकी कंपनियों तक पहुंचने के रास्ते जलमग्न हो गए, जिससे कर्मचारियों को घर से काम करने के निर्देश दिए गए। नतीजतन सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। बेसमेंट में फंसे लोगों और कारों को बचाने के लिए नावों और डंपरों की तस्वीरें और टिप्पणियां सामने आईं। नतीजतन, सरकार बेसमेंट में पार्किंग पर प्रतिबंध लगा रही है। भारत की व्यापारिक राजधानी मुंबई में, पश्चिमी उपनगरों में बाढ़ के लिए मशहूर अंधेरी सबवे को बंद कर दिया गया। दक्षिण मुंबई में, शहर को प्रभावित करने वाली प्रणालीगत सुस्ती का प्रतीक बोरा बाजार में आई बाढ़ थी, जहां ठेकेदार जल निकासी की व्यवस्था करना ‘भूल गए’ थे। स्मार्ट सिटी पुणे में, जो स्टार्टअप का प्रमुख केंद्र और वैश्विक क्षमता केंद्रों का गंतव्य है, आईटी कॉरिडोर और हवाई अड्डे के पास नए आवासों तक पहुंचने की सड़क एक घंटे की बारिश के बाद बाढ़ में डूब गई।
वर्ष 2015 के बाद से इस बार सबसे अधिक बारिश वाली गर्मियां रही हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, जहां त्रिस्तरीय शासन व्यवस्था है-नगर निगम, राज्य और केंद्र और तीनों में एक ही दल का शासन है, हर साल बाढ़ में डूबी रहती है। इस हफ्ते दिल्ली के मोती बाग, दिल्ली छावनी और दीनदयाल उपाध्याय मार्ग जैसे इलाकों में बारिश के कारण नए और पुराने इलाकों में पानी भर गया। इस महीने की शुरुआत में कनॉट प्लेस, सदर बाजार और कमला नगर में कुछ घंटों की बारिश के बाद जलजमाव हो गया था। आश्वासनों के बावजूद, आजाद मार्केट और मिंटो रोड अंडरपास जैसे इलाकों में जीवन और आजीविका जलमग्न हो गई। गुरुग्राम में करोड़ों रुपये की लागत वाले घरों के बेसमेंट में सीवर का पानी घुस गया।
आश्चर्य की बात नहीं है कि शहरी भारत हर साल एक तरह की देजा वू की स्थिति (ऐसी भावना, जब आपको लगता है कि यह स्थिति पहले भी आ चुकी है) और गुस्से की भावना से घिरा रहता है। हर साल उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के शहरी लोगों का बारिश और बाढ़ के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और उनकी आय बाधित हो जाती है। तथ्य यह है कि भारत में शहरी विकास आवास और वाणिज्यिक स्थानों का एक अनियोजित अमीबा सरीखा विस्तार है। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की 2021 की एक रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भारतीय शहरों में बाढ़ जैसी स्थितियों की वजह अनधिकृत निर्माण क्षेत्र है, जो बिना लेआउट बनाए और मंजूरी के हुआ है।’
बाढ़ की समस्या नीतियों और जल निकासी जैसी सुविधाओं के खराब नवीनीकरण का नतीजा है। इसमें कचरा प्रबंधन की अपर्याप्तता, गाद निकालने की खराब व्यवस्था, शहरी स्थानीय निकायों की अक्षमता को भी जोड़ा जा सकता है। वर्ष 2014 में भाजपा के घोषणापत्र में 100 नए शहरों के निर्माण का वादा किया गया था, जिसे जून 2015 में स्मार्ट सिटी के वादे में बदल दिया गया। इसका उद्देश्य ऐसे शहरों को बढ़ावा देना था, जो समृद्ध बुनियादी ढांचा, स्वच्छ व टिकाऊ वातावरण प्रदान करते हैं, और ‘स्मार्ट समाधानों’ के अनुप्रयोग के माध्यम से नागरिकों को गुणवत्ता वाला जीवन प्रदान करते हैं। स्मार्ट सिटीज मिशन (एससीएम) में 100 शहरों को शामिल किया गया। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, 1,64,545 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली 8,063 परियोजनाएं शुरू की गईं और 1,50,306 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली 7,504 परियोजनाएं पूरी हुईं। जाहिर है, इसमें बाढ़ रोकने के लिए बुनियादी ढांचे का प्रावधान होना चाहिए था, पर शहरों में बाढ़ आना जारी है।
एससीएम को अमृत नामक एक अन्य योजना द्वारा पूरक बनाया गया, जिसे 2015 में 500 शहरों और कस्बों को शामिल करने के लिए शुरू किया गया था। इसका भी उद्देश्य बुनियादी ढांचे का विकास था। इसमें जल आपूर्ति, सीवेज और सेप्टेज प्रबंधन, बाढ़ को कम करने के लिए तूफानी जल निकासी, सार्वजनिक परिवहन और सुविधाओं में वृद्धि पर बल दिया गया। लेकिन इसकी भी सफलता अस्पष्ट है। जरूरत और क्रियान्वयन के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। विश्व बैंक की 2022 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत को बढ़ती शहरी आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने शहरी बुनियादी ढांचे पर 15 वर्षों में 840 अरब डॉलर खर्च करने की आवश्यकता होगी। समस्या सिर्फ संसाधनों की ही नहीं है। 2014 के बाद से एक दशक में सरकार का कुल व्यय 17.94 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 50.65 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जबकि जीडीपी दोगुनी से ज्यादा हो गई है।
राजनीतिक इरादे की कमी के कारण स्थिति और भी खराब है। शासन की संरचना शहरी शासन को कमजोर बनाती है। संविधान के 74वें संशोधन का वादा (केंद्र और राज्यों से स्थानीय सरकारों को धन और कार्यों का हस्तांतरण) पच्चीस वर्षों से ज्यादा समय में कानूनी तौर पर सिमट कर रह गया है। स्थानीय निकाय राज्यों के उपनिवेश हैं, ठीक उसी तरह जैसे राज्य केंद्र के उपनिवेश हैं। शहरीकरण रोजगार, आय और विकास को बढ़ाने वाला एक परखा हुआ उपाय है। दुर्भाग्य से मुफ्त में मिलने वाले वोटों के लिए पूर्वाग्रह के चलते शहरी भारत से सौतेला व्यवहार होना जारी है।