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संतुलन की दरकार: भ्रष्टाचार जांच बनाम अफसरों की सुरक्षा

Fri, 16 Jan 2026 07:12 AM IST
देवेश त्रिपाठी विनीत नारायण, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता
विनीत नारायण, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Fri, 16 Jan 2026 07:12 AM IST
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सार
हाल ही में शीर्ष न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए की सांविधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला दिया, जिसे बड़ी पीठ को भेज दिया गया है। बड़ी पीठ को ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचा की रोकथाम, दोनों सुनिश्चित करना चाहिए।
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supreme court divided on constitutional validity of section 17a of pc act corruption investigation debate
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 17ए की सांविधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला सुनाया है। 13 जनवरी, 2026 को न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय व्यक्त की, जिसके परिणामस्वरूप मामला मुख्य न्यायाधीश के पास बड़ी पीठ के गठन के लिए भेज दिया गया। यह फैसला सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की मंजूरी देने से संबंधित है, जो भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।


2018 के संशोधन के माध्यम से अधिनियम में जोड़ी गई धारा 17ए जांच एजेंसियों को किसी भी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, पूछताछ या अन्वेषण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति पाने का आदेश देती है। इस प्रावधान का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध या अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण प्रदान करता है। भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और जांच को जटिल बनाने वाले ऐसे प्रावधान लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर सकते हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असांविधानिक बताते हुए कहा कि यह जांच एजेंसियों के हाथ बांधती है और भ्रष्टाचारियों को पूर्व चेतावनी देकर सबूत नष्ट करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने तर्क दिया कि इसने जांच की ‘आकस्मिकता’ को समाप्त कर दिया है, जो भ्रष्टाचार के मामलों में आवश्यक है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि यह लोक सेवकों को अनावश्यक जांच से बचाता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इस मतभेद ने एक बार फिर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर बहस छेड़ दी है।


2018 से पहले, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में जांच के लिए पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी, केवल अभियोजन के लिए धारा 19 के तहत मंजूरी जरूरी थी। लेकिन 1990 के दशक में, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। ऐतिहासिक रूप से, 1998 का एक फैसला मील का पत्थर है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए निर्देश दिया कि उच्च अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने ‘सिंगल डायरेक्टिव’ को असांविधानिक घोषित किया, जो कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए सरकारी अनुमति मांगता था। इस फैसले ने भ्रष्टाचार विरोधी जांच को मजबूत किया और राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने का प्रयास किया।

हालांकि, 2003 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपीई एक्ट) में धारा 6ए जोड़ी गई, जो संयुक्त सचिव स्तर से ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए केंद्र की पूर्व अनुमति अनिवार्य बनाती थी। यह प्रावधान भी विवादास्पद रहा। 2014 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6ए को असांविधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह अधिकारियों के बीच भेदभाव करती थी और समानता के अधिकार का उल्लंघन करती थी। कोर्ट ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार जांच में सभी को समान रूप से जवाबदेह होना चाहिए, चाहे उनका पद कितना भी ऊंचा हो। इस फैसले ने जांच एजेंसियों को अधिक स्वायत्तता दी, लेकिन सरकार ने 2018 में पीसी एक्ट में संशोधन कर धारा 17ए पुनः पेश की, जो सभी लोक सेवकों पर लागू होती है और पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाती है।

हालिया खंडित फैसले से पहले भी धारा 17ए पर विवाद हुए हैं। 2023 में ‘सीबीआई बनाम आरआर किशोर’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2018 के संशोधन पूर्वव्यापी नहीं हैं, अर्थात पहले के अपराधों पर लागू नहीं होंगे। लेकिन 2024 में चंद्रबाबू नायडू मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ का खंडित फैसला आया, जहां न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने धारा 17ए को प्रक्रियात्मक मानकर पूर्वव्यापी प्रभाव दिया, जबकि न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने इसे मूलभूत मानकर अस्वीकार किया। यह मामला भी बड़ी पीठ को भेजा गया।

स्पष्ट है कि धारा 17ए ने जांच प्रक्रिया को जटिल बनाया है, जिससे कई भ्रष्टाचार के मामले लंबित हो गए हैं। मसलन, लोकपाल और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने शिकायत की है कि पूर्व अनुमति की प्रक्रिया में देरी से भ्रष्टाचारियों को फायदा होता है। इस प्रावधान के पक्ष में केवल यही तर्क है कि यह ईमानदार अधिकारियों को बचाता है।

भारत में राजनीतिक प्रतिशोध के कई उदाहरण हैं, जहां जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने अपने फैसले में कहा कि धारा 17ए निर्णय लेने की प्रक्रिया में साहस प्रदान करती है और अनावश्यक जांच से बचाती है। वहीं इसके विपक्ष में, न्यायमूर्ति नागरत्ना का मत है कि यह प्रावधान भ्रष्टाचारियों को सबूत मिटाने का मौका देता है, जो 1998 के फैसले के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

अतीत के मामलों से सीखते हुए, हम देखते हैं कि पूर्व अनुमति जैसे प्रावधान अक्सर राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बन जाते हैं। नब्बे के दशक के हवाला कांड में, जांच में देरी ने कई आरोपियों को बचा लिया था।

इस विभाजित फैसले के गहरे प्रभाव भी हैं। यदि बड़ी पीठ धारा 17ए को असांविधानिक घोषित करती है, तो भ्रष्टाचार जांच तेज होगी, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसे संगठनों की मांग के अनुरूप है। लेकिन इससे राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है, जैसा कि हाल के ईडी और सीबीआई मामलों में देखा गया। यदि इसे बरकरार रखा जाता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, क्योंकि अनुमति लेने में महीनों लग सकते हैं। भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत 85वें स्थान पर है। इसलिए ऐसे कानूनों की जरूरत है, जो जांच को सुगम बनाएं।

गौरतलब है कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की मांग करता है। ऐसे ऐतिहासिक फैसलों ने जांच की स्वतंत्रता पर जोर दिया है और हालिया खंडित फैसला इसी दिशा में एक कदम है।
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को इस पर विचार करते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार की रोकथाम, दोनों को सुनिश्चित करना चाहिए। भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जांच प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए, ताकि न्याय की जीत हो।
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