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आरंभ और अंत

Wed, 15 Nov 2017 06:44 PM IST
कुंवर नारायण
कुंवर नारायण Updated Wed, 15 Nov 2017 06:44 PM IST
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Start and end
कुंवर नारायण

लगभग एक किताब की तरह समाप्ति पर है अब बीसवीं सदी। इसके अंतिम दशक को हम किसी महागाथा के अंतिम परिच्छेद की तरह पढ़ सकते हैं। उत्तर-उपनिवेशवाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-मार्क्सवाद- मानो एक उत्तर-कथन में पूरी सदी अपना सार-संक्षेप दे रही हो ः पुराने अनुबंधों से छूटकर हम अब एक ऐसी जगह खड़े हैं, जहां से कई नई राहें फूटती हैं और हम सहसा तय नहीं कर पा रहे कि हमारे लिए कौन-सा रास्ता ठीक होगा। संकट, दिशाहीनता का उतना नहीं, जितना शायद ढेरों विकल्पों में से किसी एक या दो को चुनने का है। आसान फैसला तो यही जान पड़ता है कि जिधर सब जा रहे, हम भी उसी तरफ चलें! सब अगर पश्चिम के पीछे-पीछे या इर्द-गिर्द चल रहे तो सबके साथ चलने का मतलब अब न तो सिर्फ पश्चिम रह गया है, न सबके साथ चलने का अर्थ सबकी तरह हो जाना है। साहित्य की चिंता वैसे भी सही फैसले की चिंता है, जो हमें एक ज्यादा बड़े चिंतन-क्षेत्र में ले जाती है ः जहां हम मनुष्य के कल्याण और समृद्धि के अर्थ को केवल भौतिक नहीं, उससे बड़े परिप्रेक्ष्य में सोचते हैं।


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कलाएं और साहित्य हमारे जीवन को जिस स्तर पर एकता और पूर्णता का आभास कराते हैं, उसे मात्र रोजमर्रा की जरूरतों की भाषा में नहीं व्याख्यायित किया जा सकता। आपसी संबंधों के गहरे जैविक स्रोतों को हम उस तरह नहीं समझ सकते, जैसे हम चीजों के साथ आदमी के रिश्तों को सोचते-समझते हैं। जीवन-बोध, केवल वस्तुगत नहीं, चेतना-सापेक्ष होता है और साहित्य की निगाह दोनों पर रहती है।
इस सदी में हमारे जीवन, विचारों और धारणाओं पर विज्ञानसम्मत शब्दावली और उसकी चिंतन-पद्धति का व्यापक असर रहा है। कुछ शब्द हैं, जिनका जादुई प्रभाव हमारे सोचने के ढंग को निर्देशित करता रहा है। आधुनिकता, तकनीक, प्रगति, प्रयोग, क्रांति, संघर्ष, बहिर्मुखता जैसे शब्दों में विज्ञान की स्पष्ट ध्वनियां हैं और साहित्य ही नहीं, तमाम अन्य विषयों की भाषा में भी घुली-मिली हैं। इनके बिना किसी भी नए विचार को परिभाषित करना मुश्किल हो जाता है। यह दिलचस्प बात है कि इस सदी के दो सबसे प्रभावशाली आंदोलन- आधुनिकता और मार्क्सवाद- सारे मतभेदों के बावजूद, इस मायने में एक हैं कि बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दुहाई दिए वे अपनी-अपनी वैधता सिद्ध नहीं कर पाते! ये शब्द, या इसी तरह के विज्ञान-प्रेरित शब्द हमारी बुद्धि और कल्पना पर लगभग एक अंधविश्वास की सीमा तक हावी रहे हैं।

इस धुन के पीछे, निस्संदेह एक बेहतर जीवन जीने या जी पाने की चिरंतन लालसाएं और आशाएं रहती हंै, जिनके बहुरूपी, रंगारंग, मिथकों को आदमी स्वयं ही रचता और स्वयं ही उनके पीछे भागता है। प्रगति, प्रयोग, या इनके अलग उपभोक्ताओं के जो भी वाद या मिथक बने, उनके साथ ‘वैज्ञानिक’ का दबदबा कुछ शान से जुड़ा रहा, मानो वह साधन नहीं, अपने आप में साध्य हो। यह सोचना भी पिछड़ापन लगता था कि क्रांति या प्रगति के कोई दूसरे वस्तु-निरपेक्ष अर्थ भी हो सकते हैं। मध्ययुगों में, कुछ इसी तरह धार्मिक शब्दावली का आतंक रहा, जिसे खारिज करते हुए पंद्रहवीं सदी में यूरोपीय नवजागरण ने मनुष्यता के अर्थ को उसके आत्मविश्वास में खोजा। आज अगर पृथ्वी और उस पर बसे प्राणियों की सुरक्षा को लेकर हम चिंतित हैं, तो इसका कारण वैज्ञानिक प्रगति नहीं, हममें उस दूरदृष्टि का अभाव है, जो प्रगति को केवल भौतिक अर्थों में परिभाषित करती है। हम आपसी संबंधों के आधार को आदमी में नहीं, चीजों में ढूंढ रहे हैं।

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