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मुहिम: विश्व मंच पर सोशल मीडिया के सहारे हिंदी, तभी खुलेगी यूएन की राह

Mon, 24 Jul 2023 06:14 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 24 Jul 2023 06:14 AM IST
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सार
भले ही संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार हिंदी में बोलते रहे हों, विदेश मंत्री के नाते सुषमा स्वराज भी अपनी बात हिंदी में कहती रहीं, लेकिन हकीकत यह है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की स्वीकार्यता को लेकर अभी लंबी दूरी तय किया जाना बाकी है।
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Social media is becoming medium to increase public access to UN activities and information related to it
संयुक्त राष्ट्र - फोटो : youtube

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के तत्काल बाद उसकी महासभा की महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। दूसरे विश्वयुद्ध और उससे हुए विनाश की काली छाया के बीच हुई उस बैठक में कई प्रस्ताव पारित हुए थे। लेकिन 10 जनवरी, 1946 को जो प्रस्ताव पारित हुआ था, उसे संयुक्त राष्ट्र की पूरी दुनिया के जन-जन तक पहुंच का संकल्प कहा जा सकता है। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि जब तक दुनिया के हर व्यक्ति तक संयुक्त राष्ट्र की जानकारी नहीं पहुंच जाती, इसके उद्देश्यों को सही मायने में हासिल नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र ने यह संकल्प पारित तो किया, पर इसके लिए उसे जैसा वैविध्यपूर्ण भाषायी मंच चाहिए था, वह तब बना नहीं पाया। उस दौर की शासित भाषाएं- अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, स्पेनिश और बाद में चीन की मंदारिन ही उसकी आधिकारिक भाषा बन पाई। इसके बाद पेट्रो डॉलर के दम पर अरबी भी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन गई।



बहरहाल, देर से ही सही, संयुक्त राष्ट्र को अपनी पहली बैठक का संकल्प याद आया और उसने भाषायी वैविध्य को स्वीकार करना शुरू किया। भले ही संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर बार हिंदी में बोलते रहे हों, विदेश मंत्री के नाते सुषमा स्वराज भी अपनी बात हिंदी में कहती रहीं, लेकिन हकीकत यह है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की स्वीकार्यता को लेकर अभी लंबी दूरी तय किया जाना बाकी है। विदेश मंत्री रहते सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र की सूचनाओं को हिंदी में ही पहुंचाने की कोशिश शुरू की, जिसके परिणाम स्वरूप संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक संचार विभाग ने साल 2018 में एक परियोजना शुरू की। इसके तहत वैश्विक संचार विभाग ने सोशल मीडिया और दूसरे मंचों के जरिये हिंदी में सामग्री पहुंचाना शुरू किया। इस परियोजना का उद्देश्य हिंदी में संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियों और उससे जुड़ी सूचनाओं की सार्वजनिक पहुंच बढ़ाना और लाखों हिंदी भाषी लोगों के बीच वैश्विक मुद्दों को लेकर जागरूकता फैलाना था। इस परियोजना ने पांच साल की अपनी यात्रा पूरी कर ली है।


वर्ष 2018 से ही दुनिया के करोड़ों हिंदी भाषी लोगों के लिए संयुक्त राष्ट्र ने हिंदी में ट्विटर अकाउंट और न्यूज पोर्टल शुरू किया था। संयुक्त राष्ट्र अब हिंदी में पॉडकास्ट भी करता है। भारत के प्रयासों का ही नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र से संबंधित तमाम समाचार सोशल मीडिया और मीडिया के कई मंचों पर हिंदी में जारी हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के हिंदी ट्विटर अकाउंट के जहां 50 हजार फॉलोअर हैं, वहीं इसके इंस्टाग्राम पेज के 29 हजार और फेसबुक पेज के 15 हजार फॉलोअर हैं। साल 2022-23 के आंकड़ों के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र का हिंदी इंटरनेट मीडिया अकाउंट सालाना करीब एक हजार पोस्ट कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र की हिंदी समाचार वेबसाइट की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह इंटरनेट सर्च इंजनों में शीर्ष दस स्थान में शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र ने भले ही जन-जन तक अपनी पहुंच बनाने का लक्ष्य रखा हो। लेकिन किसी भाषा को अपनाने की राह में सबसे बड़ी बाधा उसका अपना ही चार्टर है। भाषा को अंतिम रूप से स्वीकार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। साथ ही आधे से ज्यादा देशों को उस भाषा को अपनाने पर होने वाले खर्च को वहन करना होता है।

भारत की आज जो वैश्विक स्थिति है, उसमें उसे हिंदी के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा का बहुमत जुटाना मुश्किल नहीं है। लेकिन हिंदी की राह में सबसे बड़ी चुनौती संयुक्त राष्ट्र के कामकाज की नियमावली की धारा 51 है, जिसके तहत सदस्य देशों की बहुसंख्या को उसका खर्च उठाने के लिए सहमति देनी होगी। भारत के सामने चुनौती इसी धारा का संशोधन कराना है।

बहरहाल जब तक नियमों की वजह से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो जाता, तब तक उसे संयुक्त राष्ट्र के सोशल मीडिया मंचों के ही जरिये आगे बढ़ाया जाना चाहिए। भारत सरकार की सोच भी कुछ यही है। संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक संचार विभाग को दस लाख डॉलर का चेक सौंपा जाना भी उसी प्रक्रिया का अगला कदम है।

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