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भरोसे पर मुहर: एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक अहम संदेश

Fri, 29 May 2026 06:48 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 29 May 2026 06:48 AM IST
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सार
शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं की यह दलील खारिज करते हुए कि एसआईआर घुसपैठियों को हटाने के नाम पर पिछले दरवाजे से नागरिकता की ही जांच है, साफ कर दिया है कि यह पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग की सांविधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
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seal of trust Supreme Court s decision on SIR key message Opposition Election commission
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

ऐसे समय में, जब विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्षी दल लगातार आक्रामक रुख अख्तियार किए हुए हैं, तब सर्वोच्च न्यायालय का इसे पूरी तरह से वैध और संविधानसम्मत ठहराने वाला निर्णय चुनाव-प्रक्रिया की शुचिता और निर्वाचन आयोग के अधिकारों के पक्ष में एक अहम संदेश देता है। इससे हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली और पंजाब समेत सोलह राज्यों व तीन केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची के सत्यापन की आसन्न प्रक्रिया के बारे में चुनाव आयोग के अधिकारों की पुष्टि ही हुई है। हालांकि, यह शर्त भी महत्वपूर्ण है कि आयोग को प्रत्येक राज्य में इस प्रक्रिया को दोहराने का औचित्य स्पष्ट करना होगा। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं की यह दलील खारिज करते हुए कि एसआईआर घुसपैठियों को हटाने के नाम पर पिछले दरवाजे से नागरिकता की ही जांच है, साफ कर दिया है कि यह पूरी प्रक्रिया चुनाव आयोग की सांविधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। हालांकि, अदालत के फैसले का यह पहलू भी विचारणीय है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए नागरिकता संबंधी पहलुओं की जांच कर सकता है, पर इस संबंध में उसका निर्णय अंतिम नहीं होगा। दरअसल, इससे तो किसी को इन्कार नहीं होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची की शुद्धता निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है। अगर सूची में मृत, स्थानांतरित हो चुके या अपात्र लोगों के नाम बने रहते हैं, तो चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठेंगे। ऐसे में, एसआईआर की वैधता पर मुहर लगाने वाला अदालती फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लंबे समय से खिंचे आ रहे मुद्दे के संदर्भ में एक किस्म की स्पष्टता लेकर आया है। पर, इसके साथ ही चुनाव आयोग का यह कर्तव्य भी है कि किसी पात्र मतदाता को मताधिकार से वंचित न होना पड़े। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश के अनेक हिस्सों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, खासकर प्रवासी मजदूर, गरीब या बुजुर्ग नागरिक, जो ऐसे सत्यापन अभियानों में कठिनाइयों का सामना करते हैं। इसलिए, शीर्ष न्यायालय के निर्णय को चुनाव आयोग की शक्तियों की पुष्टि के साथ उसके दायित्वों की पुनर्पुष्टि के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद एसआईआर से जुड़े विवाद खत्म होंगे और राजनीतिक दल भी केवल चुनावी चश्मे से देखने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता के व्यापक संदर्भ में इस मुद्दे पर विचार करेंगे।
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