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नवीकरणीय ऊर्जा: अब अंतरिक्ष से मिलेगी बिजली,क्योंकि यह है उम्मीदों का आधार
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अंतरिक्ष।
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विस्तार
धरती पर चौबीस घंटे सौर ऊर्जा मिल सके इसके लिए वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में सोलर पैनल भेजा है। उन्हें इसमें सफलता भी मिली है। पहली बार अंतरिक्ष से भेजी गई सौर ऊर्जा पृथ्वी पर आई है। वैज्ञानिकों ने जनवरी, 2023 को मैपले नाम का स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की कक्षा में छोड़ा था। इसमें सोलर पैनल लगे थे, जो अंतरिक्ष के तापमान और सोलर रेडिएशन को झेल सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष में लगाए जाने वाले सोलर पैनल पृथ्वी पर मौजूद पैनल्स के मुकाबले आठ गुना ज्यादा सौर ऊर्जा दे सकते हैं।
आसान शब्दों में कहें, तो अंतरिक्ष से मिलने वाली सौर ऊर्जा से पृथ्वी पर आठ गुना ज्यादा बिजली पैदा हो सकेगी। अब अंतरिक्ष में सीधे फोटोवोल्टिक ऊर्जा का उत्पादन करना और फिर इसे पृथ्वी पर उपयोग के लिए भेजना यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की सोलारिस परियोजना का केंद्र बिंदु है, जिसमें हम भी शामिल हैं। पहला प्रमुख लक्ष्य 2030 तक एक मेगावाट बिजली संयंत्र को कक्षा में स्थापित करना है। परियोजना के परिणाम ‘स्थलीय’ फोटोवोल्टिक अनुप्रयोगों के लिए भी उपयोगी होंगे। अंतरिक्ष आधारित सौर ऊर्जा 60 से ज्यादा वर्षों से मौजूद है। दरअसल, 1958 में, यूएस सैटेलाइट वैनगार्ड 1 रेडियो ट्रांसमीटर को संचालित करने के लिए एक वाट से कम पावर के पैनल का इस्तेमाल करने वाला पहला अंतरिक्ष यान था। सैटेलाइट ने कुछ साल बाद काम करना बंद कर दिया, लेकिन यह अभी भी कक्षा में है। इसने न केवल अंतरिक्ष में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि यह पृथ्वी की परिक्रमा करने वाली सबसे पुरानी मानव निर्मित वस्तु भी है। विचार यह है कि अंतरिक्ष आधारित सौर ऊर्जा संयंत्रों को पृथ्वी की सतह से 36,000 किलोमीटर ऊपर, भूस्थिर कक्षा में स्थापित किया जाए: अर्थात भूमध्य रेखा के चारों ओर एक गोलाकार कक्षा, जो पृथ्वी के घूर्णन काल के साथ मेल खाती है।
सोलारिस के लिए पहली महत्वपूर्ण तिथि अगले वर्ष, 2025 के लिए निर्धारित की गई है। तब तक, यह आकलन करना आवश्यक होगा कि वास्तविक संचरण दक्षता क्या है। अर्थात, कक्षा में उत्पादित ऊर्जा का कितना हिस्सा पृथ्वी तक पहुंचेगा। किसी विशाल केबल या अंतरिक्ष लिफ्ट के माध्यम से नहीं, बल्कि माइक्रोवेव ऊर्जा को पृथ्वी पर भेजा जाएगा और एंटीना की एक शृंखला द्वारा ‘कैप्चर’ किया जाएगा, जो इसे बिजली में बदल देगा और इसे ग्रिड पर फीड करेगा। कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा विकसित और स्पेस सोलर पावर डेमोंस्ट्रेटर (एसएसपीडी-1) सैटेलाइट द्वारा इस्तेमाल की गई तकनीक की बदौलत अंतरिक्ष से बिजली का संचरण पहली बार 2023 में पूरा हुआ।
हालांकि, अब सवाल यह है कि इस प्रक्रिया की औद्योगिक और आर्थिक व्यवहार्यता और स्थिरता क्या है। एक गीगावाट बिजली संयंत्र का वजन लगभग 11,000 टन होगा, और सभी सामग्रियों को कक्षा में पहुंचाने के लिए 100 प्रक्षेपण करने होंगे। आर्थिक रूप से टिकाऊ प्रणाली होने के लिए, संचरण दक्षता-यानी, कक्षा में उत्पादित ऊर्जा का किताना हिस्सा पृथ्वी तक पहुंचेगा, यह आज तक अज्ञात है। यह 90 प्रतिशत से अधिक होना चाहिए। यदि सब कुछ ठीक रहा, तो अगला कदम 2030 के आसपास, पहला सौर फार्म कक्षा में भेजना होगा। एक मेगावाट का विद्युत संयंत्र पहले से ही स्थापित है व स्वचालित विस्तार में सक्षम है।
इसके बाद, नई तकनीक का वास्तविक व्यावसायिक अनुप्रयोग शुरू करने के लिए 2040 और 2045 के बीच एक गीगावाट की स्थापित क्षमता तक अधिक से अधिक शक्तिशाली संयंत्र होंगे। ये मानक एक गीगावाट अंतरिक्ष-आधारित सौर ऊर्जा संयंत्र धातु की संरचनाएं होंगी, जिनमें समानांतर में लगे फोटोवोल्टिक पैनल होंगे, लगभग पांच वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्र में। पृथ्वी पर, लगभग 25 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में व्यवस्थित अन्य एंटेना माइक्रोवेव प्राप्त करेंगे। अंतरिक्ष में स्थापित क्षमता का एक गीगावाट पृथ्वी पर स्थापित एक से छह या सात गुना अधिक ऊर्जा का उत्पादन कर सकता है, लगभग चौबीसों घंटे। आज, अंतरिक्ष प्रयोगों के लिए सौर सेल जटिल माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाओं का उपयोग करके उत्पादित किए जाते हैं और उनकी लागत बहुत अधिक है। इसलिए परियोजना के दो लक्ष्य हैं, सोलर पैनलों की दक्षता को 40 प्रतिशत तक बढ़ाना (जो बहुत अधिक है) और उत्पादन की लागत को कम करना। कम लागत पर उच्च दक्षता का लक्ष्य स्थलीय उपयोगों के लिए सोलर पैनलों की एक पूरी नई पीढ़ी के विकास को सक्षम कर सकता है-पहले केवल घरेलू प्रयोगों के लिए और फिर बड़े पैमाने पर, जमीन-आधारित उत्पादन संयंत्रों के लिए प्रौद्योगिकी के विकास के लिए। इस प्रकार सौर ऊर्जा की ऊर्जा संक्रमण के एक आवश्यक स्तंभ के रूप में पुष्टि की जा सकती है और 2050 तक दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत ऊर्जा को नवीकरणीय स्रोतों से उत्पादित करने के लक्ष्य में योगदान दिया जा सकता है।