रघुबीर अंत तक पहाड़ के स्तंभ रहे
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वर्ष 1980 में पहाड़ (पत्रिका) का विचार आ चुकने के बाद रघुबीर चंद से मुलाकात हुई। उसके माध्यम से पुराने साथी ललित पंत भी जुड़ गए। पुष्पेश पंत, गिर्दा, राजीव लोचन साह और गौतम भट्टाचार्य तो पहले से ही जुटे थे। ललित और साथियों ने उत्साह से अक्तूबर, 1983 में पिथौरागढ़ में पहाड़-1 का विमोचन कराया। संग्रामी लक्ष्मणसिंह महर, चंडी प्रसाद भट्ट, राधा बहन आदि के हाथों अंक का विमोचन हुआ। पिथौरागढ़ के लोगों ने आगंतुकों का दिल जीत लिया। वे हर कार्यक्रम में बने रहे। रघुबीर अंत तक पहाड़ के स्तंभ रहे। उसके जाने से ऊर्जा का एक स्रोत सूख गया है। रघुबीर एक जिम्मेदार शिक्षक, उत्कृष्ट शोधकर्ता, यात्राओं और साहित्य में रुचिवान, कवि, परिवार का सहयोगी; युवाओं को अध्ययन के लिए प्रेरित करने वाला साथी था। मानव भूगोल में उसकी गहरी रुचि थी। पर भूगोल के हाई-वे से वह अनेक पगडंडियों में भी निकल पड़ता था। वहां आर्थिकी, मुख्य पेशा, लोक भाषा, साहित्य, स्थानीय तकलीक और लोगों के चेहरे उसके मुख्य विषय बन जाते थे।
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पहाड़ की गोष्ठियों, व्याख्यानों या साहित्य सभाओं के साथ फोटो प्रदर्शनी और अध्ययन यात्राएं होने लगीं। बाद में पहाड़ द्वारा स्वतंत्र किताबें भी प्रकाशित हुई। इन किताबों में स्वयं रघुबीर की भूटान के पशुचारकों पर लिखी हिडन हाई लैंड्स ऑफ भूटान भी थी, जिसकी भूमिका सुप्रसिद्ध इतिहासकार और मानवशास्त्री कुमार सुरेश सिंह ने लिखी थी। शिक्षक साथियों, विद्यार्थियों और शोध छात्रों ने पहाड़ के कार्यकलापों को जबर्दस्त गति दी। वे सभी देश-देशांतर में जाने के बावजूद सदा पहाड़ और हिमालय से अभिन्न रहे और इसे आगे बढ़ाने में कभी पीछे नहीं रहे। इनमें से अनेक पिथौरागढ़ कार्यक्रम से ही जुड़े थे। कितने ही मित्रों का साथ था। नैनीताल में चंद्रलाल साह बूज्यू के कारण आयोजन स्थल की सदा निश्चिंतता रही। सीआरएसटी में हुए पहाड़ के कार्यक्रमों में अनेक व्याख्यान तथा गोष्ठियां प्रमुख थीं। यहीं पहाड़ के दर्जनों स्लाइड शो हुए थे, जिनमें रघुबीर चंद का अलास्का पर केंद्रित चित्रमय व्याख्यान आज भी अनेक मित्रों को याद होगा। 1983 से 2021 तक लगभग चार दशक तक रघुबीर संपादन, यात्राएं, लेखन और अन्य आयोजनों में सदा सक्रिय रहा। उसको समय कम मिल पाता था। विश्व भूगोलविदों के संगठन में वह सक्रिय रहने लगा था। इससे उसे अंतरराष्ट्रीय स्पर्श मिला। फिर दो बार उसने भूटान के कॉलेज में पढ़ाया।
उसकी भूटान यात्राओं की किताब उसके देहांत के कुछ समय पहले प्रकाशित हुई थी। फिर डोनाल्ड लिन्च जैसे भूगोलविद के संपर्क में वह आया, जिनके माध्यम से उसका संपर्क उन भूगोलविदों से हुआ, जो दुनिया के दुर्गम भूगोलों पर कार्यरत थे। अलास्का के बाद एंडीज, रूस के अंतवर्ती क्षेत्रों, जापान, अमेरिका के रेड इंडियन रिजर्व और फिर भूटान के पशुचारकों के बीच काम करने का उसे मौका मिला।
धीरे-धीरे वह खिलता और खुलता गया। उसमें हर यात्रा और संपर्क से सीखने की ललक थी। वह कभी भी सतह पर नहीं अटकता था। गहराई में जाकर भूगोल और वहां के लोगों को समझने की कोशिश करता था। वह परिवार के प्रति निर्मम नहीं था, पर इससे उसने अपने अध्ययन और भ्रमण को प्रभावित नहीं होने दिया। हमने अनेक यात्राएं साथ कीं। मिलम, पंचचूली, लद्दाख की दो यात्राओं और भूटान की यात्रा के अलावा दो अस्कोट-आराकोट अभियानों में वह लंबे समय तक साथ रहा। जब वह अलास्का गया, तो वहां से पत्र के साथ एक मार्मिक कविता उसने भेजी थी। तब तक मुझे उसके भीतर छिपे कवि का पता नहीं था। अलास्का के बाद उसने लैटिन अमेरिका, अस्कोट-आराकोट अभियान और भूटान के यात्रा संस्मरण लिखे। पिछले सालों में उसने स्प्रिन्गर के लिए दो किताबें संपादित की और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के लिए भूगोल के विश्वकोश का संपादन किया।
पिथौरागढ़ जिले के सेरी गांव में रघुबीर का जन्म धनादेवी और लच्छी चंद के घर 1957 में हुआ था। उसके पिता गांव के बच्चों को स्कूल जाने को प्रोत्साहित करते थे। रघुबीर ने रोड़ीपाली में प्राथमिक शिक्षा और देवलथल में हाई स्कूल पास किया, फिर आगे की पढ़ाई पिथौरागढ़ से की। बाद में वह विश्वविद्यालय में शिक्षक बन गया। रघुबीर की दोनों बेटियां अपने क्षेत्रों में सुप्रतिष्ठित हैं। हालांकि पिता की बीमारी के समय दोनों अपनी पढ़ाई और नौकरी छोड़कर आ गईं और यह सिद्ध किया कि आत्मीय देखभाल कुछ साल तो जिंदगी बढ़ा ही देती है। वर्ष 2017 से रघुबीर धीरे-धीरे जिंदगी की ओर लौटने लगा था। 2018 में वह कॉलेज पैदल जाने लगा। उसी साल वह यूरोप की यात्रा में गया। उसके जिंदा रहने और हर पल का रचनात्मक इस्तेमाल करने का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि कैंसर से लड़ने के इन पांच वर्षों में उसने अपनी चार किताबें तैयार कीं और कुछ शोध लेख पूरे किए!
हालांकि वर्ष 2020 में रघुबीर की दिक्कतें फिर शुरू हुईं और वह संभल नहीं सका। विगत 21 मार्च को उसे दिल्ली से नैनीताल लाया गया। उसके बाद उससे फोन पर बात भी हुई, लेकिन उसकी आवाज में उदासी नहीं लगी। पर यह ज्योति के बुझ जाने से पहले की ‘धप्प’ थी। उसके कुछ ही दिन बाद वह अनंत यात्रा पर निकल गया। उसे अंतिम सलाम करने हम नैनीताल पहुंचे थे। उसके परिजनों को सांत्वना देने के लिए मेरे शब्द नहीं निकल पा रहे थे। सुबकती बिटिया के लिए कोई भी शब्द कम और कमजोर पड़ पड़ रहा था।