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अर्थ-तंत्र : मजबूत बने रहेंगे भारतीय बैंक, त्रुटिहीन है देश का कारोबारी माहौल

Fri, 19 May 2023 06:57 AM IST
Satish Singh सतीश सिंह
Updated Fri, 19 May 2023 06:57 AM IST
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सार
चूंकि भारतीय बैंकों का कारोबारी मॉडल त्रुटिहीन है, इसलिए अमेरिका और यूरोप के बैंकों की तरह इनके डूबने का खतरा नहीं है।
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Questions being raised on strength of Indian banks after sinking of two US banks
आरबीआई (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अमेरिका के दो बैंकों, सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) व सिग्नेचर बैंक और स्विट्जरलैंड के क्रेडिट सुइस बैंक के डूबने के बाद भारतीय बैंकों की मजबूती पर सवाल उठाए जा रहे हैं। केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंक प्रमुखों से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श किया है और रिजर्व बैंक भी भारतीय बैंकों के 'कारोबारी मॉडल' पर नजर बनाए हुए है।



रिजर्व बैंक का मानना है कि विदेश के इन बैंकों के डूबने का कारण दोषपूर्ण कारोबारी मॉडल है। भारत की बैंकिंग प्रणाली कोरोना काल में भी मजबूत बनी हुई थी और अब भी मजबूत है, क्योंकि भारतीय बैंकों का कारोबारी मॉडल त्रुटिहीन है, इसलिए अमेरिकी और यूरोपीय बैंकों के डूबने, महंगाई बढ़ने, भू-राजनीतिक संकट आदि का इस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव देखने को नहीं मिला है।


अमेरिका का एसवीबी बड़े कारोबारियों से जमा लेने के अलावा स्टार्टअप कंपनियों, उद्यम पूंजीपतियों और प्रौद्योगिकी कंपनियों को कर्ज मुहैया कराता था, जबकि सिग्नेचर बैंक जमा लेने के अलावा रियल एस्टेट को ऋण देने का काम करता था। एसवीबी ने बैंकिंग उसूल के उलट एक ही सेक्टर को बहुत ज्यादा ऋण दे दिया था। बैंक ने अतिरिक्त जमा को लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेश किया था, लेकिन बाद में भू-राजनैतिक संकट, महंगाई, ऋण ब्याज दरों में उछाल आदि की वजह से बैंक की परिसंपत्ति-देयता का संतुलन बिगड़ गया और बैंक ग्राहकों की नकदी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाया।

इसी तरह सिग्नेचर बैंक के ग्राहकों द्वारा नकदी की ज्यादा निकासी की वजह से बैंक के समक्ष तरलता का संकट पैदा हो गया, क्योंकि सितंबर, 2022 तक इस बैंक के पास कुल 103 अरब डॉलर जमा राशि में से एक चौथाई क्रिप्टो करेंसी का हिस्सा था और इसने भी एक विशेष क्षेत्र को ज्यादा ऋण दे रखा था। वहीं यूरोप का क्रेडिट सुइस बैंक भ्रष्टाचार की वजह से डूब गया। चूंकि इसके डूबने से स्विट्जरलैंड की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था, इसलिए, देश के सबसे बड़े बैंक यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड (यूबीएस) ने इसे अधिग्रहित कर लिया।  

भारतीय बैंकों की परिस्थितियां अमेरिका और यूरोप के बैंकों से अलग हैं। भारतीय बैंक नियामक और खुद की नीतियों के अनुरूप काम कर रहे हैं और ये हर साल नई ऋण नीति बनाते हैं। इसलिए किसी भी कीमत पर ये किसी एक क्षेत्र या उद्योग को ऋण नहीं दे सकते हैं। नियामक भी बैंकों की कार्यप्रणाली की लगातार समीक्षा करता रहता है। भारतीय बैंक ग्राहकों की पूरी जमा राशि का इस्तेमाल ऋण देने में नहीं कर सकते हैं।

एक निश्चित राशि बैंकों को रिजर्व बैंक के पास सुरक्षित रखना होता है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2023 तक भारतीय बैंकों में जमा आम जनता के 98 प्रतिशत धन बीमित थे, इसलिए भारतीय बैंकों के डूबने पर भी भारत में शत-प्रतिशत आमजन का पैसा नहीं डूबेगा। सभी बैंक परिसंपत्ति-देयता के संतुलन को बनाकर काम करते हैं। रिजर्व बैंक बैंकिंग प्रणाली में तरलता को बनाए रखने के लिए हमेशा काम करता रहता है।

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय बैंकों और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की संपत्ति की गुणवत्ता 2023 में स्थिर बनी रहेगी और भारतीय बैंकों को सुचारू परिचालन से लाभ होगा। मूडीज ने विगत महीनों में नौ भारतीय निजी और सरकारी बैंकों की रेटिंग बढ़ाकर उसे आउटलुक निगेटिव से स्टेबल कर दिया है।

वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में बैंकों के कामकाज में सुधार के लिए बैंकिंग नियमन अधिनियम और भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया है और इसके अनुरूप बैंकिंग प्रणाली को बेहतर बनाने की लगातार कोशिश की जा रही है। विगत कई वर्षों से बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए सरकार द्वारा उठाए कदमों से बैंकों के मुनाफे में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है और बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में भी सुधार आया है। आगे भी भारतीय बैंकों के मजबूत बने रहने की प्रबल संभावना है।

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