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Right To Health Bill: सफेद कोट, तमतमाते चेहरे और कुछ सवाल, आखिर इस कानून में गलत क्या है?

Tue, 04 Apr 2023 01:37 PM IST
संजय अभिज्ञान संजय अभिज्ञान
Updated Tue, 04 Apr 2023 01:37 PM IST
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सार
स्वास्थ्य का अधिकार लागू करने वाला देश का पहला राज्य राजस्थान दो सप्ताह तक अपने रूठे डॉक्टरों को मनाने में जुटा रहा। उदास करने वाली बात थी कि जनता की नजर में भगवान का दर्जा रखने वाले डॉक्टर बड़ा दिल दिखाने की बजाय मरीजों को बेबस छोड़ते नजर आए।  
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Private hospitals Doctors Protest against Right To Health Bill of Rajasthan government
राइट टू हेल्थ बिल का विरोध। - फोटो : Amar Ujala Digital

विस्तार


कई बार अखबारी सुर्खियां आपस में टकरा जाती हैं और पाठकों का काम आसान कर देती हैं। बीता सप्ताह दो बड़ी खबरें परोस कर गुजरा। एक खबर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के न्यूरोसर्जन के खिलाफ सीबीआई एक्शन की थी। उसमें पर्दाफाश हुआ कि डॉक्टर साहब बिचौलियों की मदद से जल्दी ट्रीटमेंट की एवज में मोटी रिश्वत वसूलने का रैकेट चला रहे थे। दूसरी खबर राजस्थान में डॉक्टरों और निजी अस्पतालों की हड़ताल की थी जो सभी मरीजों को निशुल्क इलाज की गारंटी देने वाले नए कानून के विरोध में दो सप्ताह तक चलती रही।

पहली खबर ने पाठकों को बताया कि खुद को प्राइवेट अस्पतालों के हाथों में सौंप चुके भारतीय चिकित्सा तंत्र में एक आम मरीज आज कितना अकेला है। दूसरी ने बताया कि अगर उसे थोड़ा समर्थ बनाने की कोशिश होगी तो रास्ते में कैसी पगबाधा प्रकट होगी। मगर हैरानी एक बात पर हुई। दोनों खबरों की पटकथा में सफेद कोट धारण करने वाले धरती के भगवान ऐसा रोल निभाते दिखे जिसमें दरिद्रनारायणों के लिए कोई करुणा नहीं थी। वे बस अपने-अपने 'बिजनेस मॉडलों' की फिक्र कर रहे थे।


जरा राजस्थान के टकराव के कुछ बेसिक तथ्य देखें। गत 21 मार्च को राजस्थान विधानसभा ने उस 'चिकित्सा के अधिकार' विधेयक को पारित कर दिया, जिसे पिछले साल सितंबर में सदन में रखा गया था। विधेयक का मर्म यह है कि राजस्थान के सभी सरकारी अस्पतालों और चुनिंदा निजी अस्पतालों में पहुंचने वाले सभी मरीजों को ओपीडी सेवाएं भी निशुल्क मिलेंगी। बारीकी वाला बिंदु है कि भर्ती मरीजों के पूरी तरह निशुल्क इलाज की तरह बहिर्रोगी विभागों में परामर्श के लिए आने वाले रोगियों को भी मुफ्त इलाज मिलेगा। यह कानून सारे निजी अस्पतालों पर तो नहीं, मगर एक सीमा से अधिक बिस्तर क्षमता वाले बडे़ निजी अस्पतालों पर लागू किया गया।

निजी अस्पताल और डॉक्टर इन्हीं प्रावधानों से खफा होकर कोपभवन में गए। उनकी दलील है कि मुफ्त इलाज तो दे देंगे लेकिन बाद में बिलों की प्रतिपूर्ति यानी रीइंबर्समेंट के लिए सरकारी महकमों के बाबुओं के चक्कर कौन लगाएगा। प्रतिपूर्ति की सरकारी दरें क्या पर्याप्त होंगी, भुगतान की समयसीमा क्या होगी और चिकित्सकों की पेशेवर दक्षता के स्तर के साथ कितना इंसाफ हो पाएगा,  ऐसे सवाल भी उनके समर्थन में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने पेश किए हैं। साथ में यह आरोप तो है ही कि गहलोत सरकार चुनावी स्वार्थ के मारे यह कानून लेकर आई है।

जवाब में 'चिकित्सा के अधिकार' - कानून के समर्थन में आईं दलीलें भी गौरतलब हैं। एक तो यही कि सितंबर 2022 में विधेयक लाने के बाद सरकार डॉक्टरों के संपर्क में लगातार थी और उनके सुझावों के मुताबिक विधेयक में संशोधन भी हुए, हालांकि निजी अस्पतालों की सभी मांगों को ज्यों का त्यों मान लिया जाना मुमकिन नहीं है। दूसरी, अभी कानून के नियम-कायदे फ्रेम करने का काम चल रहा है, लिहाजा अंतिम रुप आने तक हड़ताल जैसा अतिवादी फैसला वाजिब नहीं था। तीसरे, लालफीताशाही या सरकारी इंसपेक्टर राज की दुहाई देकर तो किसी भी सरकारी योजना का विरोध किया जा सकता है। आखिर ईगवर्नेंस और आरटीआई की बदौलत लालफीताशाही पर लगाम भी तो लगी है। एक तर्क यह भी है कि सभी नागरिकों के लिए सार्वभौमिक चिकित्सा का वादा अगर कांग्रेस के घोषणापत्र का अंग था तो इस कानून में गलत क्या है।

आगे बढ़ने से पहले जरा किसी प्राइवेट अस्पताल के बिलिंग काउंटर पर खडे़ एक आम आदमी के हैरान-परेशान चेहरे की कल्पना कीजिए। उस तीमारदार की कल्पना कीजिए जो सफदरजंग अस्पताल के आरोपित न्यूरोसर्जन को लाख रुपये की रिश्वत देने को राजी हो गया। समझना मुश्किल नहीं कि महंगा इलाज और अस्पतालों की मनमानी तो अब राष्ट्रीय हकीकत है। पिछले दो दशकों के दौरान देश के चिकित्सा ढांचे पर निजी क्षेत्र लगातार हावी हुआ है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 के मुताबिक भारतीय शहरों में रहने वाले 70 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 63 फीसदी लोग निजी अस्पतालों की सेवाएं ले रहे थे। आज की तारीख में देश के 80 प्रतिशत डॉक्टर निजी क्षेत्र में काम कर रहे हैं।  कुल मरीजों में से आधे निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं। मुल्क के 70 फीसदी अस्पताल और 60 फीसदी दवाखाने निजी स्वामित्व वाले हैं। हर तीन में से दो बिस्तर किसी निजी अस्पताल में होते हैं।  

मतलब यह हुआ कि चिकित्सा तंत्र का दो-तिहाई निजीकरण हो चुका है। तथ्य यह भी है कि आयुष्मान योजना अभी समूची आबादी को कवर नहीं कर पाई है। लगभग आधी से ज्यादा आबादी आज भी स्वास्थ्य बीमा के सुरक्षा कवच से वंचित है और जमीन-जायदाद बेचकर इलाज कराने को मजबूर है। उधर कभी हजारों में होने वाला इलाज निजी अस्पतालों में अब लाखों की लागत में हो रहा है।  ऐसे में सवाल यही है कि तमाम बंदिशों में चलने वाले सरकारी अस्पतालों तक में अगर भ्रष्टाचार की शिकायतें आ रही हैं तो उन निजी अस्पतालों में क्या हाल होगा जो घोषित तौर पर मुनाफे के आधार पर चलते हों?

एक तरफ ये वस्तुस्थिति है तो दूसरी ओर संविधान का अनुच्छेद 21 है जिसमें सभी नागरिकों के लिए स्वस्थ जीवन जीने के मूलभूत अधिकार की बात है। साथ ही स्वास्थ्य से जुडे़ सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी गोल) हैं जिनको पूरा करने की समयसीमा में भारत पिछड़ रहा है। जब साफ है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा इलाज की बेसिक सुविधाओं से वंचित है तो कल्याणकारी निर्वाचित सरकारें कब तक बिना इलाज के मरती आबादी से मुंह मोड़ पाएंगी? वे गरीब नागरिकों की सुनें या निजी अस्पतालों की मानमनौवल करें जिन्होंने चिकित्सा को एक बड़ी हद तक धंधा ही बना दिया है।

हम न भूलें कि राजस्थान के इस फैसले से पहले भी सरकारें बडे़ फैसले लेती रही हैं। सबसे ठोस और ऐतिहासिक तो दस करोड़ परिवारों को पांच लाख खर्च तक के इलाज का भरोसा देने वाली 2018 की केंद्रीय आयुष्मान बीमा योजना ही है। हालांकि, आलोचकों ने उसमें भी कमियां निकालीं। निशुल्क चिकित्सा का एक और प्रयोग दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लिनिक वाला है। दिसंबर 2021 में घोषित तमिलनाडु की स्टालिन सरकार की एक सराहनीय स्कीम भी है जिसमें सड़क दुर्घटनाओं के घायलों को किसी भी अस्पताल में 48 घंटे तक मुफ्त इलाज की गारंटी है।

ये तो हमारे देश की ही मिसालें हैं, लेकिन दूसरे देशों की तरफ देखेंगे तो हमें शर्म आ जाएगी। ब्राजील जैसा मुल्क अपने सभी नागरिकों को ही नहीं, विदेशी मेहमानों तक को किसी भी बीमारी के निशुल्क इलाज का अभयदान देता है। डेनमार्क, फिनलैंड, नार्वे, स्वीडन सरीखे दर्जनों मुल्क हैं, जो अपने नागरिकों को पूरी तरह निशुल्क चिकित्सा उपलब्ध कराते हैं। विकसित विश्व के लगभग सभी मुल्क, सोशल सिक्योरिटी कानून, बीमा कंपनियों से साझेदारी और टैक्स मनी के बूते लागू की गई सरकारी योजनाओं के एक बड़े तंत्र की मार्फत ऐसी परिस्थिति बना चुके हैं जिसमें नागरिकों के बेसहारा, बेइलाज मरने की नौबत नहीं आ पाती। यही उनके विकास और उनके लोकतंत्र की श्रेष्ठता का सबसे बड़ा प्रमाण भी है।

दूसरी तरफ हम हैं जो इस मोर्चे पर हड़ताल, रूठने और मनाने के स्तर पर ही अटके हुए हैं। याद रहे, ढाई दशक पहले जब चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता कानून के तहत लाने का प्रस्ताव आया था,  तब भी डॉक्टरों ने बहुत बड़ा आंदोलन किया था। बाद में उच्चतम न्यायालय ने अपने  फैसले में एक झटके में यह कहकर बहस पर पूर्णविराम लगा दिया था कि उपभोक्ता कानून में वर्णित सेवाओं की परिभाषा के दायरे  में चिकित्सा सेवाएं स्वत: ही शामिल मानी जाएंगी।  तो क्या स्वास्थ्य के अधिकार वाले विचार के वर्तमान विरोध का भी वही हश्र होने जा रहा है?  वास्तव में हड़ताल के मारे मरीजों की बेबसी देखकर स्वयं चिकित्साजगत के भीतर राजस्थान की हड़ताल का विरोध शुरु हो गया था। यहां तक कि बाद में राजस्थान मानवाधिकार आयोग तक ने हस्तक्षेप कर दिया।

हालांकि राजस्थान के बड़े चिकित्सक संगठन अब घोषित तौर पर हड़ताल वापस ले चुके हैं लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनकी शिकायतें अभी कायम है। ऐसा नहीं है कि डॉक्टरों की कुछ मांगें और चिंताएं वाजिब नहीं होंगी लेकिन वे इतनी बड़ी और गंभीर नहीं थीं कि उन्हें भविष्य की बातचीत तक स्थगित नहीं किया जा सकता था। उम्मीद है कि  राजस्थान में दो सप्ताह तक मरीजों और तीमारदारों की अग्निपरीक्षा लेने वाली हड़ताल के पीछे जो आग्रह-दुराग्रह थे उनका जल्दी पूरी तरह निवारण हो जाएगा।

तय मानिए, राजस्थान का - स्वास्थ्य का अधिकार  - कानून ऐसी पहल है जिसका अनुकरण एक के बाद एक दूसरे राज्य भी करेंगे। लिहाजा, इस महान प्रयोग की तरफ आईएमए ही नहीं, पूरा देश देख रहा है। राजस्थान के अनुभव ही बताएंगे कि देश के हजारों अस्पतालों के बिलिंग काउंटरों पर खडे़  मरीजों की बेबसी भविष्य में कितनी कम हो सकेगी। सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार की पवित्र लोकतांत्रिक सूची में सेहत का अधिकार शामिल करने के मोर्चे पर पहले ही विलंब हो चुका है। डॉक्टर बंधुओं को समझ लेना चाहिए कि अब इस ऐतिहासिक सुधार का वक्त आ गया है।

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