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पर्यावरण : वैश्विक संकट बना प्रदूषित भूजल, बड़ी आबादी ने बढ़ाई भारत की चुनौती

Thu, 13 Feb 2025 06:54 AM IST
Gyanendra Rawat ज्ञानेंद्र रावत
Updated Thu, 13 Feb 2025 06:54 AM IST
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सार
यह भारत के लिए भी खतरे की घंटी है, जहां की अधिकांश  आबादी पीने के पानी के लिए भूजल पर ही निर्भर है।
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Polluted groundwater has become global crisis, large population increases India's challenge
भूजल - फोटो : iStock

विस्तार

समूची दुनिया में प्रदूषित भूजल सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। दुनिया के शोध सुबूत हैं कि रेडियो एक्टिव पदार्थों और भारी धातुओं की बढ़ती मात्रा ने भूजल की गुणवत्ता गिराने के साथ ही मानव जीवन को संकट में डाला है। हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दुनिया के 156 देशों के भूजल में सल्फेट की मात्रा अधिक पाई गई है, जिनमें भारत के अलावा अल्जीरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, इटली, स्पेन, मेक्सिको, अमेरिका, ट्यूनीशिया, ईरान आदि देशों के भूजल में सल्फेट की मात्रा अत्यधिक होने से लगभग 1.70 करोड़ लोग पेट और आंत की बीमारियों की भीषण चपेट में हैं।



अध्ययन के मुताबिक, दुनिया में लगभग 19.4 करोड़ लोग 250 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक सल्फेट युक्त पानी के संपर्क में हैं। इसे डब्ल्यूएचओ ने भी माना है। रिपोर्ट की मानें, तो दुनिया में 1.70 करोड़ लोग 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक सल्फेट वाला पानी पी रहे हैं। इनमें से 82 फीसदी लोग भारत, अमेरिका, मेक्सिको, स्पेन समेत 10 देशों में रहते हैं। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि स्पेन में सर्वाधिक 277.86 मिलीग्राम, अफगानिस्तान में 183.32 मिलीग्राम, मेक्सिको में 175.05 मिलीग्राम, पाकिस्तान में 135.01 मिलीग्राम, अमेरिका में 97.85 मिलीग्राम और भारत में 81.71 मिलीग्राम सल्फेट युक्त पानी का लोग इस्तेमाल कर रहे हैं।


शोधकर्ता वैज्ञानिकों की मानें, तो सल्फेट युक्त पानी स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी खतरनाक है। सल्फेट के कारण पाइप भी गल जाता है। यही नहीं फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों को अलग करके पारिस्थितिकी के नुकसान का कारण भी बनता है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण से सल्फेट की अधिकता भी बढ़ी है और इससे वैश्विक स्तर पर जल की गुणवत्ता भी गहरे तक प्रभावित होगी। भारत की बात करें, तो देश की ज्यादातर आबादी पीने के पानी के लिए भूजल पर ही निर्भर है। 2050 तक पानी की मांग में 25 फीसदी से अधिक की और बढ़ोतरी की चेतावनी ने यह सोचने पर विवश कर दिया है कि आखिर इस संकट का समाधान कैसे होगा?

सर्वविदित है कि भूजल दोहन के मामले में हमारा देश शीर्ष पर है। इसके चलते देश के उत्तरी गांगेय इलाके में, तो भूजल खत्म होने के कगार पर है। देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के कई शहरों का डार्क जोन में आना और एनसीआर में गंभीर पानी का संकट इसका जीता जागता सुबूत है। भूजल के मामले में पंजाब की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है, क्योंकि वहां की 94 फीसदी आबादी पीने के पानी के लिए भूजल पर ही निर्भर है। नतीजतन भूजल में भारी धातुओं और रेडियो एक्टिव पदार्थों की मौजूदगी में तेजी से इजाफा हुआ। इस मामले में हरियाणा भी पंजाब से पीछे नहीं है। हरियाणा में भूजल निकासी 137 फीसदी से भी अधिक है, जबकि देश में भूजल निकासी 63 फीसदी है। देश के सबसे बडे़ राज्य उत्तर प्रदेश के दस महानगर अति दोहित की श्रेणी में हैं।

आर्सेनिक, नाइट्रेट, सोडियम, यूरेनियम, फ्लोराइड आदि की अधिकता के कारण भूजल मानव स्वास्थ्य के साथ ही सिंचाई के लिए भी नुकसानदायक साबित हो रहा है। आंध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश के भूजल के 12.5 फीसदी नमूने उच्च सोडियम की मौजूदगी के कारण सिंचाई के लिए अनुकूल नहीं पाए गए हैं। देश के 440 जिलों के भूजल में बढ़ा नाइट्रेट का स्तर गंभीर स्वास्थ्य समस्या पैदा कर रहा है। सीजीडब्ल्यूबी की रिपोर्ट की मानें, तो पानी के 9.04 फीसदी नमूनों में फ्लोराइड का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक और 3.55 फीसदी आर्सेनिक की मौजूदगी पाई गई। राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु में 40 फीसदी से ज्यादा नमूने सुरक्षित सीमा से अधिक पाए गए। महाराष्ट्र में पानी में नाइट्रेट का स्तर 35.74, तेलंगाना में 27.48, आंध्र प्रदेश में 23.5 और मध्य प्रदेश में 22.58 फीसदी से भी ज्यादा उच्च स्तर तक दर्ज किया गया है, जबकि हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में यह स्तर लगातार बढ़ रहा है।

यह प्रदूषण पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य, दोनों के लिए हानिकारक है। इससे कैंसर, किडनी, हड्डियों और त्वचा की बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। नवजात शिशु के लिए तो यह जानलेवा बन गया है। गौरतलब है कि देश में भूजल की गुणवत्ता में तेजी से आ रही गिरावट के लिए उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल के उपचार की व्यवस्था न हो पाना, खेती में ज्यादा से ज्यादा उपज पाने की चाहत के चलते अंधाधुंध उर्वरकों का इस्तेमाल, बेतहाशा बढ़ रहा शहरीकरण, सीवेज लीकेज, घरेलू कचरा और कूडे़-कचरे के पहाड़ मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। इन पर अंकुश लगाए बिना भूजल की गुणवत्ता हासिल कर पाना टेढ़ी खीर है।

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