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सियासत: मंत्रिमंडल में फोकस क्षेत्रों और राजनीतिक मजबूरियों की झलक, वादों के मुताबिक नतीजों पर रहेंगी नजरें
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एएनआई
विस्तार
मोदी के नेतृत्व में राजग-3.0 सरकार काम पर लग गई है। जाहिर है, सौ दिनों का कार्यक्रम पर काम हो रहा है। ऐसे में, उन मुद्दों को समझना जरूरी है, जो चुनाव अभियानों के दौरान छाए रहे। कृषि, पानी, उद्योग, श्रम, कौशल और रोजगार से संबंधित चिंताओं पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। यह विकास एवं समृद्धि के लिए प्रमुख मंत्रालयों की कार्यसूची पेश करने का अवसर प्रदान करता है।शिवराज सिंह चौहान (कृषि, कृषक कल्याण एवं ग्रामीण विकास)-कृषि क्षेत्र का संकट राजनीतिक संवादों एवं आर्थिक आंकड़ों में प्रतिध्वनित होता है। लगभग आधा यानी 45 फीसदी कार्यबल कृषि में लगा हुआ है और राष्ट्रीय आय के छठे हिस्से पर निर्भर है। यह आंकड़ा गरीबी का केंद्रीय पहलू है।
निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा उद्यम होने के बावजूद उद्योग के विपरीत कृषि में आगत और निर्गत के संबंधों का अभाव है, जो पुनः कृषि कानूनों (जिन्हें वापस ले लिया गया था) को लाने की आवश्यकता पर बल देता है, ताकि नवाचार को अपनाया जा सके और किसान उत्पादक संगठनों एवं सहकारी समितियों के जरिये ऋण, भंडारण एवं बाजारों तक पहुंच को सक्षम बनाया जा सके। ग्रामीण विकास एवं कृषि को एक साथ लाने से लक्ष्यों में तालमेल बिठाया जा सकता है। हालांकि जरूरी सुधार पूरी तरह से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है। यही बात चार बार के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ राजनेता के रूप में चौहान के चयन को महत्वपूर्ण बनाती है, जो राज्यों के साथ सहयोग करने और खेती के मुद्दों को आगे बढ़ाने में सक्षम हैं।
चिराग पासवान (खाद्य प्रसंस्करण)-चौहान को युवा खाद्य प्रसंस्करण मंत्री चिराग पासवान का भी मार्गदर्शन करना होगा। राजनीतिक अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में उच्च मुद्रास्फीति का दर्द सुना जा सकता है। आठ फीसदी से अधिक खाद्य मुद्रास्फीति निजी उपभोग एवं कॉरपोरेट राजस्व पर जीडीपी के आंकड़ों में दिखाई देती है। इसका कारण असमान उत्पादन और भंडारण व प्रसंस्करण क्षमता का अभाव है। भारत को किराये पर भंडारण के लिए एक ढांचा तैयार करने की जरूरत है, जहां किसान अपनी उपज को इच्छानुसार बेचने या ऋण के लिए गिरवी रख सकें। भारत को ‘एक जिला, एक उत्पाद’ का लाभ उठाने तथा मूल्य संवर्धन और रोजगार बढ़ाने के लिए प्रसंस्करण क्षमता के विस्तार की खातिर राज्यों में विधायी मार्ग को स्पष्ट करने की भी जरूरत है।
सीआर पाटिल (जल शक्ति)-भारत में जल संकट पर लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया है और यह कई जटिल बाध्यताओं से घिरा हुआ है। भंडारण, उपलब्धता, गुणवत्ता और पहुंच के मुद्दों के कारण महत्वाकांक्षी 'हर घर जल' कार्यक्रम भी आलोचनाओं के निशाने पर है। घटते भूजल स्तर और टैंकर आपूर्ति वाले शहरी भारत के आंकड़ों में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो 100 से अधिक लोकसभा क्षेत्रों में फैला है। भारत का हर प्रमुख महानगर 50 से लेकर 100 किलोमीटर से अधिक दूरी से पेयजल प्राप्त करता है। ऐसे में, एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पानी के खारेपन को दूर करने तथा रीसाइक्लिंग के लिए संयंत्र लगाना तत्काल जरूरी है। इसके लिए काफी धन की जरूरत होगी तथा पब्लिक-प्राइवेट मॉडल की आवश्यकता होगी। भारत के पास सॉवरेन और पेंशन फंड से धन जुटाने का अवसर है। एक टेक्नोक्रेट-राजनीतिक होने के नाते पाटिल के पास विरासत को संभालने का मौका है।
मनसुख मंडाविया (श्रम, रोजगार एवं युवा मामले) और जयंत चौधरी (कौशल विकास)- बेरोजगारी और रोजगार सृजन का मुद्दा पूरे चुनाव के दौरान गूंजता रहा। रोजगार सृजन और उपलब्ध कौशल में काफी अंतराल है। भारत को एक ऐसी श्रम नीति की जरूरत है, जो नीतियों को बाजार की जरूरतों के साथ जोड़ सके। बेशक हमारे पास कौशल विकास कार्यक्रम है, लेकिन जैसा कि संसद की स्थायी समिति ने रेखांकित किया, कुशल लोगों को प्लेसमेंट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सबसे पहले शैक्षणिक उपलब्धियों की मैपिंग, युवा कार्यबल के कौशल को प्रमाणित करने के लिए ढांचा, उद्योग की जरूरतों के हिसाब से पाठ्यक्रमों को पुनः तैयार करने और कंपनियों को कर्मचारियों को कुशल बनाने एवं फिर से कौशल प्रदान करने के लिए कार्यक्रमों को शुरू करने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। सरकार को ग्लोबल स्किल गैप स्टडी द्वारा उजागर किए गए अवसरों का लाभ उठाना चाहिए। मंडाविया एवं चौधरी को अकाउंट एग्रीगेटर और ओएनडीसी पहलों में भी तेजी लानी होगी, ताकि रोजगार पैदा करने वाले स्टार्ट-अप्स को ऋण और बाजार तक पहुंच मिल सके।
पीयूष गोयल (वाणिज्य एवं उद्योग)-बदलती भू-राजनीति, खास तौर पर अमेरिका और चीन के बीच तनाव ने वैश्विक कंपनियों को जस्ट-इन-टाइम (जरूरत पड़ने पर ही आपूर्तिकर्ताओं से सामान मंगाना) से जस्ट-इन-केस (किसी उत्पाद के स्टॉक से ज्यादा बिकने की संभावना को कम करना) बिजनेस मॉडल अपनाने के लिए प्रेरित किया है। भारत वैश्विक विनिर्माण में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के वैश्विक अवसर के चौराहे पर खड़ा है। मई में पीडब्ल्यूसी द्वारा प्रकाशित एक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अमेरिका और चीन के बाद, तीसरी सबसे अहम कड़ी के रूप में उभर रहा है, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में। हां, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना कुछ क्षेत्रों में फायदा पहुंचा रही है, लेकिन और काम करने की जरूरत है।
सुधारों के अधूरे एजेंडे का बोझ राज्यों पर है और यहां नीति आयोग सर्वोत्तम प्रथाओं की एक ब्लू बुक बनाकर बदलाव ला सकता है। भारत को नई श्रम संहिताओं को अपनाने में तेजी लानी होगी।
सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की अधिशेष भूमि का लाभ उठाकर निवेश करने वाली कंपनियों के लिए जगह बनानी होगी और नियामकीय बाधाओं को दूर करना होगा। भारत को निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए और अधिक औद्योगिक समूहों की आवश्यकता है, विशेष रूप से पूर्वी तट और उत्तर के संसाधन संपन्न राज्यों में। मंत्रिमंडल में मंत्रियों के चयन से व्यक्तित्व के साथ फोकस क्षेत्रों के दिलचस्प जुड़ाव, राजनीतिक मजबूरियों और आर्थिक अनिवार्यताओं का पता चलता है। यह देखना अभी बाकी है कि इस पूरे बदलाव से वादे के मुताबिक नतीजे मिलते हैं या नहीं।