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राजनीति में विनम्रता
Sun, 23 Dec 2018 06:31 PM IST
Raman Singh
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह
Published by: Raman Singh
Updated Sun, 23 Dec 2018 06:31 PM IST
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तवलीन सिंह
पिछले सप्ताह रिपब्लिक टीवी के सम्मेलन में मैं प्रधानमंत्री को सुनने गई। दो दिन का यह रिपब्लिक समिट मुंबई के ट्रायडेंट होटल में था और कीनोट भाषण प्रधानमंत्री का था। वहां कड़ी सुरक्षा थी और सभागृह के बाहर खड़े रिपब्लिक टीवी के पत्रकार ने मुझसे पूछा कि प्रधानमंत्री के भाषण में मैं क्या सुनना चाहती हूं। सो मैंने ईमानदारी से उनको बताया कि चूंकि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में पराजय के बाद नरेंद्र मोदी का यह पहला भाषण है, ऐसे में, मैं विशेष तौर पर उनसे हार के कारणों के बारे में सुनना चाहती हूं। प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या इन तीन बड़े राज्यों में हार को वह अपनी सबसे बड़ी पराजय मानते हैं?
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फिर अन्य अतिथियों के साथ मैं सभागृह के भीतर अपनी तय जगह पर बैठ गई। प्रधानमंत्री के आने तक एक घंटा प्रतीक्षा करनी थी, सो आसपास बैठे भाजपा के समर्थकों के साथ मेरी बातचीत होने लगी। ये लोग चुनाव के दौरान काफी घूमे थे और उनका विश्लेषण था कि हार का मुख्य कारण था अहंकार और भाजपा प्रवक्ताओं का बड़बोलापन। चर्चा हो ही रही थी कि प्रधानमंत्री पहुंच गए और यह कहकर मुस्कराते हुए अपना भाषण शुरू किया कि चूंकि मीडिया वालों को सवाल करना बहुत पसंद है, इसलिए आज मैं भी अपना भाषण कुछ सवालों से करना चाहूंगा।
सो बड़े नाटकीय अंदाज में उन्होंने अपने सवाल शुरू किए, जैसे-क्या चार साल पहले किसी ने सोचा था कि भारत पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की तरफ अपने कदम बढ़ा लेगा? क्या चार साल पहले किसी ने सोचा था कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में भारत की रैंकिंग 142 से सुधरकर 77 हो जाएगी? क्या चार साल पहले किसी ने सोचा था कि इस देश में लोग एसी ट्रेनों में सफर करने से ज्यादा हवाई सफर करने लगेंगे? इसी अंदाज में प्रधानमंत्री ने कई सवाल और पूछे, जिनका मकसद यही था कि चार साल में सरकार ने देश को समृद्ध और आधुनिक बनाने के लिए कितना कुछ किया है, इसका हमें एहसास हो जाए। अपने एक घंटे से ज्यादा लंबे भाषण में प्रधानमंत्री ने एक बार भी अपनी पहली बड़ी राजनीतिक पराजय के बारे में दो शब्द नहीं कहे। वित्त मंत्री शाम को सम्मेलन में आए और उन्होंने भी विस्तार से समझाया कि मोदी सरकार ने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में बहुत सारी आर्थिक उपलब्धियां हासिल की हैं। जहां 2014 में हम वैश्विक दृष्टि में एक नाकाम आर्थिक शक्ति माने जाते थे, वहीं आज दुनिया वाले यह मानने लग गए हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था बड़े देशों की शृंखला में सबसे तेज दौड़ रही है।
प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के भाषण सुनने के बाद मुझे अजीब अनुभव होने लगा। ऐसा इसलिए कि मुझे 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले के वे आखिरी दिन याद आए, जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने ‘इंडिया शाइनिंग' नाम से अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखी थीं। बहुत चुनावों और बहुतेरे चुनाव अभियानों को देखने के बाद मैं एक चीज कह सकती हूं कि मतदाता चुनावों के समय राजनेताओं में विनम्रता देखना चाहते हैं, अहंकार नहीं। वे उन गलतियों के बारे में जानना चाहते हैं, जिनके कारण उनके निजी जीवन में वे वह परिवर्तन नहीं देख पाए, जिनकी उम्मीद थी। ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में देश ने प्रगति नहीं की है। इस दौरान कई क्षेत्रों में परिवर्तन आया है, लेकिन अगले साल अगर मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, तो यह समय अपनी कुछ गलतियों को विनम्रता से स्वीकार करने का है।