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चर्चा: ओपेनहाइमर, गीता और परमाणु बम...दार्शनिक ऊर्जा ने इस तरह बदल डाली दृष्टि
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विस्तार
मानव जाति को परमाणु बम का उपहार देकर, दुनिया को बारूद के ढेर पर बिठाकर तथा गीता-दर्शन से आलोकित होकर वह 56 वर्ष पहले ही दुनिया छोड़ गए थे, लेकिन अब एक फिल्म ने अचानक ही उन्हें पुनर्जीवित कर आधुनिक दुनिया का नायक बना दिया। अमेरिकी सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी और परमाणु बम के जनक जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर को अमेरिका के सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने अपनी बायोग्राफिक थ्रिलर फिल्म ओपेनहाइमर के माध्यम से समकालीन विश्व की चेतना में पिरोने का प्रयास किया है।
मानव की अंतश्चेतना में किसी प्रक्रिया के उद्गम में झांकने की उत्कट नैसर्गिक इच्छा होती है। इसीलिए हम मनुष्य प्राकृतिक स्वभाव से ही इतिहास प्रेमी होते हैं। मानव प्रजाति के उद्गम से लेकर ब्रह्मांड के उद्गम तक पहुंचने की कल्पनाएं हमारे मन में पलती हैं। परमाणु बम का प्रादुर्भाव और उसके फलस्वरूप मानव प्रजाति ही नहीं, बल्कि जिंदा ग्रह के संपूर्ण जीवन को मौत के पड़ाव पर ले जानेवाली विभीषिका की रचना का इतिहास खंगालने की इच्छा भी हमारे मन में घर किए बैठी रही है। ओपेनहाइमर ने दरअसल इसी इच्छा को तृप्त करने का प्रयास किया है। नाजी जर्मनी पर विजय पाने के लिए अणु बम विकास पर केंद्रित बेहद महत्वाकांक्षी मैनहटन प्रोजेक्ट वस्तुत: अमेरिका की एक बहुत ही रहस्यमयी योजना थी। उस परियोजना में अमेरिका ने जाने-माने कई वैज्ञानिकों को जुटाया था, जिसमें सबसे प्रमुख नाम जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर का था।
ओपेनहाइमर ने 16 जुलाई, 1945 को न्यू मेक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित ट्रिनिटी परिक्षण के रूप में परमाणु बम का पहला परीक्षण किया। उस परीक्षण के बाद ओपेनहाइमर ने परमाणु बमों के उत्पादन और विकास का अधिग्रहण किया और बाद में वह अणु युद्ध के नायक बन गए। उल्लेखनीय यह है कि परमाणु बम के परीक्षण के समय ओपेनहाइमर ने आत्मनिरीक्षण करते हुए भगवद्गीता का एक श्लोक उद्धृत किया था। परीक्षण के बाद उनके साथी वैज्ञानिक नील्स बोर्न ने उनके साथ एक संवाद किया, जिसमें उन्होंने बताया कि जिस समय उन्हें भगवद्गीता का श्लोक याद आया था, वह एकांत में खड़े हो गए और श्लोक का पाठ किया। यह गीता के अध्याय 11 का 32वां श्लोक है :
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराते हुए कह रहे हैं कि वह समय के अनुसार संपूर्ण विश्व का काल हैं, और इसलिए युद्ध में युद्धरत वीरों के लिए काल के रूप में प्रकट होकर लोगों को लोकों का विनाश करने के लिए प्रेरित करते हैं। उस अद्भुत अनुभव ने ओपेनहाइमर को अपने जीवन में भविष्य की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया। परमाणु परीक्षण और गीता के श्लोक का संबंध उनके जीवन में एक ऐसा महत्वपूर्ण समय था, जिसने उन्हें और उनकी सोच को बदल दिया।
पहले बहुत आनंद और तल्लीनता के साथ परमाणु बम के विकास में संलग्न ओपेनहाइमर पर हिरोशिमा और नागासाकी पर होने वाले विस्फोट के बाद अपने कर्मों के प्रति गहरे भावों की अनुभूति होने लगी थी। छह अगस्त, 1945 को जापानी शहर हिरोशिमा पर 'लिटल बॉय' और नौ अगस्त को नागासाकी पर 'फैट मैन' नाम से अमेरिका द्वारा गिराए गए बमों ने मानव द्वारा मानव जाति के सर्वनाश का एक ट्रेलर दिखा दिया था। उस विध्वंस का ओपेनहाइमर के जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। उन्होंने इन घटनाओं के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की। संवेदनशीलता और पश्चाताप के सम्मिश्रण के साथ वह न्याय के पक्ष में खड़े होने के लिए प्रेरित हुए। अणु युद्ध के बाद उनकी आंतरिक दुनिया ही बदल गई थी।
गीता के श्लोक से ओपेनहाइमर को अपने कार्यों के प्रति गहरा पश्चाताप हो गया और अपने कार्यकाल के बाद उन्होंने नृशंसता विरोधी और शांति का पक्षधर दार्शनिक मार्ग अपनाया। उनका प्रतिरोध उस समय भी मुखर हुआ, जब और भी उच्चतर प्रकार के अणु बमों का उत्पादन बढ़ने लगा। उन्होंने इसके विरुद्ध प्रतिरोध व्यक्त किया और विश्व भर में मानवता के लिए न्यायिक और शांतिपूर्ण उपायों के पक्ष में खड़े होने की दिशा में स्वयं का ध्यान केंद्रित करते रहे। नृशंस और उत्पीड़क कार्यों में अपनी संलिप्तता का उन्हें गहरा पश्चाताप हुआ, जिसके लिए उन्होंने क्षमा भी मांगी। ओपेनहाइमर की मृत्यु 18 फरवरी, 1967 को गले के कैंसर के कारण हुई।
अपने जीवन काल की संध्या का समय वह अणु युद्ध के बारे में बातचीत करने और अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करने के लिए अपने आसपास के लोगों के साथ बिताते थे। भगवद्गीता की दार्शनिक ऊर्जा तथा हिरोशिमा और नागासाकी के विध्वंस ने ओपेनहाइमर के जीवन में मानवीयता और वैज्ञानिक शोध के प्रति एक नया दृष्टिकोण दिया। सच कहें, तो अपने समय में मानवता को निकृष्टतम स्तर पर ले जाने पर उतारू नाजियों के अधर्म को नष्ट करने के लिए और विश्वयुद्ध के उत्तर काल में शांति और सृजन का वातावरण निर्मित करने में ओपेनहाइमर ने वही भूमिका निभाई, जो उन्हें गीता ने सिखाई।