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क्या मोदी सबका विश्वास जीत पाएंगे?

Sat, 08 Jun 2019 07:39 PM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sat, 08 Jun 2019 07:39 PM IST
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p chidambaram says will Narendra Modi win confidence of every section of society
पी चिदंबरम - फोटो : Facebook
नरेंद्र मोदी को जो जनादेश मिला है, वह निर्विवाद रूप से बहुत व्यापक है। बेशक, अतीत में ऐसे मौके आए हैं, जब किसी एक राजनीतिक दल को लोकसभा चुनाव में 303 से अधिक सीटें मिली हों। मसलन, इंदिरा गांधी को 1980 में 353 और राजीव गांधी को 1984 में 415 सीटें मिली थीं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां अलग थींः इंदिरा गांधी ने एक अत्यंत अलोकप्रिय गठबंधन सरकार के खिलाफ बहादुरी से संघर्ष किया, जेल जाने सहित कई तरह के उत्पीड़न झेले और तकरीबन अकेले ही लोगों का समर्थन हासिल किया, जिन्होंने उनकी पार्टी को और खुद उन्हें (रायबरेली) पराजित कर दिया था। जहां तक राजीव गांधी की बात है, तो वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार थे।

मतदाताओं का वृहत समर्थन

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नरेंद्र मोदी को जो जनादेश मिला है, वह निर्विवाद रूप से बहुत व्यापक है। बेशक, अतीत में ऐसे मौके आए हैं, जब किसी एक राजनीतिक दल को लोकसभा चुनाव में 303 से अधिक सीटें मिली हों। मसलन, इंदिरा गांधी को 1980 में 353 और राजीव गांधी को 1984 में 415 सीटें मिली थीं। लेकिन उस समय की परिस्थितियां अलग थींः इंदिरा गांधी ने एक अत्यंत अलोकप्रिय गठबंधन सरकार के खिलाफ बहादुरी से संघर्ष किया, जेल जाने सहित कई तरह के उत्पीड़न झेले और तकरीबन अकेले ही लोगों का समर्थन हासिल किया, जिन्होंने उनकी पार्टी को और खुद उन्हें (रायबरेली) पराजित कर दिया था। जहां तक राजीव गांधी की बात है, तो वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर पर सवार थे।

मतदाताओं का वृहत समर्थन

न केवल जीती गई सीटों की संख्या (303), बल्कि भाजपा ने जिस व्यापक तरीके से यह जीत हासिल की है, वह आश्चर्यजनक है। भाजपा सिर्फ तीन राज्यों- केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को ही भेद नहीं पाई। उसकी जीत का अंतर अविश्वसनीय तरीके से अधिक रहा, खासतौर से दो दलों के बीच होने वाले सीधे मुकाबले के पारंपरिक मानकों से भी बहुत अधिक। जैसा कि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और असम में ऐसा मुकाबला था। 

ऐसे कोई विश्वसनीय आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन सर्वेक्षणों और चुनाव ने पुष्टि की कि हिंदी भाषी और हिंदी जानने वाले प्रदेशों में उच्च जातियों ने बड़ी संख्या में भाजपा के पक्ष में मतदान किया। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के मामले में भी ऐसा ही रहा और आश्चर्यजनक रूप से दलितों, मुस्लिमों और ईसाइयों के एक वर्ग ने भी ऐसा ही प्रदर्शन किया। कारण भिन्न हो सकते हैं, लेकिन तथ्य यही है कि उन्होंने भाजपा को वोट दिया।

वोट मिला, भरोसा नहीं

अमित शाह-पी चिदंबरम
अमित शाह-पी चिदंबरम
मैं समझता हूं कि नरेंद्र मोदी खुश तो हैं, मगर संतुष्ट नहीं हैं। ऐसा कुछ जरूर है, जिस पर उन्होंने विचार किया है, संभवतः उनकी पार्टी के अन्य लोग जिसे समझ नहीं पाएः वह यह कि दलितों, मुस्लिमों, ईसाइयों और अत्यंत गरीब लोगों का सिर्फ वोट हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है, जरूरत उनका भरोसा जीतने की है। वह जानते हैं कि अपने पहले कार्यकाल के अंत तक वह उनका भरोसा नहीं जीत पाए, इसलिए उन्होंने अपने पहले के नारे सबका साथ, सबका विकास में उन्होंने सबका विश्वास भी जोड़ दिया। 

यह एक चतुर चाल है, लेकिन यह कठिनाइयों से भरी हुई है। कुछ स्वाभाविक बाधाओं के नाम हैं, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति और संजीव बालियान। कुछ अन्य लोग भी हैं, जो निर्वाचित तो हुए हैं, मगर जिन्हें किनारे कर दिया गया है या फिर जो प्रतीक्षा सूची में हैं- महेश शर्मा, अनंतकुमार हेगड़े, साक्षी महाराज, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और अन्य अज्ञात लोग। गिरिराज सिंह कैबिनेट मंत्री हैं और वह दो सहयोगी पार्टियों के नेताओं पर इफ्तार पार्टी में शामिल होने के कारण अवांछित टिप्पणी कर चुके हैं। भाजपा अध्यक्ष ने उन्हें फटकार भी लगाई, लेकिन उन्होंने कोई अफसोस नहीं जताया। 

चुनाव जीतने के बाद साक्षी महाराज एक कैदी (2017 में देश को झकझोर कर रख देने वाली उन्नाव में हुई बलात्कार की घटना के आरोपी विधायक) का शुक्रिया अदा करने के लिए जेल में उनसे मिलने गए। उन्हें अब तक फटकार नहीं लगाई गई है। उन पूर्वाग्रहों से छुटकारा पाना आसान नहीं है, जो बचपन या युवावस्था में रोपे जाते हैं। 

आरएसएस और भाजपा के वरिष्ठ नेता जब समय-समय पर ऐसे पूर्वाग्रह ('ईद में बिजली और दीपावली में बिजली नहीं', ऐसा क्षेत्र जहां अल्पसंख्यक बहुसंख्यक हैं) व्यक्त करते हैं, तब तो यह और भी मुश्किल हो जाता है। दलितों और मुस्लिमों की भीड़ द्वारा हत्या नहीं रुकेगी तो कोई मदद नहीं मिलेगी। तकरीबन हर हफ्ते कम से कम ऐसी एक घटना होती है। यदि भाजपा के 303 निर्वाचित सदस्यों में सिर्फ एक सांसद मुस्लिम समुदाय से है, तो इससे भी धारणा बदलने में मदद नहीं मिलने वाली है।

भय और कल्याण

पी चिदंबरम
पी चिदंबरम - फोटो : PTI
एक और भयावह संकट है। भाजपा इन वर्गों का विश्वास जीत सकती है, यदि वह दो शर्तों को पूरा कर दे। पहली यह कि किसी को भी भय के साथ जीवन न जीना पड़े। दूसरी शर्त यह है कि उनकी आर्थिक स्थिति क्रमशः बेहतर होती जाए। आज ये दोनों शर्तें पूरी नहीं हुई हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार कैसे इन दो शर्तों को पूरा करती है।

कुछ वर्गों के लोगों के मन से भय दूर करने के लिए साहसिक कदम उठाने की जरूरत होगी। जब कभी अपराध कर दंड से बच निकलने का प्रयास हो, तो इसके लिए जवाबदेह लोगों को दंडित किया जाए। क्या भाजपा नेतृत्व दंडमुक्ति के भाव से ऐसे कृत्यों को अंजाम देने और भय फैलाने वालों को दंडित करेगा? यह एक बड़ा सवाल है, मौजूदा हालात में इसकी संभावना नहीं लगती है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि भाजपा का नेतृत्व उन लोगों पर अपना अधिकार जताएगा जो दंडनीय व्यवहार में संलिप्त हैं।

दूसरी शर्त, वस्तुतः सरकार के पूरे नियंत्रण में नहीं है। वंचित तबकों की आर्थिक स्थिति तभी बेहतर होनी शुरू होगी, जब उन्हें और अधिक रोजगार मिले; और अधिक सुरक्षा मिले; उच्च आय हो और सार्वजनिक सामान और सेवा तक उनकी पहुंच बेहतर हो।

रोजगार और आय का संबंध उच्च और न्यायसंगत आर्थिक विकास से है और यह देखते हुए कि 2018-19 का अंत कैसे निराशाजनक रूप से हुआ, उच्च या न्यायसंगत विकास आसपास भी नजर नहीं आ रहा है।

मुझे संदेह है कि दलितों, मुस्लिमों, ईसाइयों और गरीबी की रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले वर्गों ने भाजपा उम्मीदवारों को सिर्फ इसलिए वोट दिया, क्योंकि कोई और अन्य उम्मीदवार चुनाव जीतने में सक्षम नहीं लग रहा था। यह वोट विवेक के आधार पर दिया गया, न कि विश्वास के कारण। भाजपा को उनका विश्वास जीतने के लिए बहुत कुछ करना होगा।

यह एक अप्रत्याशित स्थिति है। भाजपा ने भावुक समर्थकों (जिनकी नजर में मोदी कोई गलत काम नहीं कर सकते) के मतों से और असंतु्ष्ट वर्गों (जिनकी नजर में मोदी ने अभी तक कुछ भी सही नहीं किया) के मतों से सरकार का गठन किया। यह देखना दिलचस्प होगा कि संसाधनों से लैस मोदी अनजाने समुद्र में कैसे अपनी नैया पार लगाते हैं।
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