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अमेरिका, चीन और एआई: दोनों देशों को नए खतरे का एहसास है, बाकी दुनिया के आर्थिक रिश्तों में भी आ रहा बदलाव

Wed, 04 Nov 2026 05:41 AM IST
प्रशांत तिवारी थॉमस एल फ्रीडमैन, द न्यूयॉर्क टाइम्स।
थॉमस एल फ्रीडमैन, द न्यूयॉर्क टाइम्स। Published by: प्रशांत तिवारी Updated Wed, 04 Nov 2026 05:41 AM IST
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सार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तेजी से अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक समीकरणों को बदल रहा है। एआई आधारित साइबर हथियारों और ड्रोन से पैदा हो रहे नए खतरों ने दोनों महाशक्तियों के बीच सहयोग की जरूरत बढ़ा दी है।
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New US-China Rivalry in Age of AI Drones Robots and Rare Earths Will Now Determine Global Economic Power
अमेरिका और चीन - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

बीजिंग कैपिटल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लैंडिंग के बाद अब यात्रियों को एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले अपने केबिन बैग को स्कैनर से गुजारना जरूरी बनाया गया है। उस दिन जब मैं अपने बैग लेकर स्कैनर बेल्ट की ओर बढ़ा, तो एक ऐसे निर्देश पर नजर पड़ी, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था। साइनबोर्ड पर लिखा था-अगर किसी यात्री के पास ड्रोन है, तो उसे बाहर निकालना होगा और इसकी जानकारी देनी होगी। मैं नियमित रूप से चीन की यात्रा करता रहा हूं, लेकिन इस बार का सफर कई मायनों में बिल्कुल अलग था। इसकी एक खास वजह थी-यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी एआई के पूरी तरह प्रभावी हो चुके दौर में चीन की मेरी पहली यात्रा।



चीन में बिताए नौ दिनों के बाद मेरे सामने एक बात बिल्कुल साफ है। एआई का दौर अमेरिका और चीन के बीच भू-राजनीतिक और आर्थिक रिश्तों को नए सिरे से आकार दे रहा है। ऐसा कैसे हो रहा है? इसे समझने के लिए उसी ड्रोन वाले निर्देश पर लौटते हैं। आखिर यह छोटा-सा बोर्ड हमें क्या बता रहा है? यह बताता है कि अमेरिका और चीन बेशक अब भी आर्थिक व रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं और एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन अब दोनों को एक नए खतरे का एहसास है। मैं बात कर रहा हूं उन धोखेबाजों, ड्रग तस्करों, मानव तस्करों और हैकरों की, जिन्होंने हाल ही में बाइनेंस से 6.3 अरब डॉलर की क्रिप्टोकरेंसी चुरा ली। ऐसे छोटे समूह भी अब बाजार में आसानी से उपलब्ध ड्रोन और एआई आधारित साइबर हथियारों के जरिये अकेले ही वैसी तबाही मचा सकते हैं, जो पहले केवल किसी महाशक्ति के बूते की बात थी।


इस नई चुनौती से निपटने और वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए दुनिया की इन दो एआई महाशक्तियों के बीच आपसी सहयोग बहुत जरूरी है। छह महीने पहले अगर आप किसी भी एआई विशेषज्ञ से पूछते कि क्या चीन और अमेरिका कभी एकसाथ बैठकर अपने खतरनाक होते एआई मॉडल को नियंत्रित करने के लिए कुछ साझा दिशा-निर्देशों पर सहमत हो सकते हैं, तो जवाब लगभग तय था-बिल्कुल नहीं! लेकिन, अब बीजिंग शायद एआई के लिए सुरक्षा संबंधी नियमों और सीमाओं पर चर्चा करने को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी ज्यादा उत्सुक है। बेशक, चीन भी अमेरिका की तरह विदेशों में युद्ध लड़ने के लिए अपने हथियारों को एआई से लैस कर रहा है। पर, बीजिंग यह भी जानता है कि एआई दोधारी तलवार है। इसका इस्तेमाल गलत इरादे रखने वाले लोग भी कर सकते हैं। बीजिंग एयरपोर्ट पर ड्रोन को लेकर लगा वह निर्देश इसी खतरे की ओर इशारा करता है।

अब बात करते हैं कि एआई चीन और अमेरिका के साथ-साथ बाकी दुनिया के आर्थिक रिश्तों को किस तरह बदल रहा है। चीन निर्यात के मामले में एक विशाल आर्थिक ताकत है, लेकिन घरेलू खपत के मोर्चे पर उसकी स्थिति बेहद कमजोर है। वहीं, दूसरी ओर बेशक अमेरिकी, यूरोपीय, जापानी और कोरियाई निर्माता भी एआई के सुधारों से फायदा उठा रहे हैं। पर, चीन के पास कहीं ज्यादा आधुनिक विनिर्माण व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए, उसे एआई का बहुत बड़ा फायदा मिलने वाला है।

इस तस्वीर में एक और महत्वपूर्ण पहलू जोड़ लीजिए-दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ्स)। इस यात्रा में मेरे साथ कीथ ब्रैडशर भी हैं। उनकी नई किताब द रेस फॉर रेयर अर्थ्स: व्हाई चाइना इज विनिंग द कॉन्टेस्ट फॉर द वर्ल्ड्स मोस्ट क्रिटिकल रिसोर्सेज बताती है कि कैसे पिछले कई दशकों में अमेरिका और यूरोप ने इन बेहद महत्वपूर्ण धातुओं के क्षेत्र में अपनी शुरुआती बढ़त चीन के हाथों गंवा दी। बेशक अमेरिका व यूरोप अब रेयर अर्थ उद्योग को दोबारा खड़ा करने में जुटे हैं। लेकिन, चीन की बराबरी करने में उन्हें कई वर्ष लग सकते हैं। इस बीच, बीजिंग दुनिया को होने वाली रेयर अर्थ की आपूर्ति पर अपने लगभग पूर्ण नियंत्रण का इस्तेमाल कर रहा है। इसके जरिये उसने ट्रंप प्रशासन और यूरोपीय संघ को कई बार टैरिफ के मुद्दे पर पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। साथ ही, ताइवान का समर्थन न करने के लिए जापान पर भी भारी दबाव बनाया है। फिर भी, चीन को मेरी सलाह है कि वह बहुत तेजी से और लगभग अकेले आगे बढ़ने के बजाय ऐसे आर्थिक रिश्ते बनाए, जिनमें सभी देशों को लाभ हो। उसकी बढ़ती विनिर्माण क्षमता और एआई-रोबोटिक्स के कारण दुनिया में नौकरियों पर खतरा बढ़ रहा है, जिससे उसके खिलाफ प्रतिक्रिया तेज हो सकती है।

दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोप को समझना होगा कि चीन खुद अपनी रफ्तार धीमी नहीं करेगा। उसे चुनौती देने के लिए उन्हें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा और चीन जैसी गंभीरता से दीर्घकालिक योजनाओं पर काम करना होगा। मेरी नजर में आज चीनी लोग अपनी कमजोर शासन व्यवस्था के बावजूद, उससे बेहतर नतीजे हासिल कर रहे हैं। वहीं, अमेरिका अपनी अच्छी शासन व्यवस्था से भी सबसे खराब नतीजे हासिल कर रहा है।

रिपब्लिकन पार्टी टेक्सास के अगले सीनेटर के रूप में केन पैक्सटन को जिताने के लिए 20 करोड़ डॉलर से ज्यादा खर्च कर रही है। पैक्सटन टेक्सास के ऐसे पूर्व अटॉर्नी जनरल हैं, जिन पर महाभियोग चल चुका है। दूसरी ओर, ट्रंप अमेरिका के वैज्ञानिक अनुसंधान बजट को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही, वह उन प्रतिभाशाली विदेशियों को अमेरिका से दूर कर रहे हैं, जो वहां आकर काम करना, पढ़ना और नई खोजें करना चाहते हैं। ट्रंप ने पेट्रोल और डीजल की ज्यादा खपत करने वाले वाहनों को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक कार उद्योग को भी कमजोर किया है।

चीन और अमेरिका के बीच, साथ ही चीन और यूरोप के बीच आर्थिक रिश्तों में संतुलन वापस लाने का एक ही रास्ता है। इसके लिए बीजिंग के सामने गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं होगा। अमेरिका और यूरोप को अपनी ताकत और प्रभाव दोबारा हासिल करने होंगे। कुछ दिन पहले मैंने इसे लाल रंग की एक बेसबॉल कैप पर लिखा देखा था-‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’, यानी अमेरिका को फिर महान बनाओ। काश, अमेरिकी ऐसे लोगों को चुनना शुरू कर पाते, जिन्हें सचमुच यह पता होता कि ऐसा कैसे करना है।

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