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पाकिस्तान का नया निजाम

Thu, 26 Jul 2018 08:09 PM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Thu, 26 Jul 2018 08:09 PM IST
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New Nizam of Pakistan
इमरान की जीत

पाकिस्तान के नेशनल एसेंबली चुनाव में क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। जाहिर है, इमरान खान का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होने जा रहा है। हालांकि प्रमुख विपक्षी दलों ने इस नतीजे को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया है और चुनाव में भारी धांधली का आरोप लगाया है, जिसे वहां के निर्वाचन आयोग ने सिरे से नकारते हुए चुनाव को सौ फीसदी पारदर्शी बताया है।


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पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ के प्रमुख इमरान खान की यह जीत वास्तव में उनको वहां की सेना का दिया तोहफा है। जैसा कि मैंने अपने पिछले आलेख में भी कहा था कि पाकिस्तान में जब औपचारिक तौर पर सैन्य शासन नहीं होता, तब भी वहां की शासन-व्यवस्था में सेना का गहरा असर होता है। और इस चुनाव में तो सेना और वहां की न्यायपालिका ने भी खुलेआम इमरान खान की पार्टी का समर्थन किया और ऐसी परिस्थितियां तैयार कीं कि इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने में कोई बाधा न आए। जाहिर है, इमरान खान अगर पाकिस्तान में नई सरकार बनाते हैं, तो वह वही करेंगे, जो वहां की सेना कहेगी। चुनाव नतीजों से साफ है कि इमरान खान को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने वाला है। वह जोड़-तोड़ करके ही सरकार का गठन कर पाएंगे। वहां की सेना यही चाहती थी कि मुल्क में एक कमजोर सरकार बने, जिसे वह अपनी उंगलियों के इशारे पर नचा सके। इमरान ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में कहा है कि वह पाकिस्तान को इंसानियत का निजाम बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा, 'इंशाअल्लाह मेरी कोशिश होगी कि मुल्क के निचले तबके के जीवन स्तर को ऊपर उठाएं। मुल्क की पहचान अमीर लोगों से नहीं होती, बल्कि गरीब लोगों के जीवन स्तर से होती है।' ऐसे में, यह देखने वाली बात होगी कि नया पाकिस्तान बनाने के अपने वायदे पर वह कितना खरा उतर पाएंगे।

इस चुनाव में इमरान खान की पार्टी को जिताने के लिए पाकिस्तान की सेना ने तमाम तरह के हथकंडे अपनाए। नवाज शरीफ की पार्टी (पीएमएलएन) के नेताओं को डराया धमकाया गया और इमरान खान की पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने के लिए कहा गया। जिन नेताओं ने ऐसा करने से इन्कार किया, उन्हें कई तरह के आरोप लगाकर प्रताड़ित किया गया। सेना ने इस चुनाव में साढ़े तीन लाख से ज्यादा जवानों को तैनात किया। इस तरह पाकिस्तान की सेना ने इमरान खान को चुनाव जिताने के लिए बेहद अनुकूल माहौल तैयार किया।

अपने चुनावी घोषणा पत्र में इमरान खान ने कहा है कि वह भारत के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करेंगे और कश्मीर समस्या का हल तलाशेंगे। नतीजे आने के बाद भी उन्होंने कहा कि 'भारत के साथ हम तिजारती रिश्ते बढ़ाना चाहेंगे।’ उन्होंने कश्मीर के मसले पर कहा कि ‘सेना से नहीं, बल्कि संवाद से कश्मीर की समस्या का समाधान होगा। दोनों मुल्कों के बीच शांति, दोनों के हित में है।' लेकिन भारत को इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं पालनी चाहिए कि अगर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, तो अपने पड़ोसी से हमारे रिश्ते सुधर जाएंगे या कश्मीर समस्या का हल हो जाएगा, जैसा कि हर बार पाकिस्तान में कोई नया प्रधानमंत्री बनता है, तो हम उम्मीद पालने लगते हैं। दरअसल पाकिस्तान के किसी भी हुकूमत में इतनी ताकत नहीं रही है कि वह सेना की इच्छा के खिलाफ जाकर भारत से संबंध सुधारने की बात करे या कश्मीर समस्या का समाधान तलाशे। सबसे पहले तो वहां की सेना उनसे यही सौदा करेगी कि वे विदेश नीति और सुरक्षा के मामले से अलग रहें। कश्मीर समस्या वहां की भारत-विरोधी भावना के मूल में है, जिसकी घुट्टी पाकिस्तान की सेना ने वहां के लोगों को पिलाई है। भारत-विरोधी भावना ही पाकिस्तान की सेना की प्रमुखता का कारण है। अगर भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते सुधर गए, तो वहां की सेना का शासन-व्यवस्था में वर्षों से चला आ रहा वर्चस्व खत्म हो जाएगा, जिसे सेना किसी भी हालत में होने नहीं देगी।
 
इमरान खान की सरकार इतनी ताकतवर नहीं होगी कि मुल्क को ठीक ढंग से चला सके, भारत से संबंध सुधारने की बात तो दूर रही। पाकिस्तान में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच आपस में भेदभाव और मतभेद है। कानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है। पाकिस्तान के सामने बहुत बड़ी आर्थिक चुनौती है। इन सब क्षेत्रों में सुधार उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। मगर विदेश नीति और सुरक्षा के मामले पर सेना का वर्चस्व पहले की तरह ही बना रहेगा और इन मामलों में इमरान खान अपने मन से कोई कदम नहीं उठा पाएंगे। वह वही करेंगे, जिसकी इजाजत वहां की सेना उन्हें देगी। जिस दिन उन्होंने सेना की इच्छा के विरुद्ध कोई कदम उठाने की सोची, उसी दिन से उनकी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण नवाज शरीफ हैं, जो एक समय सेना के सबसे चहेते नेता थे, लेकिन सेना के साथ मतभेद बढ़ने पर आज उनका क्या हश्र हुआ, यह सबके सामने है। इसलिए इमरान खान से बहुत उम्मीद पालने की जरूरत नहीं है। उल्टे इस बात की आशंका बढ़ गई है कि इमरान खान के सत्ता में आने के बाद कट्टरपंथियों को काफी राहत मिलेगी। ये कट्टरपंथी भी वहां की सेना के ही पाले-पोसे हुए हैं और उन्हें भारत के खिलाफ आतंकवादी कार्रवाइयों के लिए सेना की तरफ से हथियार और आर्थिक सहायता मिलती रही है। इसलिए भारत को सजग और सचेत रहना होगा।

वैसे इमरान खान को वहां ईमानदार नेता माना जाता है। वहां के लोगों ने इसी उम्मीद में उन्हें चुना होगा कि वे लोगों के टैक्स के पैसे का सदुपयोग करें और मुल्क से गरीबी, बेरोजगारी खत्म कर मुल्क को तरक्की की राह पर आगे ले जाएं। पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी में जिंदगी बसर कर रही है और पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुधार के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। अब देखना है कि इन सब चुनौतियों से वह कैसे उबरते हैं और कब तक सेना के साथ उनकी जुगलबंदी चलती है!

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