{"_id":"64fe7c3b48a3ae1eb301d118","slug":"isro-moon-mission-chandrayaan-3-cost-and-it-economics-2023-09-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"चंद्रयान-3: अंतरिक्ष कार्यक्रम का अर्थशास्त्र और देश-दुनिया का समाजशास्त्र","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
चंद्रयान-3: अंतरिक्ष कार्यक्रम का अर्थशास्त्र और देश-दुनिया का समाजशास्त्र
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
चंद्रयान 3
- फोटो :
ANI
विस्तार
चंद्रयान-3 ने विगत 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचकर सॉफ्ट लैंडिंग करने में सफलता प्राप्त की थी। चंद्रयान-3 इसरो का तीसरा चंद्र मिशन तो है ही, जिसकी शुरुआत विगत 14 जुलाई को हुई थी, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में पहुंचने वाला यह दुनिया का पहला अंतरिक्ष यान भी था।
चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग के बाद भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंच चुका है और अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत अब दुनिया के अंतरिक्ष कार्यक्रम का प्रमुख खिलाड़ी बन गया है। हालांकि अपने यहां ही कुछ लोग अंतरिक्ष कार्यक्रम की यह कहकर आलोचना करते हैं कि भारत एक गरीब देश है, जो इस प्रकार के कार्यक्रमों का खर्च वहन नहीं कर सकता। ऐसे लोगों का कहना है कि अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर खर्च करने के बजाय देश में गरीबों के लिए सुविधाएं मुहैया करने के लिए खर्च करना चाहिए। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर खर्च करने के बजाय यदि अपने देश की सुरक्षा पर अधिक खर्च किया जाता, तो वह बेहतर होगा।
पर समझना होगा कि चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत के प्रति दुनिया के रवैये में महत्वपूर्ण बदलाव आने वाला है। वैश्विक जीडीपी रैकिंग में भारत वर्ष 2014 में 10वें स्थान पर था, जबकि इस साल अपना देश पांचवें स्थान पर पहुंच गया है। वर्ष 2025 तक इसके चौथे स्थान पर और 2028 तक तीसरे स्थान पर पहुंचने की उम्मीद है। क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर भारत 12 अरब डॉलर से अधिक की जीडीपी के साथ तीसरे स्थान पर पहले ही पहुंच चुका है।
दुनिया में अंतरिक्ष मिशनों की बड़ी लागत रही है, पर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों का बजट दुनिया के लिए एक मिसाल है। चंद्रयान-3 की ही बात करें, तो इसका बजट मात्र 615 करोड़ रुपये (750 लाख अमेरिकी डॉलर) है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम जिस किफायत के साथ संचालित होता है, यह दुनिया को अचंभे में डालने वाला है। अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाने वाली निजी कंपनी के स्वामी एलन मस्क ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की तारीफ करते हुए कहा कि हॉलीवुड की एक विज्ञान फिल्म इंटरस्टेलर की लागत 16.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर थी, जिसकी तुलना में भारत के चंद्रयान-3 मिशन की लागत मात्र 7.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर ही है।
अमेरिका के पहले चरण के चंद्रमा मिशन पर, जिसे अपोलो कार्यक्रमों के रूप में जाना जाता है और जो 1961 से 1972 के बीच में चला, वर्ष 1973 में 25.8 अरब डॉलर खर्च हुए थे, जो 2021 के 164 अरब डॉलरों के बराबर था। अपने यहां चार लेन के 20 किलोमीटर सामान्य हाई-वे के निर्माण पर जितना खर्च होता है, उससे कम लागत पर हमने चंद्रमा पर चंद्रयान उतार दिया है!
भारत विश्व की महाशक्तियों समेत कई और देशों के अंतरिक्ष यान (उपग्रह) लॉन्च करने में सफल रहा है। इसरो ने हाल के वर्षों में अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, इटली, सिंगापुर और इंग्लैंड सहित 20 से अधिक देशों के उपग्रह लॉन्च किए हैं। वर्ष 1993 में भारत ने पहली बार पीएसएलवी (पोलर सैटलाइट लॉन्च व्हीकल) की शुरुआत की। आज तक इसकी 58 उड़ानें हो चुकी हैं, जिनमें 55 पूर्णतः सफल, एक आंशिक सफल और दो विफल रही हैं। हर लॉन्च की कीमत उसकी धारण क्षमता के अनुसार 130 करोड़ से 200 करोड़ रुपये होती है। लेकिन दूसरे देशों के उपग्रहों को भी अंतरिक्ष में छोड़ने से इसरो की वसूली कहीं ज्यादा हो जाती है। पीएसएलवी की 37वीं उड़ान ने तो 104 उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर इतिहास भी रचा था।
अपने यहां इसरो द्वारा उपग्रह लॉन्च करने के लिए 30 से 40 हजार डॉलर प्रति किलोग्राम भार लिए जाते हैं, जो अमेरिकी एजेंसी नासा से कहीं कम है। देश की निजी कंपनियों के अंतरिक्ष बाजार में प्रवेश से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तथा लागत और भी कम होगी। इसरो ने इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। कम लागत के कारण उम्मीद है कि आने वाले समय में देश वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करने में सफल होगा, जो महाशक्ति बनने की दिशा में भारत का पहला कदम होगा।