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अंतरराष्ट्रीय: ट्रंप को शांति क्यों चाहिए? नैरेटिव और वैश्विक राजनीति के हिसाब से नोबेल या रेमन मैग्सेसे...
Fri, 11 Jul 2025 07:10 AM IST
ज्योति भास्कर
शिवेश प्रताप, अमर उजाला।
शिवेश प्रताप, अमर उजाला।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Fri, 11 Jul 2025 07:10 AM IST
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में नोबेल शांति पुरस्कार पाने की उत्सुकता, उनके द्वारा की गई लॉबिंग की खबरें और यहां तक कि पाकिस्तान और इस्राइल जैसे देशों से मिली सिफारिशें, ये घटनाएं दर्शाती हैं कि वैश्विक सम्मान उपलब्धियों से अधिक राजनीतिक छवि निर्माण के औजार बन चुके हैं। जिस तरह से ट्रंप ने अब्राहम समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए अपने सहयोगियों को नामांकन के लिए प्रोत्साहित किया, यह स्पष्ट संकेत है कि प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार लगातार प्रतीकात्मक पूंजी बनता जा रहा है, जिनका उपयोग वैश्विक प्रभाव और धारणा-युद्ध में किया जा रहा है।
नोबेल के अलावा, सखारोव पुरस्कार, राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड (स्वीडन), रेमन मैग्सेसे जैसे अन्य वैश्विक सम्मान भी आलोचना के घेरे में हैं, क्योंकि इनकी चयन प्रक्रियाएं पश्चिमी शासन व्यवस्था की वैचारिक प्राथमिकताओं को दर्शाती हैं। कभी किसी देश में विरोध को बढ़ावा देने, कभी शासन-सत्ता के बदलाव को समर्थन देने और कभी प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों के ‘सुधारवादियों’ को शांति का प्रतीक बताने के रूप में ये पुरस्कार अब वैश्विक नैरेटिव युद्ध के हथियार बन चुके हैं, जिन्हें शांति, मानवाधिकार और मानवीय मूल्यों की चाशनी में लपेटकर परोसा जाता है। इन ‘सम्मान’ को वैश्विक नैतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। खासकर उन राष्ट्रों के खिलाफ, जो राष्ट्रवादी, बहुध्रुवीय या सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर रास्ता चुनते हैं, जैसे कि भारत। 1973 में, नोबेल शांति पुरस्कार पेरिस शांति समझौते के लिए हेनरी किसिंजर और ले डक थो को दिया गया, जबकि किसिंजर को कंबोडिया में गुप्त बमबारी का आदेश देने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी थी। ले डक थो ने पुरस्कार ठुकराते हुए कहा कि यह शांति ‘मिथ्या’ है। दलाई लामा को चीन की सत्तावादी नीतियों के प्रति पश्चिमी विरोध के रूप में, तो मिखाइल गोर्बाचेव को शांति का नोबेल पश्चिम द्वारा सोवियत आत्मसमर्पण के उत्सव के रूप में देखा गया। बराक ओबामा ने तो खुद माना था कि वह नोबेल शांति पुरस्कार के हकदार नहीं थे।
भारत में 2021 का नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन यह साबित करने वाला एक अहम मोड़ था कि किस तरह अंतरराष्ट्रीय मंच अब घरेलू राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय हस्तक्षेप कर रहे हैं। शाहीन बाग आंदोलन की प्रतीक बनीं बिलकिस दादी को टाइम की ‘विश्व की 100 सबसे प्रभावशाली शख्सियतों’ की सूची में शामिल किया गया। पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन को समर्थन देते हुए जो ट्वीट किया, उसमें जुड़े ‘टूलकिट’ लिंक ने विदेशी पीआर नेटवर्क की रणनीति को उजागर किया। नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने पर्यावरणीय चिंताओं को उजागर किया, पर यह आंदोलन बुनियादी ढांचे के विकास को रोकने का मंच बन गया, जिसके लिए उन्हें रेमन मैग्सेसे समेत कई पुरस्कार मिले। अरविंद केजरीवाल को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि उनके एनजीओ और उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं। अन्य पुरस्कार विजेता जैसे हर्ष मंदर और संदीप पांडे ने अंतरराष्ट्रीय मंचों का उपयोग सांविधानिक संस्थाओं व न्यायपालिका की आलोचना के लिए किया है। भारत ने विदेशी हस्तक्षेप पर कूटनीतिक स्तर पर भी जवाब देना शुरू किया है। चाहे वह पक्षपाती मानवाधिकार रिपोर्टों को खारिज करना हो, सेलिब्रिटी-समर्थित टूलकिट अभियानों का खंडन करना, या फिर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा घरेलू कानूनों में दखल पर विरोध दर्ज कराना हो, भारत ने अपने आंतरिक मामलों में संप्रभुता का अधिकार पहले से कहीं अधिक दृढ़ता से जताया है।