सत्ता परिवर्तन: ट्रूडो के बाद कार्नी को कमान; अमेरिकी महत्वाकांक्षा के बीच कनाडा की असल परीक्षा कूटनीतिक होगी
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विस्तार
वैश्विक स्तर पर चर्चित केंद्रीय बैंकर से कनाडा के प्रधानमंत्री तक का मार्क कार्नी का सफर नेतृत्व के नाटकीय बदलाव को दर्शाता है। बैंक ऑफ कनाडा एवं बैंक ऑफ इंग्लैंड में उनके कार्यकाल ने वित्तीय संकट मोचक की प्रतिष्ठा अर्जित की, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व की चुनौतियां बिल्कुल अलग हैं। उन्हें विरासत में एक खंडित राजनीतिक परिदृश्य मिला है, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में तेजी से संरक्षणवादी बनते अमेरिका और भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों से निपटने की चुनौती है। उनकी आर्थिक सूझबूझ राजकोषीय नीति और व्यापार संबंधों के प्रबंधन में उन्हें विश्वसनीय बनाती है, लेकिन भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों को सुधारने, शत्रुतापूर्ण व्हाइट हाउस को संभालने और कनाडा की संस्थाओं में जनता का विश्वास बहाल करने जैसी चुनौतियों को देखते हुए उनकी असल परीक्षा कूटनीतिक होगी। उनकी नेतृत्व शैली यह निर्धारित करेगी कि क्या वह वैश्विक मंच पर कनाडा की स्थिति को स्थिर करने में सफल होते हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो ने कनाडा में भारतीय समुदाय के बहुसंख्यकों को नाराज कर दिया था, क्योंकि उन्होंने खालिस्तानियों का खुलकर समर्थन किया था, जो भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों के लिए जिम्मेदार थे। नए प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है कि वह भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्षधर हैं, जो दोनों देशों के हित में है। नए प्रधानमंत्री को संबंधों को पटरी पर लाने के लिए अपने कौशल और अनुभव का उपयोग करना होगा। वर्ष 2021 की जनगणना के अनुसार, कनाडा में भारतीय समुदाय की संख्या लगभग 18,58,755 है, जो राष्ट्रीय जनसंख्या का लगभग 5.1 फीसदी है। इस जनसांख्यिकी ने कनाडा के बहुसांस्कृतिक परिदृश्य को काफी प्रभावित किया है, खासकर टोरंटो, वैंकूवर, कैलगरी, एडमॉन्टन और मॉन्ट्रियल जैसे शहरी केंद्रों में। कनाडा की राजनीति में भारतीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है तथा शासन में उनके प्रतिनिधित्व के महत्व को उजागर करती है। लेकिन जून 2023 में ब्रिटिश कोलंबिया में हुई सिख अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद अक्तूबर, 2024 में कनाडा और भारत के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया। जस्टिन त्रूदो ने भारत सरकार पर कनाडा में हिंसा की साजिश रचने का आरोप लगाया, जिसके चलते राजनयिकों को निष्कासित किया गया और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा हुआ। इससे कनाडा स्थित भारतीय समुदाय के बीच चिंता पैदा हो गई, खासकर आव्रजन, शिक्षा और आर्थिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में।
नए प्रधानमंत्री को भारतीय समुदाय के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ना होगा। उनकी चिंताओं को संबोधित करना, समावेशी नीतियों को बढ़ावा देना और भारत के साथ राजनयिक संबंधों को सुधारने की दिशा में काम करना कनाडा के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में इस जीवंत समुदाय की भलाई और निरंतर योगदान सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होंगे। कनाडा में समावेशी शासन को बढ़ावा देने के लिए भारतीय समुदाय के योगदान को पहचानना और उसका मूल्यांकन करना आवश्यक है। नए प्रधानमंत्री को इस जीवंत समुदाय के साथ जुड़ने से सामाजिक सामंजस्य को मजबूत करने तथा ऐसी नीतियों को बढ़ावा देने के अवसर मिलेंगे, जो विविधता और समावेशन के प्रति कनाडा की प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करती हैं। कार्नी ने राजनीतिक मतभेदों के बीच कार्यभार संभाला है। लिबरल पार्टी के प्रति जनता का भरोसा कम हुआ है, खासकर पश्चिमी कनाडा में, जहां त्रूदो की नीतियों ने तेल-निर्भर प्रांतों को अलग-थलग कर दिया। इस बीच, दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद ने गति पकड़ी है। बेशक उन्हें चुनावी अनुभव नहीं है, लेकिन एक आर्थिक रणनीतिकार के रूप में उनकी विश्वसनीयता उन्हें मतदाताओं का विश्वास हासिल करने में मदद कर सकती है।
मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना, ब्याज दरों को स्थिर करना और क्षमता संबंधी चिंताओं को दूर करना उनकी तत्काल प्राथमिकताएं होंगी। प्रभावी ढंग से शासन करने के लिए प्रगतिशील और रूढ़िवादी, दोनों मतदाताओं से समर्थन पाना महत्वपूर्ण होगा, जबकि पार्टी के भीतर और मध्यमार्गी मतदाताओं के बीच विश्वास बहाल करना उन्हें राजनीतिक दीर्घायु प्रदान करेगा। कार्नी को भारत के साथ संबंधों को सुधारने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ सीधी बातचीत शुरू करना तथा सार्वजनिक आरोपों से बचना होगा, क्योंकि इससे संबंधों में और अधिक कड़वाहट पैदा हो सकती है। कनाडा से संचालित खालिस्तान समर्थक उग्रवाद के बारे में भारत की चिंताओं का समाधान करना तथा भारत के साथ आतंकवाद-विरोधी सहयोग को मजबूत करना जरूरी है। भारत के रॉ और आईबी के साथ खुफिया जानकारी साझा करना, आतंकवादियों को वित्तपोषित करने या भारत के खिलाफ हिंसा भड़काने में शामिल लोगों को निर्वासित करने पर विचार करना, तथा चरमपंथी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए द्विपक्षीय सुरक्षा कार्यबल की स्थापना करना, भारत की सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए कनाडा की प्रतिबद्धता का संकेत हो सकता है।
रुके हुए कनाडा-भारत व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) पर चर्चा फिर से शुरू करना और भारत के प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में कनाडाई निवेश को प्रोत्साहित करना, कनाडा के ऊर्जा और एआई उद्योगों में भारतीय निवेश को आकर्षित करना आगे बढ़ने के लिए एक रचनात्मक मार्ग प्रदान करेगा। भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए वीजा प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों को हल करना और शैक्षणिक व सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ाना संबंधों को मजबूत करेगा। कार्नी के सामने एक नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती है-घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताओं का प्रबंधन करते हुए भारत के साथ विश्वास बहाल करना। हालांकि, उन्हें कनाडा में खालिस्तान समर्थक समूहों के राजनीतिक दबाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के आरोपों और त्रूदो के रुख का समर्थन करने वाले वामपंथी उदारवादियों के विरोध का सामना करना पड़ेगा। यदि वह एक दृढ़, लेकिन संतुलित नीति लागू करते हैं (जिसमें सिख समुदाय की रक्षा करते हुए चरमपंथियों पर नकेल कसी जाए), तो वह घरेलू अस्थिरता को बढ़ावा दिए बिना भारत-कनाडा संबंधों को सुधार सकते हैं।