फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Indian Mythology Why did Janamejaya perform the snake sacrifice know

संस्कृति के पन्नों से: जनमेजय ने क्यों किया था नाग-यज्ञ? राजा परीक्षित से जुड़ा प्रसंग जानिए...

Sun, 08 Sep 2024 05:12 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 08 Sep 2024 05:12 AM IST
विज्ञापन
सार
कलियुग के प्रभाव से परीक्षित के मन में शमीक मुनि को दंड देने का विचार आया। निकट ही एक मृत सर्प पड़ा था। परीक्षित ने अपने बाण की नोक से सर्प को उठाया और उसे ऋषि के गले में डालकर आश्रम से चला गया...
loader
Indian Mythology Why did Janamejaya perform the snake sacrifice know
ऋषि शमीक और राजा परीक्षित - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उन दिनों अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित का शासन था। परीक्षित के ही शासनकाल में द्वापर का अंत और कलियुग का आरंभ हुआ माना जाता है। कलियुग के प्रभाव से परीक्षित के हाथों एक गलत काम हो गया, जिसका मूल्य उसे प्राण देकर चुकना पड़ा। एक दिन परीक्षित वन में एक हिरण का पीछा करते हुए बहुत आगे निकल गया और मार्ग भटक गया। उसे बहुत प्यास लगी थी। मार्ग में उसे ऋषि शमीक का आश्रम मिला। शमीक मुनि उस समय आंख बंद करके ध्यान में लीन थे। इसलिए उनकी दृष्टि परीक्षित पर नहीं पड़ी।



राजा ने शमीक से पीने के लिए पानी मांगा, किंतु ध्यान में लीन मुनि ने कोई उत्तर नहीं दिया। थकान और प्यास से परेशान परीक्षित को क्रोध आ गया, क्योंकि उसके सिर पर रखे मुकुट में कलियुग बैठा था। कलियुग के प्रभाव से परीक्षित के मन में मुनि को दंड देने का विचार आया। निकट ही एक मृत सर्प पड़ा था। परीक्षित ने बाण की नोक से सर्प को उठाया और उसे ऋषि के गले में डालकर आश्रम से चला गया। शमीक का शृंगी नाम का तेजस्वी पुत्र था। उसे जब परीक्षित के हाथों हुए अपने पिता के अपमान का पता चला, तो उसे क्रोध आ गया। उसने शाप दे दिया, 'जिस पापात्मा ने मेरे पिता के गले में मृत सर्प डाला है, उसकी आज से सातवें दिन तक्षक नामक भयानक सर्प के डसने से मृत्यु हो जाएगी!' ऋषि शमीक ने शाप के बारे में सुना, तो उन्हें अपने पुत्र के अविवेक पर बड़ा दुख हुआ। उन्होंने गौमुख नाम के अपने एक शिष्य से परीक्षित के पास शृंगी के शाप का समाचार भिजवाया और कहा कि राजा परीक्षित को अपनी सुरक्षा का समुचित प्रबंध कर लेना चाहिए।


शृंगी के शाप से बचने के लिए परीक्षित ने एक सप्त-तल प्रासाद बनवाया और चहुं ओर से प्रासाद की सुरक्षा व्यवस्था करवा दी। परीक्षित को यह भी पता था कि शृंगी तेजस्वी ऋषिकुमार हैं, इसलिए उसका शाप समय पर अवश्य फलीभूत होगा। इसलिए परीक्षित ने जीवन के बचे हुए सात दिनों में महर्षि शुकदेव से उपदेश सुनने की इच्छा व्यक्त की। तब वेदव्यास के पुत्र महर्षि शुकदेव ने सात दिनों में परीक्षित को भगवद्भक्ति का महत्व समझाते हुए उपदेश दिया और वही ज्ञान आज ग्रंथ के रूप में ‘शुक-सागर' के नाम से प्रसिद्ध है।

इस बीच, सातवें दिन शाप के प्रभाव से तक्षक नाग परीक्षित को डसने के लिए चल पड़ा। उसे मार्ग में काश्यप नामक तपस्वी मिला। दोनों में बातचीत हुई, तो तक्षक को पता चला कि काश्यप, विष से परीक्षित की रक्षा करने के लिए ही जा रहे थे।

दोनों ने वहां शक्ति का प्रदर्शन किया। तक्षक ने एक वृक्ष पर विष छोड़ा, जिससे वृक्ष जलकर भस्म हो गया। परंतु काश्यप ने अपनी मंत्र-विद्या से वृक्ष को पुनः हरा-भरा कर दिया। तक्षक समझ गया कि काश्यप उससे अधिक शक्तिशाली है। उसने काश्यप को बहुत-सा धन देकर मार्ग से ही लौटा दिया और स्वयं परीक्षित के महल तक पहुंच गया। फिर उसने एक कीड़े का रूप धारण किया और एक फल के भीतर छिपकर राजा परीक्षित के पास पहुंच गया। राजा के लिए फल काटा गया, तो उसमें से एक कीट निकला, जो रक्तवर्ण था। उसे देखकर सबको संदेह हुआ, किंतु परीक्षित ने कहा, 'सूर्य अस्ताचलगामी है, अतः मुझे तक्षक से अब कोई भय नहीं है।' परंतु होनी को कौन टाल सकता है! शृंगी का शाप फलीभूत होना तय था। राजा अभी कीट को देख ही रहा था कि वह भयंकर तक्षक नाग में परिवर्तित हो गया। अगले ही क्षण उसने परीक्षित को डस लिया और राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई।

परीक्षित की मृत्यु के कई वर्ष बाद उसके पुत्र जनमेजय को जब अपने पिता की मृत्यु का कारण पता चला, तो उसने नाग-जाति से प्रतिशोध लेने के लिए यह संकल्प लिया कि वह तक्षक समेत संसार के समस्त सर्पों को यज्ञ की अग्नि में जलाकर भस्म कर देगा। इसी उद्देश्य से ‘जनमेजय के नाग-यज्ञ’ का आयोजन हुआ था। अगली कथा में आपको नाग-यज्ञ का परिणाम बताएंगे!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed