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संस्कृति के पन्नों से: दशानन का नाम ‘रावण’ कैसे पड़ा..., भगवान शिव की स्तुति से मिला आशीर्वाद
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दशानान का नाम रावण कैसे पड़ा
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अमर उजाला
विस्तार
विश्रवा और कैकसी का पुत्र दशानन अत्यंत बलवान हो चुका था। उसने कठोर तप द्वारा अनेक तरह के वरदान और शक्तियां अर्जित कर ली थीं। अल्पायु में प्राप्त सफलता ने दशानन को अहंकारी और उद्दंड बना दिया। अहंकार के चलते एक दिन दशानन, पुष्पक विमान में बैठकर कैलाश पर्वत के ऊपर से जा रहा था। सहसा उसका विमान ठहर गया। इसी बीच, एक विशालकाय वृषभ उनके सामने प्रकट हो गया। ‘दशग्रीव,’ वृषभ बोला, ‘यह पावन प्रदेश भगवान शंकर के अधीन है। वह इस समय अपनी पत्नी के साथ हैं। तुम अपनी दिशा बदलकर दूसरी ओर से आगे जाओ।’
‘मूर्ख! मुझे रोकने वाला तू कौन है?’ दशानन ने क्रोध में कहा। ‘मैं नंदी हूं!’ वृषभ ने धीरे-से उत्तर दिया। ‘मैं महादेव का वाहन और सेवक हूं। उनके आदेश का उल्लंघन करना मृत्यु को निमंत्रण देने के समान है। तत्काल अपना मार्ग बदलो और यहां से चले जाओ।’ ‘वृषभ, तुमने शायद मुझे पहचाना नहीं... मैं राक्षसराज दशग्रीव हूं!’ दशानन ने रौब से कहा। ‘मुझे मृत्यु का भय मत दिखाओ। मैंने त्रिलोक पर विजय प्राप्त करने का संकल्प लिया है। मुझे कोई नहीं रोक सकता। स्वयं महादेव भी नहीं! मेरा मार्ग छोड़ दो, अन्यथा...’ ‘अन्यथा क्या?’ नंदी ने पूछा। ‘कैलाश ने तुम्हारा मार्ग रोका है। तुम कैलाश का कुछ बिगाड़ सकते हो?' मैं इसे उखाड़ कर फेंक दूंगा!’ अहंकारी दशानन ने चिढ़कर कहा। ‘यह उत्तम विचार है!’ नंदी ने कहा। ‘आगे जाना है, तो कैलाश को उखाड़ना ही एकमात्र उपाय है।' नंदी ने दशग्रीव को भड़का दिया। मारीच ने दशग्रीव को रोका-‘महाराज, इस वृषभ की बातों में मत आइए। यह महादेव का निवास-स्थल है। हम दूसरे मार्ग से घूमकर चलते हैं।’ ‘तुम्हारा मंत्री समझदार जान पड़ता है,’ नंदी ने व्यंग्य किया। ‘वैसे भी संभवत: तुमसे पर्वत नहीं उठेगा।’
अहंकार का आकार विशाल, किंतु उसकी नींव दुर्बल होती है। दशग्रीव तुरंत नंदी के जाल में फंस गया। शक्ति और सत्ता के घमंड में डूबे दशानन ने कैलाश की जड़ों में अपनी बलशाली भुजाएं फंसा दीं और पर्वत को उठाने की चेष्टा करने लगा।
दशग्रीव इतना शक्तिशाली था कि उसके हाथ लगाने से कैलाश भी कांपने लगा। पर्वत पर रहने वाले पशु-पक्षी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। पर्वत पर हुई हलचल ने शंकर और पार्वती का भी ध्यान भंग कर दिया। पार्वती ने इसका कारण पूछा, तो महादेव बोले, ‘देवी, आप चिंता मत कीजिए। एक उन्मादी और घमंडी राक्षस पर्वत को हिला रहा है। उसे सबक सिखाने का समय आ गया है।’
फिर शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को नीचे की ओर थोड़ा-सा दबा दिया। उनके ऐसा करते ही दशग्रीव की बलशाली भुजाएं पर्वत के नीच दब गईं। दशग्रीव को भयंकर पीड़ा हुई। उसकी चीत्कार से तीनों लोक कांप उठे। उसे सुनकर देवता तक विचलित हो उठे। लंकेश को कष्ट में देखकर मारीच ने फिर समझाया, ‘महाराज! आपके इस दुस्साहस से भगवान शंकर कुपित हो गए हैं। आप उनकी स्तुति कीजिए, क्योंकि अब वही आपकी रक्षा कर सकते हैं।’
दशानन का घमंड चूर हो चुका था। वह समझ गया कि भगवान शिव की उपासना ही बचाव का एकमात्र उपाय था। तब दशानन ने शिव की स्तुति में एक स्तोत्र की रचना की, जिससे प्रसन्न होकर शिव ने दशग्रीव को दर्शन दिए और कहा, ‘मैं तुमसे प्रसन्न हूं। मैं केवल तुम्हारा घमंड तोड़ना चाहता था। कैलाश को हिलाना सचमुच विकट कार्य है। भुजाओं के दब जाने से तुम्हें अवश्य कष्ट हुआ होगा। उस क्षण तुमने त्रिलोक को प्रकंपित करने वाला चीत्कार किया था। इसलिए मैं तुम्हें एक नया नाम देता हूं–रावण! अब तुम निर्भय होकर कैलाश को पार करके जा सकते हो। मैं तुम्हें चंद्रहास नाम की दिव्य तलवार भी प्रदान करता हूं।’ शिव के दर्शन से रावण पुन: स्वस्थ हो गया। इस प्रकार अहंकारी दशानन का नाम ‘रावण’ पड़ा और उसे शिव से चंद्रहास नामक तलवार भी प्राप्त हुई।