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जानना जरूरी है: राजा सत्यव्रत कैसे बन गया ‘त्रिशंकु’? महातपस्वी विश्वामित्र से जुड़ी है कथा

Sun, 17 May 2026 08:53 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 17 May 2026 08:53 AM IST
सार

वशिष्ठ ने सत्यव्रत से कहा, यदि तूने बाद के दो पाप न किए होते, तो मैं तेरे पहले पाप को क्षमा कर देता। तीन पापों के कारण आज से तू ‘त्रिशंकु’ कहलाएगा।’

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Indian Mythology How Did King Satyavrata Become Trishanku  Legend Is Linked to Ascetic Vishwamitra know detail
संस्कृति के पन्नों से - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

राजा मान्धाता के वंश में त्रय्यारुण का जन्म हुआ। आगे चलकर, त्रय्यारुण के यहां एक महाबली पुत्र ने जन्म लिया। उसका नाम सत्यव्रत रखा गया। दुर्भाग्य से, सत्यव्रत की बुद्धि खोटी थी। वह पराई स्त्रियों का हरण करके उनके विवाह आदि में प्राय: विघ्न डाल देता था। एक बार उसने बचपना, काम, मोह, हर्ष और चपलता के कारण किसी अन्य व्यक्ति की विवाहिता पत्नी तक को छीन लिया था। इसी प्रकार उसने काम के वश में होकर एक बार किसी पुरवासी की अविवाहित कन्या का हरण कर लिया। ऐसे घोर पाप-कर्मों के कारण राजा त्रय्यारुण ने क्रोध में एक दिन सत्यव्रत को राज्य से निकाल दिया और कहा, ‘नीच! तू चला जा यहां से!’

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पिता के ऐसे कठोर वचन सुनकर सत्यव्रत ने पिता से ही पूछा, ‘अब मैं कहां जाऊं?’ यह सुनकर उसके पिता राजा त्रय्यारुण ने कहा, ‘कुलकलंक! जा, तू श्वपाकों (चांडालों की एक जाति) के साथ रह। मैं तुझ-जैसे पुत्र का पिता नहीं कहलाना चाहता।’ पिता द्वारा निकाल दिए जाने के बाद सत्यव्रत राज्य छोड़कर चला गया।
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उस समय पर महर्षि वशिष्ठ ने भी त्रय्यारुण को अपने पुत्र का परित्याग करने से नहीं रोका। पिता का घर छोड़कर सत्यव्रत, चांडालों की बस्ती में जाकर रहने लगा। कुछ समय बाद राजा त्रय्यारुण ने भी राज्य से विरक्त होकर वनवास ले लिया। राज्य में अधर्म को बढ़ते देखकर देवराज इंद्र ने राज्य में बारह वर्षों तक वर्षा नहीं की। संयोग से, उन्हीं दिनों महातपस्वी विश्वामित्र भी उसी प्रदेश में अपनी पत्नी को न्यास (धरोहर) रूप में रखकर स्वयं भयंकर तप कर रहे थे। विश्वामित्र की पत्नी अपने कुटुंब के पालन के लिए अपने मंझले पुत्र के गले में रस्सी बांधकर उसे सौ गायों के मूल्य पर बेचने के लिए हाट लेकर जा रही थी। उस समय राजकुमार सत्यव्रत भी वहीं था। उसे जब पता चला कि वह बालक, विश्वामित्र का पुत्र है, तो उसने बालक को छुड़वा लिया। फिर सत्यव्रत ने विश्वामित्र को संतुष्ट करने और उनकी कृपा पाने के लिए उस बालक का पालन-पोषण भी किया। गले में बंधन पड़े होने के कारण वह बालक ‘गालव’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
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विश्वामित्र के प्रति श्रद्धा-भक्ति और उनके असहाय कुटुंब के प्रति दया से प्रेरित होकर सत्यव्रत ने विनयपूर्वक विश्वामित्र की पत्नी और संतान का पालन-पोषण आदि किया।

वह कंद, बराही कंद, महिष कंद आदि जंगली कंद-मूल लाकर उनका गूदा आश्रम के पास वृक्षों में बांध देता था। इस बीच, त्रय्यारुण के वनवास में चले जाने का समाचर सुनकर सत्यव्रत ने बारह वर्षों तक गुप्त रूप से व्रत रखने का प्रण ले लिया।

उधर, त्रय्यारुण के जाने के बाद अयोध्या की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं बचा था। अत: कुलपुरोहित वशिष्ठ ने अयोध्या, राज्य और रनिवास की रक्षा का दायित्व भी पूरा किया। हालांकि सत्यव्रत, वशिष्ठ से अप्रसन्न था, क्योंकि धर्म के ज्ञाता होते हुए भी वशिष्ठ ने त्रय्यारुण को अपने पुत्र का परित्याग करने से रोका नहीं था। परंतु इसका भी एक विशेष कारण था। विवाह के मंत्र सप्तपदी के पूर्ण होने पर ही सिद्ध माने जाते हैं। इसलिए वह सत्यव्रत से प्रायश्चित्त कराना चाहते थे, परंतु सत्यव्रत उनके इस गूढ़ आशय को समझ नहीं सका।

राजा त्रय्यारुण के असंतोष के कारण ही इंद्र ने राज्य में बारह वर्षों तक वर्षा नहीं की थी। वशिष्ठ ने सोचा कि यदि सत्यव्रत, कठिन दीक्षा पूर्ण कर लेगा, तो उसके कुल का उद्धार हो जाएगा। यही सोचकर वशिष्ठ ने उसे जाने से नहीं रोका था। उनका विचार था कि प्रायश्चित्त के बाद वह सत्यव्रत को राज्य सौंप देंगे। सत्यव्रत ने भी चुपचाप बारह वर्ष तक व्रत धारण किया।


एक दिन, कंद-मूल न मिलने पर सत्यव्रत की दृष्टि वशिष्ठ के पाले हुए पशु पर पड़ी। उसने मोह और भूख से पीड़ित होकर उस पशु को मारकर अपनी क्षुधा शांत की। जब यह बात वशिष्ठ को पता चली, तो वह क्रोधित हो उठे और बोले, ‘दुष्ट! पहले, तूने अपने पिता को अप्रसन्न किया, दूसरा, तूने गुरु के पशु की हत्या की और तीसरा, तूने उस अपवित्र मांस का भक्षण भी किया। यदि तूने बाद के दो पाप न किए होते, तो मैं तेरे पहले पाप को क्षमा कर देता। परंतु तुमने तीन प्रकार के पाप किए, इसलिए तुम्हें क्षमा नहीं किया जा सकता है। आज से तू ‘त्रिशंकु’ कहलाएगा।’ इस प्रकार, राजा सत्यव्रत का नाम त्रिशंकु पड़ गया।

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