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आर्थिकी: यह कैसी केवाईसी... कई बैंकों की प्रक्रिया प्रताड़ना से कम नहीं

Mon, 20 Jan 2025 06:20 AM IST
दीपक कुमार शर्मा संजय अभिज्ञान
संजय अभिज्ञान Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Mon, 20 Jan 2025 06:20 AM IST
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सार
केवाईसी-नो योर कस्टमर-से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी करना आवश्यक है, लेकिन कई बैंकों ने इसकी प्रक्रिया को प्रताड़ना की हद तक पहुंचा दिया है।
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Indian Economy What kind of KYC is this process of many banks is no less than torture
बैंक के बाहर लगी लोगो की भारी भीड़ (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आगामी एक फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट से आम नागरिकों की सबसे बड़ी उम्मीद क्या है? जवाब के लिए आज कोई राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण हो, तो मुमकिन है कि पब्लिक के दिल की आवाज कुछ इस तरह सुनाई दे कि वित्त मंत्री जी, बाकी तो हम झेल लेंगे, मगर सबसे पहले बैंकों में बारंबार केवाईसी वेरिफिकेशन के जंजाल से छुटकारा दिलाइए।



हर चार-पांच माह की अवधि के बाद आधार, पैन, एड्रेस प्रूफ, फोटो और मोबाइल नंबर के दस्तावेज सत्यापित कराने की कवायद की पीर वही जानते हैं, जो इसे भुगत चुके हैं। ‘अपने ग्राहक को जानो’-के ऊंचे स्लोगन के साथ केवाईसी की चक्की सबको पीस रही है। इधर कुछ बैंकों ने जिस तरह केवाईसी अपडेशन के लिए खाते में लेनदेन रोकने जैसी हद पार करने वाली हरकत का सहारा लेना शुरू किया है, उससे यह जनउत्पीड़न का आकार ले रहा है। शहरों-कस्बों के निवेशक, बचतकर्ता, म्यूचुअल फंड ग्राहक और  किस्म-किस्म के लोनधारकों के अलावा देहात के वे गरीब लाभार्थी ज्यादा दुख झेल रहे हैं, जो अपनी सब्सिडी की किस्त, राशन भुगतान, सम्मान राशि या पेंशन जनधन खाते में गिरने का इंतजार करते रह जाते हैं। यह वही तबका है, जो पहले से न्यूनतम बैलेंस के नियम के कारण निष्क्रिय खातों का कहर झेल रहा था।


यूपी की एक ताजा घटना देखें। वाराणसी के पास सोनभद्र में पिछले साल 28 दिसंबर को बैंक की लाइन में खडे़ 65 वर्षीय रम्मन अचानक गिर गए। अस्पताल पहुंचने पर वह मृत पाए गए। सभी स्थानीय अखबारों में यह खबर छपी और उसकी सुर्खियों में केवाईसी को जिम्मेवार बताया गया। परिवार का आरोप था कि वह तीन दिन से पेंशन खाते की केवाईसी के लिए बैंक का चक्कर लगा रहे थे, लेकिन कभी सर्वर डाउन होने के कारण और कभी किसी और वजह से काम पूरा नहीं हो पा रहा था। इस घटना से देश के वित्तजगत को चौंक जाना चाहिए था। खाते में लेनदेन रुक जाए और यूपीआई वगैरह के भुगतान ठप हो जाएं, तो हारी-बीमारी, आंधी-पानी, सर्दी-गर्मी में कितनी ही दूर स्थित बैंक ब्रांच तक लंबा सफर मजबूरी बन जाता है। देश में एक लाख साठ हजार से ज्यादा बैंक शाखाएं हैं। लेकिन विसंगति है कि इनमें से बस 30 फीसदी ग्रामीण भारत में हैं, जहां देश की 60 फीसदी आबादी बसती है। शाखाओं के इस कम घनत्व के कारण ही वहां घर से बैंक शाखा तक का फासला कई किलोमीटर लंबा होता है।

 इस नई लीला के पीछे कौन है? जाहिर है जिस केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में देश के 53 करोड़ लोगों को जनधन खाता देने की ऐतिहासिक वित्तीय समावेशी योजना बनाई, वह क्यों चाहेगी कि खाता धारकों के साथ ऐसा सलूक हो। न ही रिजर्व बैंक चाहेगा, क्योंकि उसने तो वर्ष 2016 में जारी अपने मास्टर पॉलिसी डाॅक्यूमेंट में साफ लिखा है कि केवाईसी में पहचान पत्र, पता, मोबाइल और ईमेल ही पर्याप्त हैं। यही नहीं, 6 नवंबर, 2024 को जारी नोटिफिकेशन में रिजर्व बैंक ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि अगर कस्टमर के केवाईसी में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो  ईमेल से भेजा गया उसका सेल्फ डिक्लेरेशन भी सत्यापन के लिए पर्याप्त होगा। नियम यह भी है कि यदि कस्टमर सामान्य रिस्क श्रेणी वाला है, तो दस साल में एक बार सत्यापन भी मान्य होगा। मगर कितने बैंक हैं, जहां इन नियम-कायदों की अनदेखी नहीं हो रही? वित्तीय लेनदेन की निगरानी वाले बिचौलिए विभाग और कुछ रिटेल बैंक विलेन बनकर उभर रहे हैं। उधर अनेक केस स्टडी देख चुके विशेषज्ञ बताते हैं कि केवाईसी के बहाने बीमा या म्यूचुअल फंड जैसे थर्ड पार्टी प्रोडक्ट्स की बिक्री का माहौल बनाया जाता है। एक गंभीर खतरा यह भी है कि ग्राहकों की ताजा गोपनीय जानकारी का कीमती डाटाबेस निजी कंपनियों को बेचा जा सकता है।

कई जगह गांव-देहात में जनधन खाते खोलने का टारगेट पूरा करने की होड़ में कतिपय कर्मियों ने खासी हड़बड़ी में केवाईसी की जानकारी दर्ज की थी। डाटा एंट्री ऑपरेटर और क्लर्कों के स्तर पर हुई गलतियां तो अपनी जगह हैं ही, कोढ़ में खाज की तरह आधार कार्ड में दर्ज हुई पुरानी गलतियां भी उनमें जुड़ जाती हैं। अब जब यह मोबाइल और पैन से लिंक हो गया है-उसकी एक-एक बारीकी नाजुक हो चली है। बेशक, ऑनलाइन धोखाधड़ी के चलते केवाईसी की पड़ताल आवश्यक है। लेकिन जिस तरह खाने में मक्खी गिरने के डर से आप रसोईघर पर ताला नहीं लगा सकते, उसी तरह दुरुपयोग के अंदेशे में किसी का अकाउंट नहीं फ्रीज किया जा सकता। अगर सरकारी विभाग साइबर अपराधियों से निपटने में सक्षम नहीं हैं या बैंकों में स्टाफ कम है, तो ये उनकी अपनी समस्याएं हैं। उनका खामियाजा आम खाताधारक क्यों भुगतें? केवाईसी की व्यवस्था खाताधारकों के लिए कष्टकारी नहीं, मददगार हो, क्या ऐसी व्यवस्था नहीं की जा सकती? उम्मीद है वित्त मंत्री एक नई, सरल केवाईसी नीति बनाने की दिशा में कदम उठाएंगी।

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