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बढ़ती आबादी, घटता पानी
मुहम्मद खालिद जीलानी
Updated Wed, 21 Mar 2018 07:21 PM IST
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मु. खालिद जीलानी
पानी की उपलब्धता और शुद्ध पेयजल की किल्लत ने मानव जाति की चिंता बढ़ा दी है। 22 मार्च, 1993 को संयुक्त राष्ट्र ने विश्व जल दिवस घोषित कर शुद्ध पानी की किल्लत की तुलना ‘टाइम बम’ से करते हुए आने वाले समय में मानव जाति को एक बड़े खतरे से आगाह किया था। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि विश्व में करीब बीस फीसदी लोगों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं है और लगभग पचास फीसदी लोगों को साफ पानी उपलब्ध नहीं है। तेजी से भूमिगत जल का दोहन गंभीर खतरे का संकेत है।
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देश के ज्यादातर छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और देहातों में पेयजल की किल्लत आम बात है। सामाजिक विकास और जनसंख्या वृद्धि के साथ जहां आदमी के जीवन स्तर में सुधार हुआ है, वहीं प्राकृतिक संपदा और संसाधनों का तेज रफ्तार से दोहन भी हुआ है। दुनिया की करीब नब्बे फीसदी आबादी भूमिगत जल स्रोतों पर निर्भर है। आबादी का बोझ हमारे प्राकृतिक जल संसाधनों पर इतना बढ़ गया है कि वे जवाब दे गए हैं। रोजमर्रा की जरूरतों के साथ कृषि और उद्योगों की जरूरतों में सैकड़ों गुना का इजाफा हुआ है। यही भूमिगत जल संसाधनों के तेज दोहन की वजह है। नतीजतन नदी, नाले, तालाब, पोखर सभी सूखते नजर आ रहे हैं। जो बची-खुची नदियां हैं, वे भी प्रदूषण और गंदगी के कारण कूड़ाघर में तब्दील होती जा रही हैं।
भूमिगत जल से लगभग सत्तर फीसदी भूमि की सिंचाई की जाती है, जबकि अन्य सभी परियोजनाओं द्वारा प्राप्त पानी के जरिये शेष कृषि योग्य भूमि की सिंचाई की जाती है। साथ ही देश के अधिकांश राज्यों में भूमिगत जल का इस्तेमाल छोटे-छोटे उद्योगों और पेयजल के रूप में किया जाता है। अभी तक हम दोबारा भर जाने वाले भूमिगत जल के सिर्फ एक तिहाई हिस्से का ही इस्तेमाल कर सके हैं। किंतु बढ़ते औद्योगिकीकरण और विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पानी के बेहिसाब इस्तेमाल से शेष बचे जल को हम इस्तेमाल से पहले ही प्रदूषित कर बर्बाद कर देते हैं। नतीजतन बढ़ती आबादी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध करा पाना अब नामुमकिन-सा लग रहा है।
एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, साठ करोड़ लोग जलापूर्ति के संकट से जूझ रहे हैं, देश के सिर्फ 59 जिलों में ही भूजल पीने के लिए सुरक्षित है, 54 फीसदी इलाका पानी के भारी संकट से जूझ रहा है, 40 फीसदी भूजल का दोहन हर वर्ष शहरीकरण और उद्योगों के लिए, जबकि 80 फीसदी भूजल का उपयोग घरेलू उपयोग में होता है, देश के 65 फीसदी खेतों के लिए सिंचाई की सुविधा नहीं है। पिछले सात वर्षों में भूजल स्तर में 54 फीसदी गिरावट आई है। पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र आदि राज्यों के बीच अक्सर टकराव की खबरें आती रहती हैं। पहले दर्जे के शहरों में 86.55 फीसदी आबादी के लिए संगठित जलापूर्ति की व्यवस्था है, जहां प्रति व्यक्ति दैनिक औसतन 189 लीटर पानी उपलब्ध होता है, जबकि ओड़िशा जैसे राज्य के कुछ इलाकों में तो प्रति व्यक्ति जलापूर्ति मात्र आठ लीटर है, जबकि तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में प्रति व्यक्ति दैनिक जलापूर्ति मात्र पांच लीटर है। दिल्ली में अनेक स्थानों पर लोग दूषित पानी पीने को विवश होते हैं।
भारत सहित अनेक विकासशील देश आज पानी के संकट से जूझ रहे हैं। सबको साफ पानी उपलब्ध कराना आज ख्वाब जैसा है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को पहले से ज्यादा सार्थक और ठोस कदम उठाने होंगे, तभी आम आदमी को पानी मुहैया कराया जा सकेगा।