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संघीय मूल्य बने रहें: सुप्रीम फैसला अपनी जगह, सांविधानिक पदों की गरिमा-उपयोगिता-निष्पक्षता पर नए सिरे से बहस..
Mon, 14 Apr 2025 05:16 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 14 Apr 2025 05:16 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो :
PTI
विस्तार
तमिलनाडु सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर दस विधेयकों को राज्यपाल की मंजूरी के बिना कानून के रूप में लागू करना देश के सांविधानिक इतिहास में अपनी तरह का पहला मामला तो है ही, यह सांविधानिक पदों की गरिमा, उसकी उपयोगिता और निष्पक्षता पर बहस को भी नए सिरे से शुरू कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग कर फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान राज्यपाल को अनिश्चितकाल तक विधेयक को रोकने की अनुमति नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तीन महीने के भीतर विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय निर्धारित किया है, लेकिन भारत जैसे विविध और जटिल राष्ट्र में, जहां केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौती है, राज्यपाल की भूमिका को न केवल सांविधानिक, बल्कि संघीय मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में भी देखना आवश्यक है। राज्यपाल संघीय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग हैं, जो केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य करते हैं। राज्यपाल एवं तमिलनाडु सरकार के बीच टकराव को खत्म करने के लिए दिया गया यह फैसला भले ही तात्कालिक समाधान प्रतीत होता हो, पर भविष्य में समाधान के बजाय इससे जटिलताएं ही बढ़ सकती हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर सकती है।
इस फैसले से राज्यपालों की शक्ति तो सीमित होगी ही, केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक संघर्ष और भी तेज हो सकता है। संघीय व्यवस्था में केंद्र एवं राज्यों के बीच सामंजस्य और संतुलन से ही लोकतंत्र एवं देश का विकास हो सकता है, लेकिन इस फैसले से केंद्र की सत्ता को चुनौती देने वाली विपक्ष शासित राज्य सरकारें मनमाना कदम उठा सकती हैं। पश्चिम बंगाल और केरल में भी राज्यपाल से राज्य सरकारों का कई मुद्दों पर टकराव जारी है। इसलिए सबसे बड़ी चिंता की बात है कि इससे गलत परंपरा न शुरू हो जाए और संघीय ढांचा मजबूत होने के बजाय कमजोर ही न होने लगे।
इस फैसले के बाद अगर न्यायपालिका के राजनीतिक प्रभाव पर नए सिरे से बहस शुरू हो जाए, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। यह भी ध्यान देना जरूरी है कि तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच मतभेदों का आधार केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले ही तात्कालिक समाधान हो, लेकिन यह दीर्घकाल में संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकता है। राज्यपाल न केवल केंद्र और राज्य के बीच सेतु हैं, बल्कि संविधान के प्रहरी भी हैं। उनकी भूमिका लोकतंत्र और संघवाद की मजबूती के लिए आवश्यक है।