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कृषि: कैसे बढ़ेगी किसानों की आय, खेती के सहायक उद्योगों को बढ़ावा देने पर ही सुधरेगा जीवन स्तर
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विस्तार
एक बार फिर किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग को लेकर आंदोलन करने पर मजबूर हैं, जो हरियाणा के पीपली में प्रारंभ हो चुका है। मौजूदा किसान आंदोलन ठोस जमीनी हालात से पैदा हुआ है, जिसने देश के सत्ता ढांचे के मूल चरित्र को सामने ला दिया है। आजादी के सात दशकों बाद भी किसानों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। आज का किसान गरीब से और गरीब होता जा रहा है।किसानों की वर्तमान दुर्दशा के लिए सिर्फ मौजूदा सरकार ही नहीं, बल्कि सभी सरकारों की नीतियां जिम्मेदार रही हैं। मौजूदा सरकार ने अपने शहरी समर्थकों को खुश रखने के लिए मुद्रास्फीति को कृत्रिम रूप से नियंत्रित रखने की जो नीति अपनाई, उसका पहला शिकार कृषि क्षेत्र बना। इसके तहत एक तरफ राज्य सरकारों को कृषि पैदावार पर बोनस देने से रोका गया, तो दूसरी तरफ एमएसपी में उचित बढ़ोतरी करने के बजाय कृषि इनपुट की कीमत पर से सरकारी नियंत्रण भी खत्म कर दिया गया। इस वजह से इन वस्तुओं के दाम तेजी से चढ़े, जिससे खेती और भी अधिक घाटे का सौदा बन गई।
बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण के कारण कृषि योग्य भूमि का क्षेत्र जहां लगातार घटता जा रहा है, वहीं खेती की लागत बढ़ने और उपज का वाजिब मूल्य न मिलने से युवाओं का मन खेती से विरक्त होता जा रहा है, जो आने वाले समय में खाद्य संकट का संकेत है। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है, कृषि हमारे आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम रही है। भारत के किसानों के लिए कृषि मात्र जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 55 फीसदी आबादी कृषि और उससे संबंधित कार्यों में लगी हुई है। संकट में रहने के बावजूद भारतीय कृषि का अर्थव्यवस्था में योगदान वैश्विक औसत 6.1 प्रतिशत से अधिक है।
भारत दुनिया के अग्रणी कृषि उत्पादक एवं निर्यातक देशों में शामिल है, इसके बावजूद भारत के किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में ही पूरा जीवन रहता है और कर्ज में ही मर जाता है। आज किसान इतना लाचार है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा भी नहीं दिला पा रहा। कभी मौसमी घटनाओं के कारण फसल अच्छी नहीं होती, तो कभी अच्छी फसल होने पर मंडी में उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। भूजल स्तर में भारी गिरावट भी किसान की बदहाली का सबसे बड़ा कारण मानी जा सकती है।
अभी हाल ही में हैदराबाद में कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन (सीआईएफए) के बैनर तले 25 से भी ज्यादा संगठनों ने एक स्वर में आगामी लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों से किसानों की मांगों को अपने-अपने घोषणापत्र में शामिल करने की मांग की। प्रस्तावित घोषणा पत्र में संगठनों द्वारा किसान आयोग की स्थापना के साथ कर्मचारियों की तरह किसानों की आय सुनिश्चित करने के उपाय के साथ मनरेगा में किसानों को शामिल करने की मांग की है। उर्वरकों, कीटनाशकों, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसे कृषि इनपुट पर सब्सिडी बढ़ाने और जीएसटी घटाने, 50 फीसदी सब्सिडी पर डीजल उपलब्ध कराने, आवश्यक वस्तु अधिनियम को हटाने और कृषि उत्पादों की आवाजाही पर लगे प्रतिबंध हटाने की मांग की गई है।
किसानों की मांगों में रिमोट सेसिंग तकनीक का प्रयोग कर 30 दिनों के भीतर फसलों को हुए नुकसान का आकलन कर फसल बीमा के भुगतान की गारंटी देना भी इसमें शामिल है। फसलों की वास्तविक एमएसपी तय करने के लिए सीएसीपी को स्वायत्त संस्था के रूप मे पुनर्गठित करने और कमोडिटी बोर्ड में किसानों की सदस्यता बढ़ाते हुए किसानों में से ही अध्यक्ष चुनने की मांग की गई।
यूरोपीय देशों की तरह सरकार को किसानों की एकमुश्त आमदनी सुनिश्चित करनी चाहिए और यह लाभ छोटे और मझोले किसानों को दिया जाना चाहिए। खेती के सहायक उद्योग-पशुपालन और अन्य उद्योगों को बढ़ावा देने पर ही किसानों की आय में वृद्धि होगी और उनका जीवन स्तर सुधरेगा।
-लेखक पूर्व सांसद हैं।