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अमेरिकी राजदूत पर नजर: ट्रंप ने भारत को कम आंका, संवेदनशीलता दिखानी होगी... क्या गोर इन पहलुओं पर गौर करेंगे?

Tue, 09 Sep 2025 05:50 AM IST
Surendra Kumar सुरेंद्र कुमार
Updated Tue, 09 Sep 2025 05:50 AM IST
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सार
ट्रंप ने भारत के राष्ट्रीय गौरव और संकल्प को कम करके आंका है। भारत उनकी धौंस के आगे नहीं झुकेगा और उन शर्तों पर सहमत नहीं होगा, जो उसके राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध हैं। नव मनोनीत राजदूत सर्जियो गोर को भारत और भारतीय नेताओं की भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी होगी।
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Eyes on US ambassador Gore Trump underestimated India time demand sensitivity envoy to consider these aspects
राष्ट्रपति ट्रंप ने सर्जियो गोर को बनाया है भारत में अमेरिकी राजदूत (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि मायने नहीं रखती, बल्कि लेन-देन संबंधी व्यापार मायने रखता है, वह भी अमेरिकी हित में। शायद उन्हें यह देखकर अच्छा लगता है कि अमेरिका के दुश्मन और दोस्त, दोनों ही उनकी उच्च टैरिफ की धमकियों के बाद अमेरिकी हित में समझौते करने के लिए होड़ लगा रहे हैं। उनका दावा है कि उच्च टैरिफ से अमेरिकी खजाने में अरबों डॉलर आ रहे हैं। जो लोग इसका पालन नहीं करेंगे, उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। आज भारत के साथ भी यही हुआ है। रूसी तेल आयात करने के कारण अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले भारतीय माल पर कुल 50 फीसदी का शुल्क लगाया गया है। इस मनमाने और गैर-दोस्ताना निर्णय ने उस रणनीतिक साझेदारी को नुकसान पहुंचाया है, जिसे पिछले 25 वर्षों से विभिन्न दलों की अमेरिकी और भारतीय सरकारों ने इतनी लगन से पोषित किया है।



फरीद जकारिया सहित कई विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल मानी जाएगी। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन के अनुसार, भारत पर टैरिफ लगाना कोई रणनीतिक समझदारी नहीं है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल पूछते हैं: इस बेतुकी बात को कैसे उचित समझा जा सकता है? इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए थी। फरवरी, 2025 की शुरुआत में ओवल ऑफिस में भारतीय प्रधानमंत्री के बगल में बैठे, डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को व्यापार करने के लिए बहुत ही मुश्किल जगह बताया था। इससे पहले उन्होंने भारत को ‘टैरिफ किंग’ कहा था। द्विपक्षीय व्यापार समझौता उनके पहले कार्यकाल में साकार नहीं हो सका, क्योंकि मोदी कृषि, डेयरी, मत्स्य पालन और लघु उद्यम क्षेत्रों को खोलने पर सहमत नहीं हुए, जिन पर लाखों भारतीय निर्भर हैं। इन क्षेत्रों को अमेरिकी उत्पादों से भरने की अनुमति देने के भारी राजनीतिक परिणाम होंगे।


फिर भी, उनके दूसरे कार्यकाल में हुई पांच दौर की वार्ताओं में, दोनों देशों के व्यापार प्रतिनिधियों ने कथित तौर पर काफी प्रगति की थी और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए पारस्परिक रूप से स्वीकार्य व्यापार समझौते का मसौदा तैयार किया था। पर पुतिन के साथ अलास्का शिखर सम्मेलन से पहले ट्रंप ने भारत पर दबाव बढ़ा दिया और रूसी तेल आयात जारी रखने पर 25 फीसदी अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाने की घोषणा कर दी, जिससे यह ब्राजील के बराबर 50 फीसदी टैरिफ का शिकार हो गया! उपराष्ट्रपति वेंस ने एक टीवी शो में दावा किया कि यह रूस को सजा देने के लिए था!

व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार नवारो द्वारा भारत को रूसी तेल का धंधा करने वाला देश बताने से भारत भड़क गया। विदेश मंत्री जयशंकर ने याद दिलाया कि चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा आयातक है और कई यूरोपीय देश अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूसी गैस खरीदते रहे। अमेरिका खुद रूस से यूरेनियम, उर्वरक और कुछ अन्य उत्पाद खरीद रहा है। शायद, वर्तमान विवाद व्यापार असंतुलन को लेकर नहीं है; चीन के पास छह गुना बड़ा व्यापार अधिशेष है, लेकिन उसे ऐसी आलोचना का सामना नहीं करना पड़ता है, क्योंकि उसके पास दुर्लभ पृथ्वी धातुएं और औद्योगिक चुंबक है। तो क्या भारत ने अनजाने में राष्ट्रपति ट्रंप के अहंकार को ठेस पहुंचा दी है, जो खुद को महान शांतिदूत और नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार मानते हैं? उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम करवाया है।

जाहिर है, ट्रंप ने भारत के राष्ट्रीय गौरव और संकल्प को कम करके आंका है। भारत उनकी धौंस के आगे नहीं झुकेगा और उन शर्तों पर सहमत नहीं होगा, जो उसके राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध हैं। पहलगाम आतंकवादी हमले का मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी था। यह एक प्रेरणादायक और एकजुट करने वाली सैन्य सफलता थी, जिसने सावधानीपूर्वक चुने गए आतंकवादी ठिकानों, पाकिस्तानी वायुसेना के ठिकानों और पूरे पंजाब को तबाह कर दिया। कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल सरकार के साथ खड़े थे। ट्रंप का युद्धविराम कराने का दावा मोदी सरकार को रास नहीं आया। इसे भारतीय सशस्त्र बलों का अपमान माना गया, उनके शानदार अभियानों का श्रेय किसी और ने हड़प लिया!

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का केंद्र माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा सूचीबद्ध आतंकवादी वहां अपने केंद्र और प्रशिक्षण शिविर चलाते रहे हैं। ऐसे में ट्रंप का यह कहना कि उन्हें पाकिस्तान से प्यार है, जले पर नमक छिड़कने जैसा था। पाकिस्तान में, सत्ता पर सेना का नियंत्रण है और वही फैसले लेती है। भारत को आतंकवाद का निर्यात उनकी राजकीय नीति का अभिन्न अंग रहा है। पहलगाम हमले के तुरंत बाद व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी सेना प्रमुख और आईएसआई महानिदेशक को आमंत्रित करना भारत के प्रति बेहद असंवेदनशील रवैया था। पिछले 25 वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार, सबसे बड़ा निवेशक और उन्नत तकनीकों का सबसे बड़ा स्रोत है। वे वैश्विक रणनीतिक साझेदार और प्रमुख रक्षा साझेदार हैं और हिंद-प्रशांत, क्वाड, आई2यू2, आईएमईईसी और वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन में मिलकर काम कर रहे हैं। ट्रंप की लापरवाही के कारण ऐसे बहुआयामी और महत्वपूर्ण संबंध खतरे में हैं।

विदेश मंत्री ने भारत की तीन सीमाएं स्पष्ट कर दी हैं-किसानों और छोटे उद्यमों के हितों से कोई समझौता नहीं; रूसी तेल आयात पर रोक नहीं और भारत-पाक संबंधों में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं। नई दिल्ली में नव मनोनीत राजदूत सर्जियो गोर के सामने कठिन चुनौती है। उनके लिए सलाह है कि वे भारत की इन सीमा रेखाओं को अपने दिमाग में रखें। भारत-अमेरिका व्यापार परिषद के प्रमुख अतुल केशप की यह सलाह कि द्विपक्षीय मुद्दों पर निजी तौर पर चर्चा की जानी चाहिए, भी उनके लिए लाभदायक होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें भारत, भारतीय नेताओं और भारतीय लोगों के प्रति सम्मान दिखाना होगा तथा उनकी भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी होगी तथा दक्षिण एवं मध्य एशियाई मामलों के लिए विशेष दूत के रूप में अपनी भूमिका में भारत और पाकिस्तान को एकसाथ रखने से बचना होगा। यदि उन्हें भारत के बारे में तथा भारत के मौजूदा कद के बारे में समुचित जानकारी दी जाए और वह राष्ट्रपति ट्रंप के विश्वास और भरोसे के साथ संबंधों को सुधारने, उन्हें और विस्तारित करने और गहरा करने के उद्देश्य के साथ आएं, तो वह ट्रंप कार्यकाल के एक और केनेथ गैलब्रैथ हो सकते हैं। हालांकि, ट्रंप के हालिया बयान में भारत के प्रति सकारात्कता दिखी है।

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