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रायसीना डायलॉग: यूरोपीय संघ को जरूरत है भारत की ...क्योंकि विश्व मंच पर बढ़ रहा है भारत का कद

Wed, 06 Mar 2024 07:36 AM IST
Shashank शशांक
Updated Wed, 06 Mar 2024 07:36 AM IST
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सार
यूरोपीय संघ भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है, और वह दोनों पक्षों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग का आह्वान करता है। वैश्विक मंच पर भारत का कद तेजी से बढ़ने की वजह से यूरोपीय संघ के साथ रिश्ता और मजबूत होगा।
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European Union enhancing cyber security and Strategic cooperation with India rising global power
भारत-ईयू - फोटो : Social Media

विस्तार

हाल ही में रायसीना डायलॉग से अलग यूरोपीय संघ और भारतीय विशेषज्ञों ने साइबर सुरक्षा और सहयोग पर जोर देते हुए ऑनलाइन दुष्प्रचार को रोकने पर विचार किया। कई नई प्रौद्योगिकियां आई हैं, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में चैटजीपीटी का दुरुपयोग भी हो रहा है। और अब सिर्फ यूरोप और अमेरिका के पास ही नहीं, बल्कि चीन और रूस के पास भी सैन्य एवं अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई आधुनिक प्रौद्योगिकियां हैं। इसलिए साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने, ऑनलाइन दुष्प्रचार और दुरुपयोग को रोकने, अपनी टेक्नोलॉजी को अपडेट करने और उन्हें उन्नत बनाने के लिए दुनिया भर के देशों में विचार-विमर्श हो रहा है।



जीवन के उच्च मानक, समृद्धि और संपन्नता, सीखने और बढ़ने के लिए अपार अवसर, मजबूत राजनीतिक संस्थान यूरोपीय देशों की विशेषता रही हैं, इसलिए यूरोपीय देशों के साथ ठोस रिश्ते बढ़ाना भारत के लिए आवश्यक है, लेकिन मौजूदा समय में हमें कई बातों पर ध्यान देने की जरूरत है।


पिछले दिनों ईयू इंडो-पैसिफिक मिनिस्ट्रियल फोरम की बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच के जुड़ाव पर बात करते हुए कहा कि यूरोपीय संघ बहुध्रुवीय दुनिया को पसंद करता है और यह बहुध्रुवीय दुनिया एशिया के जरिये ही मुमकिन है। यूरोपीय संघ इंडो-पैसिफिक के साथ जुड़ाव बढ़ाने के लिए समान विचारधारा वाले साझेदारों की तलाश करेगा और भारत उनमें से एक है। विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि भारत में डिजिटल सार्वजनिक वितरण या हरित विकास की पहल जैसे कई बदलाव हो रहे हैं। इन बदलावों से यूरोपीय संघ का भारत के प्रति ध्यान आकर्षित हुआ है। वैश्विक मंच पर भारत का कद तेजी से बढ़ने से भविष्य में यूरोपीय संघ के साथ जुड़ाव और बढ़ेगा।  

भारत और यूरोपीय संघ के रिश्ते 1960 के दशक की शुरुआत में बने, जब भारत ने यूरोपीय आर्थिक समुदाय के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। वर्ष 1994 में यूरोप के साथ हमने एक द्विपक्षीय सहयोग समझौता किया, जिससे व्यापार और आर्थिक सहयोग काफी बढ़ा। पहला भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन लिस्बन में हुआ, जिससे संबंधों को गति मिली। हेग में हुए पांचवें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में इस रिश्ते को ‘रणनीतिक साझेदारी’ में उन्नत किया गया। यूरोपीय संघ भारत को एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है और वह दोनों पक्षों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग का आह्वान करता है।

द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी के तहत व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, विज्ञान व अनुसंधान, परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण, आतंकवाद का मुकाबला, साइबर सुरक्षा, समुद्री डकैती, प्रवासन और गतिशीलता आदि इकतीस संवाद तंत्र शामिल हैं। चीन, अमेरिका के बाद यूरोपीय संघ भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जबकि भारत यूरोपीय संघ का  10वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। अमेरिका के बाद यूरोपीय संघ भारतीय निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा गंतव्य है।

जबसे यूक्रेन-रूस युद्ध छिड़ा है, खासकर पश्चिमी यूरोप के जो देश हैं, उन्होंने अपने हितों के खिलाफ जाकर रूस पर प्रतिबंध लगाया। नतीजतन एक तरफ जहां उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हुई, वहीं दूसरी तरफ रूस से उन्हें जो गैस वगैरह मिल रही थी, वह बंद हो गई। हालांकि भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर यूरोप को तेल की आपूर्ति की, जिससे हमारे रिश्तों में प्रगाढ़ता बढ़ी है। फिर भी इन नए घटनाक्रमों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने राष्ट्रीय हितों पर ध्यान देना चाहिए।

मौजूदा परिस्थिति में यूरोप की अर्थव्यवस्था कमजोर हो चुकी है। पश्चिम एशिया से बहुत से शरणार्थी वहां पहुंच गए हैं, जिससे वहां अस्थिरता पैदा हो रही है। आपसी मतभेद, आर्थिक समस्या के अलावा जो यूरोपीय देश नाटो में शामिल हैं, उनके लिए अमेरिकी निर्देश को नजर अंदाज करना मुश्किल होता है। फ्रांस के साथ हमारे द्विपक्षीय रिश्ते बहुत अच्छे हैं और उनके साथ आर्थिक, तकनीकी और व्यापारिक सहयोग बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन कई अन्य यूरोपीय देशों के साथ यह सब आसानी से नहीं किया जा सकता है।

यूरोपीय संघ के साथ मुक्त-व्यापार समझौते को लेकर हमारी बातचीत भी चल रही है। लेकिन उसमें दिक्कत यह है कि वे हमारे विशाल बाजार का लाभ उठाना चाहते हैं, लेकिन उनके उत्पाद ऐसे हैं, जिन्हें भारत में विलासिता संबंधी उपभोक्ता वस्तु कहा जाएगा, जैसे व्हिस्की, वाइन आदि। भारत के आम जन ज्यादातर पारंपरिक हैं, जो ऐसे उत्पादों का ज्यादा उपभोग नहीं करते हैं। कह सकते हैं कि सांस्कृतिक अंतर भी इसमें बाधा बन रहा है। इसके अलावा, हमारे समाज में उपभोक्तावाद बढ़ने के बावजूद बचत करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। यूरोप के साथ हमारा व्यापार स्वेज नहर के रास्ते होता रहा है। लेकिन आजकल पश्चिम एशिया में अस्थिरता के चलते दक्षिण अफ्रीका के रास्ते सामान आ रहा है, जिसमें समय भी अधिक लगता है और लागत भी बढ़ जाती है। इससे यूरोपीय संघ और भारत के व्यापारिक रिश्तों को धक्का लगा है।

जहां तक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की बात है, तो भारत ने इस दिशा में कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका के साथ समझौते के कारण यूरोप ने अमेरिका की मंजूरी के बिना अत्याधुनिक उन्नत टेक्नोलॉजी देने में असमर्थता जताई। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कारगिल युद्ध के समय उन्होंने जीपीएस सिस्टम बंद कर दिया था, इसलिए हमें पता नहीं चल पा रहा था कि पाकिस्तानी कहां-कहां बैठे हुए हैं। यूरोप के साथ साइबर सुरक्षा और तकनीकी सहयोग की बात करते हुए हमें अपने पुराने अनुभवों को भी ध्यान में रखना चाहिए। हमारे देश में अभी चुनाव होने वाले हैं और चुनावों में सभी दल मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए धर्म, जाति आदि से संबंधित भावनाओं को हवा देते और गलत सूचनाएं फैलाते हैं, जो ऑनलाइन गतिविधियों से और बढ़ सकती है। भारत कभी नहीं चाहेगा कि हमारे समाज में मतभेद बढ़े।

कुल मिलाकर, यूरोप के साथ हमें संबंध निश्चित रूप से बढ़ाने चाहिए, लेकिन वहां की मौजूदा स्थिति और अपने अतीत के अनुभव को ध्यान में रखते हुए ही हमें सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। हमारी और उनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं, इसलिए अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए ही आगे बढ़ना महत्वपूर्ण होगा।

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