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कट्टरता का उभार
तवलीन सिंह
Updated Sun, 01 Apr 2018 07:54 PM IST
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तवलीन सिंह
जिस देश में बुर्का और हिजाब महिलाओं के लिए सदियों से अनिवार्य रहा है, उस देश में आज एक शहजादा कह रहे हैं कि इन चीजों की अनिवार्यता समाप्त कर देने का समय आ गया है। कितनी अजीब बात है कि जहां सऊदी अरब जैसे कट्टरपंथी इस्लामी देश में सुधारों की रोशनी दिखने लगी है, वहीं अपने इस ‘सेक्यूलर’ देश में उल्टा हो रहा है। उदारवादी बुद्धिजीवी उन लोगों को कट्टरपंथी हिंदू साबित करने की कोशिश करते हैं, जो कहते हैं कि जहां मुस्लिम महिलाएं पर्दा करने लगती हैं, वहां खोजने पर वहाबी इस्लाम के आगमन के निशान मिलते हैं। भारत में कभी वह जमाना था, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक मुस्लिम महिलाएं वही लिबास पहनती थीं, जो उनकी हिंदू बहनें पहना करती थीं।
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मैंने वह जमाना अपनी आंखों से देखा है और उस जमाने को बदलते हुए भी देखा है। परिवर्तन अचानक शुरू हुआ 9/11 के बाद, जब अमेरिका पर जेहादी हमले के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने वैश्विक स्तर पर जेहादी इस्लाम पर हमला बोला था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि इस युद्ध में जो देश अमेरिका का साथ देते हैं, उनको दोस्त माना जाएगा और जो साथ नहीं देते, उनको दुश्मन माना जाएगा। नतीजा यह कि पाकिस्तान जैसे जेहादी गढ़ को भी इस युद्ध में अमेरिका का साथ देने पर मजबूर होना पड़ा था। जेहादियों के खिलाफ इस वैश्विक युद्ध का परिणाम यह भी हुआ कि सारी दुनिया में मौलवियों ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा अपनी मस्जिदों से बुलंद करना शुरू किया। खुद को मुस्लिम साबित करने के लिए आम मुस्लिम महिलाएं और मर्द इस्लामी लिबास पहनने लग गए। इंडोनेशिया और मलयेशिया जैसे देशों में जहां महिलाएं अपना सिर तक नहीं ढकती थीं, आजकल हिजाब और बुर्के पहनने लग गई हैं।
रही इस लिबास और जेहाद के रिश्ते की बात, तो मैंने पहली बार इसे कोई बीस साल पहले कोयंबटूर के उस इलाके में देखा था, जहां लालकृष्ण आडवाणी की एक सभा में जेहादी हमला हुआ था। उस बारे में जब मैं जानकारी लेने गई, तो मुझे ऐसी महिलाएं मिलीं, जिन्होंने मेरे साथ तब तक बात नहीं की, जब तक उनको मौलवी साहब की इजाजत नहीं मिली। अजीब मुझे यह भी लगा कि वे तमिल महिलाएं साड़ी नहीं, बल्कि सलवार-कमीज पहने थीं। मैंने महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखा है कि जब महिलाओं का लिबास बदलने लगा और मर्दों की दाढ़ी बढ़ने लगी, तो इस्लाम का कटरपंथी स्वरूप भी देखने को मिला।
आज जहां भी मुस्लिम मोहल्लों में लिबास का इस्लामीकरण दिखता है, वहां यकीन के साथ कहा जा सकता है कि जेहादी सोच भी पैदा होने लगती है। सिर्फ भारत में नहीं, कई देशों में लिबास और जेहादी सोच का यह रिश्ता साबित हो चुका है, सो जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में हिजाब पर पाबंदियां लग गई हैं। स्विट्जरलैंड में मस्जिदों पर मीनार लगाना मना है। पर इन चीजों के कारण मुस्लिम खुद को और ज्यादा असुरक्षित महसूस करने लग गए हैं और इस कारण मौलवियों की चंगुल में ज्यादा फंसने लग गए हैं।
हमारी समस्या यह है कि इससे भारत में हिंदुत्व की कट्टरपंथी संस्थाओं के हौंसले और बुलंद हो गए हैं। सो पिछले सप्ताह रामनवमी के दिन जोधपुर में हिंदुत्व से जुड़ी किसी संस्था ने अपनी झांकी में उस व्यक्ति को हीरो के रूप में पेश किया, जिसने अफरजुल नाम के एक बंगाली मजदूर को सिर्फ इसलिए जिंदा जला दिया कि वह मुस्लिम था। इस समस्या का समाधान ढूंढना दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है।