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आर्थिक साख का नया अध्याय: विदेशी मुद्रा भंडार मामले में भारत चौथा सबसे बड़ा देश; आगे चीन, जापान, स्विट्जरलैंड

Mon, 14 Sep 2026 10:27 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Mon, 14 Sep 2026 10:27 AM IST
सार

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत दुनिया में चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद चौथा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला देश बन गया है।

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Economic Credibility New Chapter Foreign Exchange Reserves India Global Rank 4th China Japan Switzerland ahead
विदेशी मुद्रा भंडार - फोटो : amarujala.com

विस्तार

हाल ही में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, पांच सितंबर तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 785.71 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच है। भारत दुनिया में चीन, जापान और स्विट्जरलैंड के बाद चौथा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला देश बन गया है। यह रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार भारत के लिए कई दृष्टि से लाभप्रद है। यह वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच देश को आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है। डॉलर के मुकाबले रुपये में आने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक इसका उपयोग करता है, जिससे भारतीय मुद्रा मजबूत बनी रहती है। वैश्विक युद्ध, महंगाई या अन्य देशों के केंद्रीय बैंकों के फैसलों से उत्पन्न आर्थिक संकटों को झेलने में विदेशी मुद्रा भंडार मदद करता है।

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गौरतलब है कि हाल ही में जहां विभिन्न वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती को रेखांकित किया है, वहीं रिजर्व बैंक की विशेष डॉलर-रुपये विदेशी मुद्रा अदला-बदली सुविधा की अभूतपूर्व सफलता ने वैश्विक वित्तीय जगत में भारत की आर्थिक साख का एक नया अध्याय लिख दिया है। यह परिदृश्य बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति वैश्विक स्तर पर निवेशकों का भरोसा अटूट है।
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पिछले माह 18 अगस्त को गजट अधिसूचना के बाद लागू कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम, 2026 अब भारत में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने, कर व्यवस्था में स्पष्टता लाने और घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ बनाने में अत्यंत अहम भूमिका निभाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक पूंजी और व्यापार के लिए अधिक आकर्षक व भरोसेमंद गंतव्य बनाना है। यह अपतटीय निवेश कोषों और फंड प्रबंधकों के लिए नियमों को सरल बनाता है, जिससे भारत से परिचालन करने वाले कोष प्रबंधकों को कर संबंधी जटिलताओं का सामना न करना पड़े। इससे वैश्विक केंद्रों में कार्यरत भारतीय व विदेशी प्रबंधक सुगमता से भारत की ओर रुख करेंगे। इसके अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र के लिए उपकरण आपूर्ति पर मिलने वाली आयकर छूट को वर्ष 2040-41 तक विस्तारित किया गया है। सीमा शुल्क-बंधित गोदामों में इलेक्ट्रॉनिक घटकों के भंडारण को कर-मुक्त करने और डाटा सेंटरों के लिए प्रक्रियाओं को सुगम बनाने से वैश्विक कंपनियां भारत में बड़े पैमाने पर निवेश के लिए आकर्षित होंगी। इससे रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
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वर्ष 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने और लगभग 300-350 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और प्रति व्यक्ति आय करीब 18,000 डॉलर करने के लिए बुनियादी ढांचे, तकनीक और विनिर्माण क्षेत्र में भारी निवेश की आवश्यकता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को लगातार औसतन करीब नौ प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर बनाए रखनी होगी। इतने बड़े विकास लक्ष्य को अकेले घरेलू संसाधनों से पूरा करना संभव नहीं होगा, इसलिए विदेशी पूंजी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि आर्थिक सुधारों के पिछले 35 वर्षों में विदेशी मुद्रा धीमी गति से भारत में आई है, लेकिन अब कराधान और अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम, 2026 के लागू होने के बाद भारत की ओर विदेशी मुद्रा के प्रवाह में तेजी आने की पूरी संभावनाएं हैं।

विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए निरंतर कई ठोस कदम उठाए गए हैं। बहुआयामी प्रयासों के बावजूद भारत में टिकाऊ विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए अब भी कई ठोस सुधारों की आवश्यकता है। केवल बड़े घरेलू बाजार और उच्च विकास दर के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए देश के नियामक ढांचे, कर प्रणाली और कानूनी तंत्र में व्यापक बदलाव अनिवार्य हैं। दीर्घकालिक निवेश के लिए स्थिर नीतियां पहली प्राथमिक शर्त हैं। कर नियमों, सीमा शुल्क और क्षेत्र-विशेष के प्रावधानों में अचानक होने वाले परिवर्तनों से निवेशक दूर भागते हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर विभिन्न स्वीकृतियों, और जटिल नियमों का बोझ अभी भी बहुत अधिक है। इसके अतिरिक्त, न्यायालयों में विवाद समाधान की धीमी गति और अनुबंधों को लागू करने में होने वाली देरी विदेशी पूंजी के प्रवाह में बड़ी बाधा बनती है।


उम्मीद करें कि कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) अधिनियम, 2026 प्रशासनिक लालफीताशाही समाप्त करने, कर प्रणाली को पारदर्शी बनाने और न्यायिक प्रक्रियाओं में तेजी लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा। साथ ही इससे भारत दीर्घकालिक रूप से विदेशी पूंजी आकर्षित करने वाला देश बन सकेगा। 

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