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इलेक्ट्रिक वाहन: बाधाओं के बावजूद कई वजहों से भारत में ईवी का भविष्य बेहतर, मजबूत सहयोगी तंत्र जरूरी

Thu, 23 May 2024 04:10 AM IST
Advaita Kala अद्वैता काला
Updated Thu, 23 May 2024 04:10 AM IST
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सार
अगर हम वाकई देश में ई-वाहन क्रांति लाना चाह रहे हैं, तो उसके लिए मजबूत सहयोगी तंत्र भी जरूरी है। लगातार विज्ञापन, कर प्रोत्साहन जैसी सरकारी योजनाएं और सुलभ बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से भारत में ईवी को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि इन पर अभी काम होना बाकी है।
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Despite the hurdles, the future of EV in India is better for many reasons, strong support system is necessary
Electric Car - फोटो : iStock

विस्तार

पिछले कुछ वर्षों से भारत में कार खरीदारी में बदलाव आ रहा है और लोग पेट्रोल-डीजल के प्रभुत्व वाले बाजार से इलेक्ट्रिक वाहनों के नए ब्रांड की तरफ रुख कर रहे हैं। पिछले साल 15 लाख इलेक्ट्रिक कारें बेची गईं। समकालीन उपभोक्ताओं की चाहत और जलवायु परिवर्तन को लेकर नए उत्साह के साथ भारत का खुदरा कार बाजार इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को खरीदने और उसे प्रोत्साहित करने के नए चलन को अपना रहा है। लेकिन यह प्रवृत्ति उभरी कैसे और अचानक क्यों जोर पकड़ रही है-  यह जानने के लिए भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की क्रांति पर गहराई ने नजर डालने की जरूरत है। 



इसके दो कारण हैं। पहला, ग्लोबल वार्मिंग को लेकर वास्तविक जागरूकता, जो वैसे समृद्ध उपभोक्ताओं को आकर्षित करता है, जो पर्यावरण हितैषी वाहन खरीदने पर ज्यादा पैसा खर्च करने को तैयार हैं। हालांकि पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों और बजट के प्रति जागरूक मध्यम वर्ग भी ईवी क्रांति का लाभ उठा रहा है। टाटा जैसी कार कंपनियों ने ऐसे उपभोक्ताओं की जरूरत को समझा है और इसे पूरा करने के लिए कम लागत वाली टियागो लॉन्च की है। वे ईवी के प्रति बढ़ती दिलचस्पी को लेकर आशान्वित भी हैं। उन्होंने गुरुग्राम में सिर्फइलेक्ट्रिक वाहन का शोरूम खोला है और ईसीई वाहन और इलेक्ट्रिक वाहन के सेल्स (विक्रय विभाग) को अलग कर दिया है।


मैं पिछले महीने से किफायती ईवी की तलाश कर रही हूं। उनकी संख्या कम है। यदि आपके पास खर्च करने के लिए ज्यादा रुपये हैं, तो कई विकल्प हैं, लेकिन यदि आप अपना बजट 10 लाख रुपये तक ही रखना चाहते हैं, तो विकल्प सीमित हो जाएंगे। और यह कमी इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के बजाय हतोत्साहित करेगी। सरकार ने सभी तरह के इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी दी है। मेरे मित्र राजीव तुली ई-रिक्शा के व्यवसाय में हैं और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। भले ही सुनने में अटपटा लगे, लेकिन जलवायु परिवर्तन और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के दौर में ई-वाहन एक अनिवार्यता है। निर्माताओं को किफायती मूल्य में इस मांग को पूरी करने पर ध्यान देने की जरूरत है।

एक अन्य मुद्दा, पेट्रोल पंप की तुलना में चार्जिंग स्टेशन की कमी है। चार्जिंग स्टेशन के विकास पर जोर दिए बिना ई-वाहन भारतीय मोटर चालकों के लिए सपना ही रहेगा। यहां तक कि मुझ जैसे लोगों के लिए भी, जो ईवी को अपनाना चाहते हैं। शुरुआत में एक अकेली महिला चालक के लिए बैटरी चार्जर के बिना ई-वाहन खरीदकर फंसे रहना दुस्वप्न जैसा है। इन चुनौतियों के बावजूद, मैकिंजे एंड कंपनी के अध्ययन से पता चलता है कि लोग नई कार खरीदते समय पर्यावरण की सततता पर विचार करते हैं, जो सकारात्मक है। इसके अलावा, सरकार के वाहन प्रदूषण नियंत्रण के नियम लोगों को हरित विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

ईवी, जो अपने शून्य-उत्सर्जन और नवीकरणीय अनुकूलता के लिए जाने जाते हैं, इस मानदंड पर खरे उतरते हैं। ईवी का रखरखाव सामान्यतः पारंपरिक वाहनों की तुलना में बहुत कम है, जो ग्राहकों के खर्च में कमी लाकर पसंदीदा विकल्प बन जाता है। ईवी पहले से ही अर्ध-स्वचालित है और निकट भविष्य में यह पूरी तरह स्वचालित होने वाला है। भारत में तेजी से इलेक्ट्रिक और हाईब्रिड वाहनों को अपनाने और विनिर्माण (फेम) ने ईवी अपनाने की प्रवृत्ति में इजाफा किया है। प्रोत्साहन आधारित सब्सिडी योजना ईवी अपनाने और उनके बुनियादी ढांचे के विकास को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। इस योजना का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश में परिवहन सुविधाओं को 30 फीसदी तक इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलना है। यह वित्तीय प्रोत्साहन निर्माताओं और खरीदारों, दोनों की मदद करता है। फेम के दूसरे चरण में सरकार का लक्ष्य देश भर में 2,700 चार्जिंग स्टेशन स्थापित करना है। हालांकि, अब भी बहुत से भारतीय कार खरीदते वक्त इलेक्ट्रिक कार के प्रति संदेह में रहते हैं। सबसे बड़ी कमी बुनियादी ढांचे की है। हालांकि फेम इस अंतर को पाटने का वादा करता है। किंतु भारतीय ऐसी चीजों में निवेश से हिचकते हैं, जो जल्दी उपलब्ध हो भी सकती है और नहीं भी। जब तक बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो जाता, पारंपरिक वाहनों की तुलना में ईवी को चुनने की संभावना कम है।

इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के फलने-फूलने और बनाए रखने के लिए मजबूत सहयोगी तंत्र जरूरी है। यद्यपि कर छूट, प्रोत्साहन और पर्याप्त जागरूकता है, पर सबसे बड़ी बाधा उस आबादी को समझाना है, जो यथास्थिति बनाए रखने को प्राथमिकता देती है। जलवायु कार्रवाई को लेकर जागरूकता बढ़ी है, फिर भी यह कहना मुश्किल है कि देश के लोग स्थिति की गंभीरता को समझते हैं और तत्काल कार्रवाई के लिए तैयार हैं। अब बड़े पैमाने पर ई-वाहन विज्ञापनदाता भी मानते हैं कि कार चलाने वाली आबादी कुछ हद तक जलवायु कार्यकर्ता हैं, यदि नहीं भी हैं, तो वे इस दिशा की ओर अग्रसर हैं। इसलिए उनके विज्ञापनों का असर काफी कम है, जहां समाज का नवप्रवर्तक व उत्साही वर्ग (समृद्ध लोग) ईवी की ओर बढ़ रहा है। लेकिन इन आंकड़ों से क्रांति नहीं आने वाली। जल्द ही जब ये नवप्रवर्तक गायब हो जाएंगे, तो हम फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से चले थे।

पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतें भी ईवी को काफी हद तक बढ़ावा देने में मदद करती हैं। हालांकि बैटरी चार्जिंग मॉडल और ब्रांड पर भी निर्भर करता है, लेकिन किसी सार्वजनिक चार्जिंग पॉइंट पर कोई भी अपनी कार बैटरी को  400 रुपये से कम में पूरी तरह चार्ज कर सकता है, जबकि एक बार पेट्रोल की टंकी भरवाने की लागत बहुत ज्यादा होती है। मुख्य बाधा बैटरी चार्जिंग में लगने वाले समय की है, जिसमें अभी नियमित रूप से घर में 8 से 12 घंटे लगते हैं। हालांकि नई तकनीकों और तेज चार्जर की वजह से चार्जिंग के समय में कमी आई है।

तमाम बाधाओं के बावजूद कई वजहों से भारत में ई-वाहन का भविष्य बेहतर है। तकनीकी प्रगति के साथ-साथ चार्जिंग के बुनियादी ढांचे के विस्तार और वित्तीय प्रोत्साहन देने की सरकार की प्रतिबद्धता ज्यादा से ज्यादा ईवी अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित कर रही है।
लगातार विज्ञापन, कर प्रोत्साहन जैसी सरकारी योजनाएं और सुलभ बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से भारत में ईवी को बढ़ावा देगा। हालांकि इन पर अभी काम होना बाकी है।

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