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जीवन धारा: मैं इन्सान बनना चाहता हूं, दबाव में भी याद रखें, हर सपने की लहर का तार्किक अंत नहीं होता
Tue, 24 Dec 2024 04:45 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अलेक्जेंडर रस्किन
अलेक्जेंडर रस्किन
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Tue, 24 Dec 2024 04:45 AM IST
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विस्तार
मेरे पिताजी जब छोटे थे, तो उनसे अक्सर पूछा जाता था, बड़े होकर तुम क्या बनना चाहते हो? पापा के पास जवाब हमेशा तैयार होता। मगर उनका जवाब हर बार अलग-अलग होता था। शुरू-शुरू में वह कहते, ‘मैं चौकीदार बनना चाहता हूं।’ दरअसल, उन्हें यह सोचना बहुत अच्छा लगता था कि जब सारा शहर सोता है, तब चौकीदार जागता है। तभी एक दिन हुआ यों कि उन्होंने एक व्यक्ति को ठेले पर आइसक्रीम बेचते हुए देखा। उन्होंने सोच लिया कि वह भी आइसक्रीम वाला बनेंगे। उन्होंने सोचा कि यह तो मजेदार काम है। जब मन करे, तो आइसक्रीम खा लो। उन्होंने सोचा, ‘एक आइसक्रीम बेचूंगा, तो एक खुद खाऊंगा। छोटे बच्चों को तो मुफ्त में आइसक्रीम दिया करूंगा।’
जब उनके माता-पिता ने यह सुना कि वह आइसक्रीम बेचने वाला बनना चाहते हैं, पहले तो उन्हें बहुत हैरानी हुई। बाद में यह बात उन्हें अच्छी लगी और वे खूब हंसे, लेकिन पिताजी अड़े रहे कि वह यही काम करेंगे। लेकिन एक दिन मेरे पिताजी रेलवे स्टेशन पहुंचे। ट्रेन की चाल को देखकर एक बार फिर उनका दिमाग घूम गया। हालांकि कुछ ही दिन बाद उन्होंने वायुयान का पायलट बनने की सोची। फिर उन्होंने अभिनेता बनने का निश्चय किया। अंत में एक दिन उन्होंने तय किया कि वह असल में जो बनना चाहते हैं, वह है कुत्ता। उस दिन वह दिन भर चारों हाथ-पैरों पर इधर-उधर भागते हुए अजनबियों पर भौंकते रहे। एक बूढ़ी महिला ने उनके सिर को सहलाना चाहा, तो पिताजी ने उन्हें काटने की कोशिश तक की! उन्होंने भौंकना तो बड़ी अच्छी तरह से सीख लिया, लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी अपने पैर से कान के पीछे खुजाना नहीं सीख पाए।
उन्होंने सोचा कि अगर वह बाहर जाकर अपने पालतू कुत्ते के साथ बैठ जाएं, तो शायद वह कान के पीछे खुजाना ज्यादा जल्दी सीख जाएंगे। पिताजी कुत्ते के पास जाकर बैठ गए। उसी वक्त एक अजनबी फौजी अफसर उधर से निकला। वह खड़ा होकर पिताजी को देखने लगा। वह उन्हें कुछ देर तक देखता रहा और फिर उसने पूछा, यह तुम क्या कर रहे हो? उन्होंने जवाब दिया, मैं कुत्ता बनना सीख रहा हूं। तब फौजी ने पूछा, ‘तुम कुत्ता क्यों बनना चाहते हो?’ पिताजी ने कहा, ‘मैं काफी दिन तक इन्सान बनकर थक चुका हूं।’ अफसर ने कहा, ‘बात तो सही है। पर क्या तुम जानते भी हो कि इन्सान किसे कहते हैं?’ पिताजी ने पूछा, ‘मुझे तो नहीं पता। आप ही बता दीजिए।’ अफसर ने कहा, ‘इसके बारे में तुम अपने आप सोचो!’ अफसर वहां से चला गया। वह न तो हंसा और न मुस्कराया। पापा सोचने लगे। वह सोचते ही रहे। अफसर ने उन्हें कोई बात भी नहीं समझाई थी, पर अचानक ही यह बात पापा की समझ में आ गई कि वह रोज-रोज अपना इरादा नहीं बदल सकते। अगली बार जब उनसे यही सवाल पूछा गया, तो उन्हें अफसर की याद आ गई, और उन्होंने कहा, मैं इन्सान बनना चाहता हूं। इस बार कोई भी नहीं हंसा। आज भी वह यही समझते हैं। पहली बात तो यही है कि हमें अच्छा इन्सान बनना चाहिए।
सूत्र: दबाव में भी याद रखें
बच्चे से बड़े होने के क्रम में हमसे अक्सर एक प्रश्न पूछा जाता है कि तुम क्या बनना चाहते हो? हमारे ऊपर वायुमंडलीय दबाव की तरह डॉक्टर, इंजीनियर, अभिनेता आदि बनने का अतिरिक्त दबाव होता है। इस दबाव में हम इन्सान बनना ही भूल जाते हैं। हर सपना एक लहर पैदा करता है, जिसका कोई तार्किक अंत नहीं होता।