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घृणा का खतरनाक दर्शन: सैनिक जीवन-मृत्यु की जंग में देश बचाता है, धार्मिक या सामुदायिक नफरत की गुंजाइश नहीं

Thu, 22 May 2025 06:09 AM IST
Nanditesh Nilay Nanditesh Nilay
Updated Thu, 22 May 2025 06:09 AM IST
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सार
कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को अगर मनुष्य की संकीर्ण सोच का शिकार होना पड़ता है, तो भारत की छवि धूमिल होती ही है। एक सैनिक के लिए जीवन और मृत्यु की जंग में जब देश को बचाना हो, तो फिर उस धार्मिक या सामुदायिक नफरत की गुंजाइश कहां रह जाती है? 
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Dangerous philosophy soldier protects country in life-death battle no scope of religious or communal hatred
ऑपरेशन सिंदूर पर भारतीय सेना की महिला अधिकारियों- विंग कमांडर व्योमिका और कर्नल सोफिया ने दी जानकारी - फोटो : यूट्यूब वीडियो ग्रैब- एएनआई

विस्तार

छब्बीस जनवरी, 1930 को जब पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, तो भारत के लोगों ने असीम स्नेह का परिचय दिया और 1947 में भारत के विभिन्न हिस्सों मंे एक अद्वितीय सौहार्द के साथ ध्वज फहराया गया। यहां तक कि भारतीय दर्शन में भी उस द्वैत से अद्वैत की चर्चा खूब हुई है और सामूहिकता तथा ‘बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय’ के विचार ने भारत की छवि को बखूबी परिभाषित किया।



स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी भारत ने हमेशा विवेकानंद के दर्शन के समावेशी विचार को संभालकर रखा है। विवेकानंद के अनुसार, ‘भारतीय संस्कृति की आत्मा आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिकता से तात्पर्य जीवन के अंतिम लक्ष्य की ओर उन्मुख जीवनशैली से है, जो उस द्वैत को मिटाकर अद्वैत की प्राप्ति कराती है।’ उन्होंने कहा था, ‘व्यक्ति का जीवन समग्र के जीवन में है, व्यक्तिगत सुख समग्र के सुख में है; समग्र से अलग, व्यक्ति का अस्तित्व अकल्पनीय है-यह एक शाश्वत सत्य है और यही वह आधारशिला है, जिस पर ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है।’


लेकिन अगर वह समग्र का सुख कुछेक लोगों द्वारा गैर-जिम्मेदाराना ढंग से धर्म या जाति के ग्रहण का शिकार हो जाए, तो बहुत दुख होता है। कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को अगर मनुष्य की उस संकीर्ण सोच का शिकार होना पड़ता है, तो भारत की छवि धूमिल तो होती ही है। एक सैनिक के लिए जीवन और मृत्यु की जंग में जब देश को बचाना हो, तो फिर उस धार्मिक या सामुदायिक नफरत की गुंजाइश कहां रह जाती है?

घृणा और प्रेम पर फ्रेडरिक नीत्शे हमें कुछ सिखाते भी हैं, ‘हमें प्यार करना सीखना चाहिए, दयालु होना सीखना चाहिए, और यह भी शुरुआती युवावस्था से ही सीखना चाहिए...इसी तरह, अगर कोई एक नफरत करने वाला व्यक्ति बनना चाहता है, तो नफरत को सीखना और पोषित करना होगा।’ जीवन हमें नफरत को पोषित करना नहीं सिखाता। हर किसी को एक जिम्मेदारी के भाव से मनुष्य होने के भाव को समझना होगा। यहां तक कि एलन मस्क भी मानते हैं कि हम सभी को  मानवीय चेतना के पैमाने और दायरे का विस्तार करने की कोशिश करनी चाहिए। वह कहते हैं, ‘पृथ्वी मानवता का पालना है और आप हमेशा पालने में नहीं रह सकते। इसलिए मानवता का हिस्सा बनें।’

जर्मन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक फ्रांज ब्रेंटानो का तर्क है कि मानसिक क्रियाकलापों के तीन प्रकार हैं, जो मानसिक घटना को परिभाषित करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण क्रियाओं में से एक प्रेम और घृणा है। प्राइमेट्स से लेकर आज तक मानव विकास ने अपने अस्तित्व के लिए कभी किसी भी समुदाय से नफरत नहीं करने में विश्वास किया है। यहां तक कि मानवविज्ञानी मार्गरेट मीड द्वारा साझा की गई फीमर के उपचार की प्रसिद्ध कहानी किसी भी चीज से ऊपर प्रेम की भावना की वकालत ही तो करती है। जानवरों ने भी मानव जाति के लिए प्रेम का ही प्रस्ताव रखा। नहीं तो क्या यह संभव था कि ड्राइंग रूम में एक परिवार के साथ जर्मन शेफर्ड भी बैठे और परिवार का एक अजीज हिस्सा बनकर रहे, जबकि जानवर की प्रकृति और व्यवहार में आक्रामकता तो होती ही है। चूंकि मनुष्य ने पेट के लिए प्रेम और विश्वास से युक्त उस भाषा और व्यवहार को चुना, जिसमें एक जानवर और इन्सान का द्वैत भी मिट गया। 

महान हिंदी लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उसने कहा था  का प्रसिद्ध पात्र लहना सिंह भी युद्ध के मैदान में मृत्यु शैया पर उस वादे को निभाने से चूका नहीं और न ही हमारे सभी सैनिक। वे देश की रक्षा के लिए प्रशिक्षित तो होते हैं, लेकिन मर-मिटने का जज्बा उनका वह किरदार होता है, जहां मृत्यु को जीवन से भी ज्यादा जगह मिलती है। वे कभी भी हिंदू-मुस्लिम या जात-पात के अज्ञान के अंधकार में नहीं उड़ते। और तभी उड़ते हैं, उस अंधकार में, जब उन्हें भारत के दुश्मनों का खात्मा करना होता है। वे अंधकार से नहीं डरते और न ही दुश्मनों से। लेकिन अगर सिविल सोसाइटी के कुछेक उजड्ड लोग उन्हें इस धार्मिक या जातीय नजरिये से देखते हैं, तो वे परेशान हो जाते हैं और उनका वह अदम्य हौसला भी डगमगाता जाता है। फिर क्यों न जनरल मानक शॉ हों या अब्दुल हमीद। उन दोनों में रैंक का फर्क जरूर था, लेकिन उनका एक ही परिचय रहा और वह है, सैनिक का। देश ने उनको हमेशा आदर और सम्मान से देखा और सभी सैनिक ऐसे ही तो होते हैं, जो अपने देश के प्रति प्रेम के पर्याय हैं और देशभक्ति को सार्वभौमिक रूप से परिभाषित करते हैं। वे पीड़ित लोगों का वीडियो नहीं बनाते, बल्कि किसी भी परिस्थिति में मदद के लिए आगे आते हैं। कोई व्यक्ति महान तभी बनता है, जब वह इन पूर्वाग्रहों से ऊपर उठ जाता है। 

एक सैनिक के निर्माण में धर्म, जाति, वर्ग, भूगोल के लिए कोई स्थान नहीं होता, लेकिन अगर किसी भी सैनिक की दृश्यता मानवीयता के अलावा किसी अन्य कारण से धुंधली हो जाती है, तो उस एकता  को ठेस तो पहुंचती ही है। और यही हुआ जब कुछ लोगों ने आईआरएस ऑफिसर से लेकर अपने बलों के सैनिकों पर अनर्गल बयान दिए। एलिहू काट्ज ने अपनी संपादित पुस्तक मास मीडिया एंड सोशल चेंज के उपसंहार में  बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है कि केंद्रीय मुद्दा यह है कि क्या जनसंचार के माध्यम को समाज का नेतृत्व करना चाहिए या उसका अनुसरण करना चाहिए, समाज को प्रतिबिंबित करना चाहिए या उसे ढालना चाहिए। यह हमेशा से एक बहस का विषय रहा है। इसलिए मुद्दा यह है कि एक राष्ट्र इस प्रकार की स्वतंत्रता को कैसे वहन कर सकता है, जब भाषा अपनी मर्यादा छोड़ दे और युद्ध के बीच में कोई सैनिक एक अलग तरह के पहचान आधारित युद्ध में फंस जाए। आखिर कौन हैं, हम? मनुष्य ही न? तो फिर यह बेवजह शोर क्यों? चलिए अपने सैनिकों को सलाम करते हैं, उनके साहस, बलिदान और जज्बे को। व्योमिका सिंह और सोफिया कुरैशी ने न जाने कितनी लड़कियों को सैनिक बनने का स्वप्न दे डाला है। इनके हौसले के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। और चलिए फिर एक साथ, एक स्वर में हुंकार भरें, जय हिंद।                  

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