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आंतरिक यात्रा का समय
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देशभर में लॉकडाउन लागू है और डॉक्टरों की ओर से कोरोना महामारी से बचने के लिए सामाजिक दूरी कायम रखने की सलाह दी गई है। सामाजिकता व सह-अस्तित्व का उत्सव मनाने वाले मानव के लिए एकांत व सामाजिक दूरी थोड़ी अव्यावहारिक जरूर है। वहीं सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग), आइसोलेशन, व एकांत (क्वारंटीन) जब चुनी जाती है, तो हम मानसिक रूप से उसके लिए तैयार होते हैं।
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साथ ही इस दौरान दिनचर्या के बदलावों को लेकर भी हम खुद को तैयार कर लेते हैं। वहीं जब यह आरोपित होती है, तो हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते। यह अस्वीकार्यता ही बेचैनी (एंजायटी) का कारण बनती है, जो आगे डिप्रेशन में बदल जाती है। यदि हम इसे स्वीकार लें, तो कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि भाग-दौड़ भरी जिंदगी में हम सब एक ब्रेक चाहते हैं। इसलिए इसे वह ब्रेक ही मानें।
हालांकि जब हम इसे स्वीकार नहीं कर पाते, तो इससे कई तरह की दिक्कतें होती हैं। आज के समय में एकल परिवारों की संख्या बढ़ी है, यह पारिवारिक संरचना आइसोलेशन व क्वारंटीन के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि जब तक फेस टू फेस कम्युनिकेशन होता रहता है, बेचैनी व डिप्रेशन की संभावना कम रहती है। क्योंकि जब हम अपनी भावनाओं को कह पाते हैं, तो इससे मानसिक दबाव कम हो जाता है। और ऐसा न हो पाने की स्थिति में कुंठा की स्थिति बन जाती है। इसका विशेष खयाल रखने की जरूरत है।
छोटे परिवारों में अक्सर माता-पिता नौकरी पेशा होते हैं। और बच्चों को कई चीजों के बारे में अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए घर से बाहर जाने की जरूरत होती है। इसलिए इस लॉकडाउन का असर बच्चों व अधिक उम्र के लोगों पर होने की संभावना ज्यादा है। ऐसे में मां-बाप को इसका ख्याल रखना चाहिए और बच्चों को अधिक से अधिक समय देकर उन्हें रचनात्मक कामों में लगाना चाहिए। बच्चों पर झल्लाएं नहीं, बल्कि उन्हें प्यार से समझाएं।
शहरों में हमारे घरों की बनावट सोशल डिस्टेंसिंग के लिए अनुकूल नहीं है, और लगातार घर में बने रहने से मानसिक तनाव व झल्लाहट हो सकती है। ऐसे में यदि आपके घर में 'ग्रीन एरिया' हो तो वहां समय बिताया जा सकता है, पेड़ों के आस-पास समय बिताने से भी सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। और यदि ऐसी जगह न है, तो सुबह-शाम छतों पर जाएं। आजकल प्रदूषण कम होने से आसमान साफ है, उसे निहारें। इससे एक सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी।
यह अवधि एक अवसर की तरह है, उन सभी चीजों को करने का, जो अक्सर भाग-दौड़ भरी जिंदगी में छूट जाती है। संपर्क साधनों के आने से हमारा सामाजिक संपर्क बढ़ने के बावजूद 'म्यूच्यूअल डिस्टेंसिंग' (आपसी दूरी) भी बढ़ी है। हमें इस सोशल डिस्टेंसिंग पीरियड में 'म्यूच्यूअल कनेक्टिविटी' पर जोर देना है।
इस पीरियड में अपनी दिनचर्या को बेहतर करने पर जोर दें। सूर्योदय व सूर्यास्त को देखें, जिससे कि बड़ी आबादी वंचित है। ध्यान व योगाभ्यास करें। अपनी कलात्मकता को उभारें, जैसे डांस, संगीत, कुकिंग आदि। और वह सब कुछ, जो आप करना चाहते हैं, लेकिन समयाभाव में नहीं कर पाते।
अपने अब तक के जीवन को देखें, और उसकी समीक्षा करें। पुराने एल्बम देखें, और उससे जुड़ी यादों की चर्चा करें। परिवार के साथ चेस, कैरम व लूडो आदि सामूहिक खेल खेलें। परिवार के साथ अपनी भावनाएं साझा करें। आपस में अधिक जुड़ाव बनाने की कोशिश करें। खाना मिलजुल पकाएं व घर की साफ सफाई करने में एक दूसरे की मदद करें, इसे देखकर बच्चों में भी आपसी सहयोग की भावना विकसित होगी। पुस्तकें पढ़ें, व डायरी लिखें। जो अकेले रहते हैं, वे ध्यान जरूर करें। यदि आप गाते हैं, तो उसकी रिकॉर्डिंग करें, फिर सुनें और ठीक करें। (लेखिका मनोवैज्ञानिक सलाहकार हैं।)