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पर्यावरण: कई संकटों का संकेत है कम बर्फबारी... सरकारों और जन सामान्य को उठाने होंगे जरूरी कदम

Tue, 10 Dec 2024 05:42 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 10 Dec 2024 05:42 AM IST
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सार
हिमालय में कम बर्फबारी से पीने और सिंचाई के लिए कम पानी मिलेगा, बीमारियां बढ़ेंगी व पर्यटन उद्योग समेत पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
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Climate Crisis Less snowfall alarming Governments and public must take necessary steps
बर्फबारी कम होने के कारण कई चुनौतियां (प्रतीकात्मक) - फोटो : freepik

विस्तार

मध्य हिमालय के ओम पर्वत, बदरीनाथ और केदारनाथ समेत ऊंचाई वाली पहाड़ियों पर सामान्यतः नवंबर से बर्फ पड़नी शुरू हो जाती थी। इस बार दिसंबर के दूसरे सप्ताह में बर्फबारी शुरू हुई है। लेकिन यह बर्फ ऊंची पहाडि़यों पर लंबे समय तक टिकी रहेगी, इसके आसार कम हैं। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार पूर्वोत्तर को छोड़ कर शेष हिमालयी क्षेत्र में इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है और अगर वर्षा में कमी आई, तो बर्फ भी कम पड़ेगी, जिसका व्यापक असर हिमालय से जुड़े पांच देशों पर पड़ेगा, क्योंकि हिमालय एशिया का जलस्तंभ होने के साथ ही इस महाद्वीप का मौसम नियंत्रक भी है।


भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, दिसंबर 2024 में उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के ज्यादातर हिस्सों, पूर्वी व पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य से अधिक 121 प्रतिशत तक वर्षा होने की संभावना जताई गई है। पूर्वानुमान के अनुसार, दक्षिणी प्रशांत महासागर में तटस्थ अल-नीनो स्थितियां देखी जा रही हैं, जबकि ला नीना की स्थितियां अधिक विकसित हो सकती हैं, जो भारतीय जलवायु पर असर डाल सकती हैं। कम वर्षा का हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी पर सीधा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बर्फबारी वर्षा के ही रूप में होती है। लेकिन यह तापमान और ऊंचाई पर निर्भर करती है।


कम वर्षा से हिमालय की ऊंची चोटियां व घाटियां बर्फ के बजाय हल्की बारिश या शुष्क मौसम का सामना कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय में कम वर्षा व कम बर्फबारी के मुख्य कारण वैश्विक जलवायु परिवर्तन, अल-नीनो प्रभाव, वायुमंडलीय दबाव में बदलाव और मानवीय गतिविधियां हैं। वायुमंडलीय दबाव के पैटर्न में बदलाव के कारण उत्तर-पश्चिमी हवाएं हिमालय के ऊपरी हिस्सों तक नहीं पहुंच पातीं, जिससे वर्षा और बर्फबारी में कमी हो सकती है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि हो ही रही है, जिससे बर्फबारी की प्रक्रिया प्रभावित होती है। गर्मी बढ़ने से बर्फ की जगह बारिश अधिक होने लगती है। इसके अलावा पृथ्वी के जलवायु चक्र में प्राकृतिक रूप से बदलाव आते रहते हैं, जैसे ‘इंटर-मानसून’ और ‘मानसून ब्रेक्स’, जो हिमालय क्षेत्र में कम वर्षा और बर्फबारी का कारण बन सकते हैं।

कम बर्फबारी का मतलब है बर्फ का पिघलना, जिसका सीधा असर नदियों के जलस्तर पर पड़ता है। इससे जलसंकट पैदा हो सकता है, जो कृषि, पेयजल और उद्योगों पर असर डालता है। गंगा, यमुना, सतलुज, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी ग्लेशियर आधारित नदियां भारतीय उपमहाद्वीप के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये नदियां न केवल जल आपूर्ति का एक मुख्य स्रोत हैं, बल्कि इनका कृषि, उद्योग, बिजली उत्पादन और पीने के पानी के लिए भी बड़ा महत्व है। इन नदियों पर बड़ी-बड़ी जलविद्युत परियाेजनाएं चल रही हैं और कई अन्य निर्माणाधीन हैं, जो कम बर्फबारी से प्रभावित होंगी।

बर्फबारी में कमी से ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप, हिमालय क्षेत्र में जलस्तर में वृद्धि हो सकती है, जो बाद में बर्फीले तूफान, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं का कारण बन सकता है। कम बर्फबारी से तापमान बढ़ने के साथ पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो जाता है। बर्फबारी का एक प्राकृतिक कार्य सूर्य की किरणों को परावर्तित करना (अल्बेडो प्रभाव) है। जब बर्फ कम होती है, तो अधिक गर्मी अवशोषित होती है, जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है। हिमालय पर कम बर्फबारी के कारण, भारतीय मानसून और वर्षा पैटर्न भी प्रभावित हो सकते हैं। गर्मी के बढ़ने से मानसून की दिशा और पैटर्न में बदलाव आ सकता है, जिससे असामान्य वर्षा और सूखा जैसी स्थितियां बन सकती हैं।

हिमालय में बर्फबारी कम होने से पानी की आपूर्ति में कमी हो सकती है, जो रबी और खरीफ फसलों के लिए नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। हिमालय क्षेत्र में स्कीइंग, ट्रैकिंग और अन्य बर्फ आधारित पर्यटन गतिविधियां बहुत प्रसिद्ध हैं। बर्फबारी में कमी से इन गतिविधियों का आकर्षण कम हो सकता है, जिससे पर्यटन उद्योग पर बुरा असर पड़ सकता है। यह स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। इस स्थिति में हिमालयी क्षेत्र के वायुदाब और वायुगतिकी में बदलाव आ सकता है। यह वायु प्रदूषण के स्तर को बढ़ा सकता है, जिससे श्वसन संबंधित बीमारियां और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां वायु प्रदूषण पहले से उच्च स्तर पर होता है। हिमालय पर कम बर्फबारी से गर्मी की लहरें और अधिक प्रकोपित हो सकती हैं। अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में सरकारों और जन सामान्य को किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पहले ही तैयार रहने की जरूरत है।
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