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मौसम: जलवायु खतरों की समय पर और सटीक चेतावनी की व्यवस्था जरूरी

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सार
भारत में करीब 66 फीसदी आबादी के सामने भीषण बाढ़ का जोखिम रहता है। ऐसे में जलवायु खतरों की समय पर और सटीक चेतावनी उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी होगी।
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climate change severe floods risk in India timely and accurate warnings of climate hazards situation needed
बाढ़ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में आई भीषण बाढ़ ने जन-जीवन और आजीविका को प्रभावित किया है। यमुना का जलस्तर बढ़ने से राष्ट्रीय राजधानी के कुछ हिस्से जलमग्न हो गए। इन घटनाओं के साथ अब यह बात पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट हो गई है कि मौसम में यह अनिश्चितता आगे भी बनी रहेगी। जैसा कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने पूर्वानुमान लगाया है कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगी। जाहिर है कि इसका मौसम पर भयावह प्रभाव पड़ेगा। न केवल बाढ़, सूखे और चक्रवातों की संख्या, बल्कि उनकी नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी बढ़ जाएगी।



काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट ऐंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के नए अध्ययन में सामने आया है कि भारत में करीब 66 फीसदी आबादी के सामने भीषण बाढ़ की चपेट में आने का जोखिम रहता है। इनमें से सिर्फ 33 प्रतिशत लोग ही बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणालियों (ईडब्ल्यूएस) के दायरे में आते हैं। इसलिए भारत को लगातार बढ़ते इन जलवायु खतरों की समय पर और सटीक चेतावनी उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में तत्काल निवेश करने और उन्हें विस्तार देने की जरूरत है। भारत में ईडब्ल्यूएस की क्षमता का दोहन करने के लिए ये पांच कदम उठाए जा सकते हैं-


पहला, ईडब्ल्यूएस को जलवायु संकट सहने की क्षमता विकसित करने के प्रयासों में अनिवार्य रूप से शामिल करना। मौसम की चरम घटनाओं का सामना करने में प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां सबसे आसान उपाय हैं। दूसरा, एक प्रभावी ईडब्ल्यूएस के निर्माण का पहला कदम है कि लोगों को समय पर और आपदा की सटीक पूर्व चेतावनियां मिल सकें। इसके लिए सरकारी एजेंसियों और शोध संस्थानों जैसे विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोगात्मक भागीदारी लाने की जरूरत है।

भारत में चक्रवात पूर्व चेतावनी प्रणालियों ने प्रभावित होने वाली 100 फीसदी आबादी तक चेतावनी भेजकर अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाई है। इन्हीं सहयोगात्मक प्रयासों के चलते देश में एक अत्याधुनिक चक्रवात पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित हुई है। ऐसी ही पहल राष्ट्रीय स्तर पर बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिए भी करनी चाहिए। तीसरा, नए प्लेटफॉर्म बनाने और प्रभावी रूप से आपदा के जोखिम घटाने, खास तौर पर दूर-दराज इलाकों में और अंतिम-व्यक्ति तक संपर्क स्थापित करने में निजी क्षेत्र की साझेदारी महत्वपूर्ण है।

चौथा, सामाजिक-आर्थिक विविधता वाले भारत में स्थानीय स्तर पर समाधानों का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। फोन और दूरसंचार तंत्र के माध्यम से प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की पहुंच और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने की जरूरत है। इसके लिए बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। और पांचवां, आपदा का जोखिम घटाने के लिए नागरिकों को जोड़ना। किसी भी आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली की सफलता विभिन्न समुदायों से उसके मजबूत संबंधों पर निर्भर करती है। इसे ध्यान में रखकर भारत सरकार ने गैर-सरकारी संगठनों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से एक व्यापक आउटरीच कार्यक्रम शुरू किया है।

प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का लाभ लेने के लिए भारत एक सक्रिय दृष्टिकोण अपना रहा है। यह जलवायु लचीलापन विकसित करने और अपने नागरिकों को चरम जलवायु घटनाओं के विनाशक प्रभावों से बचाने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पर्यावरण से जुड़ी अन्य चुनौतियों का समाधान करने और मौजूदा पहलों को विस्तार देने के लिए रणनीतिक निवेश के साथ स्थायी आधार पर प्रयास किया जाना बहुत आवश्यक है।
-लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट ऐंड वॉटर से संबद्ध।

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