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पर्यावरण: विकसित देशों की जिम्मेदारी, जीवाश्म ईंधन की लक्ष्य प्राप्ति के लिए देना होगा योगदान
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COP-28
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सोशल मीडिया
विस्तार
हाल ही में दुबई में संपन्न हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप 28) में दुनिया की ऊर्जा प्रणालियों से जीवाश्म ईंधन को न्यायसंगत एवं व्यवस्थित तरीके से बदलने का आह्वान किया गया, जिसे पहले के सम्मेलनों की तुलना में भारत की जीत बताया जा रहा है। कॉप 28 ने भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए बराबरी का अवसर प्रदान किया, जबकि ग्लासगो में आयोजित कॉप 26 की घोषणा में 'निरंतर कोयला बिजली की चरणबद्ध कमी' का आह्वान किया गया था, जो हमारी ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है। कॉप 26 में तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का उल्लेख नहीं किया गया था, जिसका इस्तेमाल अमेरिका सहित विकसित देश करते हैं।
'दुबई सर्वसम्मति' को ऐतिहासिक घटना करार दिया जा रहा है, जिस पर 200 देशों ने हस्ताक्षर किया है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह सफलता अल्पकालित हो सकती है, क्योंकि कोयला, तेल और गैस का उत्पादन निरंतर बढ़ रहा है और जीवाश्म ईंधन कंपनियां दशकों से उत्पादन बढ़ाने के लिए योजना बनाने पर काम कर रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, कई देश अब भी राजस्व और आर्थिक विकास के लिए पूरी तरह से जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं, जिससे रास्ता कठिन हो गया है, लेकिन जलवायु संकट से निपटने के लिए यह एक अच्छी शुरुआत है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की रणनीति और नीति दुबई घोषणा के अनुरूप है, जो कई देशों में नए और निरंतर कोयला उत्पादन की अनुमति देने की सीमाओं को विश्वसनीयता और दूरदर्शिता प्रदान करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलवायु कार्रवाई को एक सहयोगात्मक प्रक्रिया बनाने के अपने संकल्प का प्रदर्शन किया है, जो किसी को पीछे नहीं छोड़ती है और अंतिम लक्ष्य हासिल करने के लिए सभी देशों को साथ लेकर चलती है। भारत ने हरेक देश से दुबई सर्वसम्मति को अपनाने का आह्वान किया। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने जलवायु कार्रवाई के लिए जी-20 की अध्यक्षता के माध्यम से यह प्रदर्शित किया कि उसका संकल्प सामूहिक कार्रवाई के सिद्धांत पर आधारित है, जो हर देश की भागीदारी सुनिश्चित करता है।
कॉप 28 भारत के 'वसुधैव कुटुम्बकम' के दर्शन को प्रदर्शित करता है। भारत ने पहले ही 2070 तक कार्बन-तटस्थ बनने के अपने संकल्प को प्रदर्शित किया है, इसलिए 2030 से पहले कोयला आधारित बिजली स्टेशनों को पुन: अपनाने की उसकी कोई योजना नहीं है। भारत और चीन के महत्व और दबाब के कारण दुबई सर्वसम्मति के दस्तावेज से 'नए और निर्बाध कोयला आधारित बिजली उत्पादन की अनुमति को सीमित करने' के संदर्भ को हटा दिया गया, जो दोनों देशों के हित में है और दीर्घकालीन अर्थों में लाभप्रद है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि विकसित देशों को जीवाश्म ईंधन के लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से बनाए गए कोष में उदारतापूर्वक योगदान देना होगा, अन्यथा यह मृगतृष्णा बनकर रह जाएगा।
आलोचकों ने कॉप 28 समझौते पर आपत्ति जताई है, जिसमें भविष्य में कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को पाने के लिए सभी कारकों का व्यापक विवरण नहीं है। कई वैज्ञानिकों ने कार्बन कैप्चर पर चिंता जताई है, जो अब भी अप्रमाणित है। विश्लेषकों का मानना है कि कॉप 28 की सबसे बड़ी खामी जलवायु-प्रभावित देशों को पर्याप्त धन उपलब्ध कराने के प्रति विकसित देशों की प्रतिबद्धता और संकल्प की कमी है, ताकि वे अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने के अलावा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ने और जलवायु संकट के बढ़ते प्रभावों को अनुकूलित करने में सक्षम बन सकें और 2050 तक नेट जीरो लक्ष्य हासिल कर सकें। समझौते के अंतिम मसौदे में विकसित देशों द्वारा प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर देने की पहले जताई गई प्रतिबद्धता का जिक्र नहीं है, जो अब तक पूरा नहीं हुआ है। मात्र 47 करोड़ डॉलर की प्रतिबद्धता जताई गई है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है।
इस पृष्ठभूमि में जलवायु विशेषज्ञों एवं वैज्ञानिकों का मानना है कि विकासशील देशों के पास नए लक्ष्यों की तरफ बढ़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। ये देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और कमजोर आर्थिक स्थिति से संचालित होते हैं, इसलिए तेल, गैस और कोयला का इस्तेमाल होता रहेगा, हालांकि कॉप 28 भविष्य में जलवायु आपदा के गंभीर परिणामों को समझने का मार्ग सुझा सकता है।