{"_id":"66fca425386f49d89701caa7","slug":"basic-education-and-self-reliant-india-gandhiji-path-is-appropriate-even-today-2024-10-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"परिदृश्य: बुनियादी शिक्षा और आत्मनिर्भर भारत, आज भी समीचीन है गांधीजी की राह","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
परिदृश्य: बुनियादी शिक्षा और आत्मनिर्भर भारत, आज भी समीचीन है गांधीजी की राह
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी। फाइल फोटो
- फोटो :
अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
अपने समय में प्रचलित औपचारिक शिक्षा के बारे में गांधीजी की राय अच्छी नहीं थी। वह मानते थे कि ऐसी शिक्षा व्यक्ति को परिस्थितियों पर निर्भर बनाती है और उसे अनैतिक गतिविधियों में शामिल करती है, जो समाज कल्याण के अनुकूल नहीं है। गांधीजी स्वामी विवेकानंद की इस राय से सहमत थे कि शिक्षा मानव निर्मित होनी चाहिए, यांत्रिक नहीं। रवींद्रनाथ टैगोर का भी यही विचार था।
गांधीजी का मानना था कि शिक्षा से आत्मनिर्भरता की भावना पैदा होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने पढ़ाई को कमाई के साथ जोड़ा। वह चाहते थे कि शिक्षा के साथ-साथ हस्तकला को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस तरह उन्होंने बुनियादी शिक्षा की अवधारणा को व्यवसाय के साथ जोड़ा। उनका मानना था कि इससे छात्रों को रचनात्मक शिक्षा पाने में मदद मिलेगी। भारत सरकार ने इस नीति को स्वीकार किया और प्राथमिक स्तर पर बुनियादी शिक्षा की स्थापना की, जहां छात्रों को कुटीर उद्योग उत्पाद बनाने जैसी रचनात्मक गतिविधियों के जरिये सीखने के लिए प्रोत्साहित किया गया। महात्मा गांधी शायद एकमात्र विचारक हैं, जिन्होंने अपने शैक्षिक प्रतिमान को अपनी समग्र राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक योजना के हिस्से के रूप में देखा। उनका शैक्षिक मॉडल औपनिवेशिक शिक्षा को पूरी तरह से खत्म करने पर आधारित था। तुषार मुखर्जी लिखते हैं, 'गांधीजी की वैकल्पिक शिक्षा, जिसे 'बेसिक शिक्षा' या 'नई तालीम' के नाम से भी जाना जाता है, का मुख्य उद्देश्य स्कूली पाठ्यक्रम में सामाजिक रूप से उपयोगी हस्तकला को शामिल करना है।
आज जब देश को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की बात हो रही है, तब गांधीजी की बुनियादी शिक्षा की आवश्यकता और प्रासंगिकता समझी जा सकती है। बुनियादी शिक्षा की योजना भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक रूप से मजबूत और स्वीकार्य है, जहां दुनिया के कुल निरक्षर लोगों का एक बड़ा हिस्सा रहता है। यह सरकार को कम लागत के साथ प्राथमिक शिक्षा का विस्तार करने में भी मदद करती है। यह प्रणाली वर्ग और जाति भेद को दूर करने का भी दावा करती है, और इस तरह सामाजिक एकजुटता और राष्ट्रीय एकता में मदद करती है। बुनियादी शिक्षा शिक्षित और अशिक्षित, शारीरिक श्रम और बौद्धिक श्रम, अमीर और गरीब तथा गांव और शहर के बीच के अंतर को भी दूर करती है। बुनियादी शिक्षा हमेशा मातृभाषा पर आधारित होती है। बुनियादी शिक्षा को आधुनिक तर्ज पर सुधारने की आवश्यकता है और तब यह प्रारंभिक स्तर पर शिक्षण की सबसे दिलचस्प और उपयोगी तकनीक के रूप में काम कर सकती है।
(हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष)