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पड़ोस: बांग्लादेश में पस्त है विपक्ष, इसीलिए चुनावी मौसम में बेफिक्र हैं शेख हसीना

Wed, 27 Sep 2023 06:48 AM IST
Bimal Rai बिमल राय
Updated Wed, 27 Sep 2023 06:48 AM IST
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सार
जी-20 में भाग लेने आईं शेख हसीना के चेहरे पर कोई चुनावी तनाव नहीं था, तो इसकी एक वजह वहां का पंगु बना दिया गया विपक्ष है।
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bangladesh pm Sheikh Hasina looking confident for win in upcoming general election as opposition is crippled
शेख हसीना - फोटो : PTI

विस्तार

भारत की तरह बांग्लादेश में भी इस साल दिसंबर या अगले साल के प्रारंभ में आम चुनाव होंगे। भारत में विपक्ष कांग्रेस की अगुआई में ‘इंडिया’ गठबंधन बनाकर बैठकें कर रहा है और अपने अंतर्विरोधों की उलझी कड़ियां सुलझाते हुए नए उत्साह से आगे बढ़ रहा है, तो बांग्लादेश का विपक्ष अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं पर अत्याचार, गिरफ्तारियों, साल-दर-साल चल रहे मुकदमों के बोझ तले दबकर चीख रहा है। इस साल राष्ट्रीय स्तर पर दो बार विपक्ष के लाखों कैडरों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन व घेराव किया, पर हर बार पुलिस की कार्रवाई से उनके हौसले पस्त करने की कोशिश हुई है।



बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने पिछले चुनाव से पहले भी एक कार्यवाहक सरकार की देख-रेख में चुनाव की मांग रखी थी, पर 2011 में संविधान में संशोधन के बाद ऐसी सरकार गठित करने का प्रावधान ही खत्म कर दिया गया। अवामी लीग के महासचिव ओबैदुल कादर के मुताबिक, ‘विपक्ष पिछले ढाई साल से सड़क पर उतरकर देश की शांति और विकास की राह में रोड़े अटका रहा है, जबकि हमारी प्रधानमंत्री का एजेंडा देश में विकास, लोकतंत्र और अमन बरकरार रखना है।’


हालांकि खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी की संगठन सचिव और विदेश मामलों की प्रभारी शमा ओबेद इस्लाम रिंकू का कहना है, ‘सत्तारूढ़ सरकार विपक्ष का पिछले ढाई सालों से दमन कर रही है। हमारे आंदोलन को कुचलने के लिए हुई पुलिस कार्रवाई में पिछले साल के अंतिम तीन महीनों में ही बीएनपी के 14 कार्यकर्ता मारे गए थे।’

दो बार प्रधानमंत्री रह चुकीं खालिदा जिया को फरवरी 2018 में भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी ठहराया गया था। 2019 में उन्हें खराब सेहत के चलते रिहा किया गया, शर्त यह थी कि वह ढाका में अपने घर में रहेंगी और देश नहीं छोड़ेंगी। इस तरह, 76 वर्षीया जिया चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं ले सकतीं। बीएनपी की प्रमुख जिया और उनके बेटे व बीएनपी के कार्यवाहक प्रमुख तारिक रहमान, जो फिलहाल लंदन में रहते हैं, के खिलाफ मामलों को वापस लेना है। उन्हें 2004 में हसीना पर हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

2018 के चुनाव से पहले बीएनपी के बाद जमात-ए-इस्लामी का पंजीकरण रद्द कर दिया गया। अब यह 'बांग्लादेश डेवलपमेंट पार्टी' के नाम से चुनाव में उतरने की तैयारी में है। हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस के 14 सदस्यों ने बांग्लादेश में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए लिखा था, पर बांग्लादेशी सरकार ने साफ कहा कि अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देश उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

न्यायपालिका पर सरकार का शिकंजा पूरी तरह कसा हुआ है, इसमें कोई शक नहीं। 17 जनवरी, 2015 से 11 नवंबर, 2017 तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति सुरेंद्र कुमार सिन्हा के प्रकरण में जो हुआ, उससे एक तरह से सरकार के चेहरे से मुखौटा हट गया। मनी लॉन्ड्रिंग और ब्रीच ऑफ ट्रस्ट के मामलों में फंसाए गए जज सिन्हा पद पर रहते हुए पहले कनाडा गए और अभी वह अमेरिका में शरण लिए हुए हैं। नवंबर, 2021 में ढाका की एक विशेष अदालत ने उन्हें 11 साल जेल की सजा सुनाई।

विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना मोटे तौर पर बांग्लादेश को एक दलीय राज्य में बदलना चाहती हैं। अपने 14 वर्षों के कार्यकाल में  हसीना ने पुलिस, सेना और अदालतों सहित बांग्लादेश की अधिकतर संस्थाओं में अपने वफादारों को भर दिया है। 1974 में भयानक अकाल के बाद 16.6 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाला बांग्लादेश खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है। कपड़ा निर्यात व विदेशी निवेश बढ़ने से बेरोजगारी भी काफी हद तक घटी है।

हाल ही में जी-20 सम्मेलन में आमंत्रित शेख हसीना के चेहरे पर आगामी चुनावों का कोई तनाव नहीं दिखा। भारत मन ही मन चाहता है कि इस बार भी हसीना ही जीतें, क्योंकि उसका मकसद भी चीनी दबदबे से बांग्लादेश को बचाए रखना है। मानवाधिकारों व लोकतंत्र की दुहाई देकर अमेरिकी प्रशासन भी जब-तब उपदेश देता रहता है, पर चीन उसकी आंखों में भी खटकता है। तमाम तरह के अत्याचारों के बावजूद बांग्लादेश का हिंदू समुदाय भी हसीना का ही वोटर है। उनकी जीत की कामना हमारा स्वार्थ है, पर वहां लोकतंत्र की बदहाली और जंजीरों में जकड़ी न्यायपालिका की तस्वीर खटकती है।

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