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बदहाल खेती, हताश किसान

ज्ञान प्रकाश पिलानिया Updated Mon, 30 Jul 2018 05:50 PM IST
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ज्ञान प्रकाश पिलानिया
ज्ञान प्रकाश पिलानिया
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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कृषि को देश की आत्मा मानते हुए हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘सब कुछ इंतजार कर सकता है, मगर खेती नहीं।' उसके बाद से आने वाली तमाम सरकारें कृषि को प्राथमिकता देने की बात करती आई हैं।
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वर्ष 2004 में यूपीए सरकार ने किसानों के हितों को ध्यान में रखकर प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय कृषि आयोग का गठन किया था, जिसने कई अहम सिफारिशें कीं, जिन पर अब तक अमल नहीं किया गया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश थी, किसान को उसके उत्पाद का ‘लाभकारी मूल्य’ मिलना चाहिए, अर्थात कुल लागत का डेढ़ गुना। उन्होंने फसल की लागत, किसान की मजदूरी और लाभ को ध्यान में रखकर कीमत निर्धारित करने की आवश्यकता बताई थी। मगर स्वामीनाथन आयोग की इस चेतावनी को भुला दिया गया कि समग्र आर्थिक विकास का तब तक कोई अर्थ नहीं, जब तब तक कि कृषि पर निर्भर 60 फीसदी लोगों की आजीविका पर ध्यान नहीं दिया जाता।


केंद्र सरकार हर साल दो दर्जन फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। स्वामीनाथन ने सुझाया था कि फसल की लागत में किसान द्वारा बीज, खाद, कीटनाशक, जुताई, सिंचाई पर होने वाले खर्च के साथ ही किसान और उसके परिवार का श्रम तथा जमीन में किसान द्वारा लगाई गई पूंजी को शामिल किया जाना चाहिए। मगर सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी पर मंडी में भी खरीद नहीं होती। यही वजह है कि किसान कर्जदार हो रहे हैं और उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ता है। किसानों को वास्तविक लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दिया जाना चाहिए, जो अभी नहीं मिल रहा है।
 
किसानों की बदहाली दिखाने वाले आंकड़े भी दृष्टव्य हैं। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत है। 90 प्रतिशत लघु किसान हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर तक भूमि है। 45 प्रतिशत सिंचित और 55 प्रतिशत गैर सिंचित भूमि है। 55 प्रतिशत जमीन मानसून पर निर्भर है। किसानों की औसत मासिक आय 6,400 रुपये होती है, जिसमें 3,080 रुपये कृषि से और 3,320 रुपये पशुपालन जैसे गैर कृषि कार्य से मिलते हैं। वहीं 2016-17 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि संबंधी उद्योगों पर कुल 12.6 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। औसतन प्रति किसान पचास हजार रुपये का कर्ज है। वास्तव में कृषि घाटे का धंधा बन गई है, इसलिए हर साल चार से पांच लाख किसान कृषि छोड़कर किसी और रोजगार की तलाश कर रहे हैं।

कृषि क्षेत्र में ऐसी हताशा गहरी चिंता का कारण है। कृषि के मामले में विकसित माने जाने वाले पंजाब जैसे राज्य के बारे में तीन सरकारी यूनिवर्सिटी- पंजाबी यूनिवर्सिटी (पटियाला), गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (अमृतसर) और पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (लुधियाना) के हाल के एक सर्वे ने खुलासा किया कि वहां 2000 से 2007 के दौरान 16,000 किसानों ने खुदकुशी कर ली। गैर-सरकारी अनुमानों के मुताबिक, देश में रोजाना 30 से 35 किसान खुदकुशी करते हैं। स्वामीनाथन आयोग ने कहा है कि हमें कृषि के पतन पर मूक दर्शक नहीं रहना चाहिए। किसान की अंतहीन व्यथा-कथा को मुखरित करने के लिए ही अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के नेतृत्व में हाल ही में देश के 130 किसान संगठन गांव बंद हड़ताल कर चुके हैं। सरकार किसान के सब्र का इम्तहान न ले। ऐसा लग रहा है कि रोम जल रहा है और नीरो बांसुरी बजा रहा है।
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