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अतीत को पीछे छोड़ने वाला फैसला, कानून की पेचीदगियों पर प्रकाश डाल रहे हैं विराग गुप्ता

virag gupta विराग गुप्ता
Updated Thu, 01 Oct 2020 02:25 AM IST
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बाबरी केस
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राम मंदिर मामले में भूमि विवाद यानी सिविल मुकदमों का निपटारा होने में लगभग 70 साल लग गए। बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराए जाने के बाद अनेक एफआईआर के साथ न्यायिक आयोग का गठन हुआ था। उन आपराधिक यानी क्रिमिनल मामलों में जिला अदालत का फैसला आने में लगभग 28 वर्ष लग गए। विशेष अदालत के 2,300 पेज के फैसले का लब्बोलुआब यह है कि अभियोजन पक्ष यानी सीबीआई की तरफ से पेश किए गए साक्ष्य दोषपूर्ण थे।
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ढांचा तोड़ने वाले और आरोपियों के बीच सीधा संबंध प्रमाणित नहीं होने पर कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। बाल ठाकरे, गिरिराज किशोर, अशोक सिंघल और महंत अवैद्यनाथ जैसे बड़े नेता और सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाले हाजी महमूद अहमद तीन दशक से चल रही मुकदमेबाजी के दौरान इस दुनिया से रुखसत भी हो गए। राष्ट्रीय महत्व और भगवान से जुड़े मामलों में जब इतना ज्यादा विलंब हो रहा है, तब आम जनता के मुकदमों में भगवान भी कैसे मदद कर सकते हैं?


कई सालों तक यह मुकदमा कानूनी दांव-पेच और तकनीकी कारणों में फंसा रहा। सीबीआई की चार्जशीट में हजारों लोगों की अज्ञात भीड़ का जिक्र है, जिन्हें अब अराजक तत्व बताया जा रहा है। सीबीआई ने 1,026 गवाहों को नामजद किया था, जिसमें कई पुलिस वाले और पत्रकार भी थे। अंततोगत्वा इस मामले में लगभग 350  गवाह ही अदालत के सामने पेश हुए। सीबीआई ने आपराधिक साजिश को साबित करने के लिए अनेक मौखिक सबूत भी पेश किए, जिन्हें अदालत ने नकार दिया।

विवादित ढांचा गिराए जाने के 10 दिन बाद केंद्र सरकार ने पूर्व जज लिब्रहान का एक सदस्यीय आयोग का गठन किया था। लिब्रहान आयोग को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन जांच पूरी होने में उन्होंने 17 साल लगा दिए। इस काम के लिए सरकार ने आयोग को 48 बार विस्तार दिया। जांच रिपोर्ट सौंपने के 10 साल बाद लिब्रहान ने एक इंटरव्यू में कहा कि जांच आयोग को राजनीतिक कारणों से गठित किया गया था।

लिब्राहन ने यह भी कहा कि उन्हें शुरू से ही पता था कि एक दिन अयोध्या में राम मंदिर बनकर रहेगा। इतनी सब जानकारी के बावजूद जस्टिस लिब्रहान ने भारी-भरकम जांच रिपोर्ट बनाने में सरकारी खजाने के आठ से दस करोड़ रुपये खर्च करवा दिए और उनकी रिपोर्ट का इस मुकदमे में इस्तेमाल भी नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की बेंच ने पिछले साल नवंबर में राम मंदिर के पक्ष में सर्वसम्मत फैसला देते हुए विवादित ढांचे के एवज में पांच एकड़ की वैकल्पिक भूमि देने का आदेश दिया था। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद, दोनों का मसला जब देश की सर्वोच्च अदालत ने सुलझा दिया, उसके बाद विवादित ढांचे को गिराए जाने के आपराधिक मुकदमों को जारी रखने का क्या तुक था?

लिब्रहान की तरह जनता, वकील, जज और नेता सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि इस मामले में किसी को भी दंड और सजा नहीं होगी, तो फिर बेवजह की मुकदमेबाजी जारी रखने का क्या तुक था? संसद के कानून के बावजूद अब मथुरा और काशी में भी मंदिर आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। इस तरह की बेवजह की मुकदमेबाजी से सरकारी खजाने पर बोझ के साथ आम जनता से जुड़े करोड़ों मुकदमों में विलंब भी बढ़ जाता है।

कोरोना और लॉकडाउन की वजह से अदालतों में डिजिटल माध्यम से मुकदमों की सुनवाई हो रही है, जहां पर मुलजिम और गवाहों की उपस्थिति माफ है। लेकिन अयोध्या मामले में सीबीआई जज को हाजिरी माफी की दर्जनों याचिकाओं के निपटारे में ही खासा वक्त बर्बाद करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 से हासिल असाधारण शक्तियों के तहत लखनऊ के सीबीआई जज को रिटायरमेंट के बाद भी सेवा विस्तार दे दिया। इसी असाधारण शक्ति के तहत पिछले साल पांच जजों की संविधान पीठ ने विवादित ढांचे के लिए पांच एकड़ भूमि देने का आदेश दिया था। इन मामलों में बेवजह की अपील होने पर अयोध्या कांड के तार्किक अंत के लिए पांच जजों के फैसले के अनुरूप सुप्रीम कोर्ट को जरूरी आदेश पारित करने पर विचार करना चाहिए।

सुशांत सिंह, रिया चक्रवर्ती और दिल्ली दंगों जैसे नए जमाने के मुकदमों में डिजिटल साक्ष्यों का बहुत महत्व है। सीबीआई, पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को अयोध्या के इस फैसले से कई सबक लेने की जरूरत है। सीबीआई ने 32 आरोपियों के खिलाफ साजिश के अनेक सबूत पेश किए, जिन्हें जज ने नाकाफी माना।

सीबीआई की चार्टशीट में पेश अनेक तस्वीरों के निगेटिव कोर्ट को मुहैया नहीं कराए गए, इसलिए उन फोटो को प्रमाणिक सबूत नहीं माना गया। अनेक वीएचएस वीडियो कैसेट भी सबूत के तौर पर पेश किए गए थे, लेकिन सीबीआई के पास कैसेट दिखाने के लिए कोर्ट में उपकरण भी नहीं थे। सीबीआई का कहना था कि दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र के टेक्नीकल स्टाफ ही इस कैसेट को चला सकते हैं।

अदालत के अनुसार, ऑडियो और वीडियो टेप के साथ छेड़छाड़ की गई थी। कोर्ट के अनुसार, कैसेट्स को सही तरीके से सील नहीं किया गया था और टेम्पर्ड होने की वजह से उन्हें भरोसा करने लायक सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार अखबारों में छपी खबरों को प्रामाणिक सुबूत नहीं माना जा सकता। अब ट्वीटस और खबरों के आधार पर रोजाना मुकदमेबाजी बढ़ रही है। पुराने कानून और पुलिस सिस्टम से हुई जांच में गुनाह कैसे साबित होगा?

इस फैसले से अदालती व्यवस्था के साथ नौकरशाही, सीबीआई और जांच आयोगों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। वैश्विक लॉकडाउन के नए दौर में रोजगार बढ़ाने के लिए उदारीकरण के साथ जटिल और ढुलमुल सिस्टम को दुरुस्त करने की जरूरत है। दीवानी और फौजदारी कानूनों की विसंगतियों और अदालती सुस्ती को दूर करने के लिए देशव्यापी अभियान चलाया जाए, तभी डिजिटल इंडिया में जनता को जल्द न्याय मिलेगा। (-लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील और अयोध्याज राम टेम्पल इन कोर्टस पुस्तक के लेखक हैं।)

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