हमारी बचत पर डाका डालने की तैयारी

अश्विनी महाजन Updated Mon, 29 Oct 2012 11:36 AM IST
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बीते कुछ समय से केंद्र सरकार ऐसे कई नीतिगत फैसले कर रही है, जिन पर आम सहमति नहीं है। खुदरा में विदेशी पूंजी के निर्णय ने तो देश में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल खड़ा कर ही दिया था, पेंशन फंडों और बीमा में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर देना भी कुछ ऐसा ही मामला है, जिसे पिछले दिनों केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दी है। इस फैसले से भी देश के अधिकांश राजनीतिक दल नाराज हैं। सरकार हालांकि इस मामले में भाजपा का समर्थन लेना चाहती है, पर प्रमुख विपक्षी पार्टी में इस मुद्दे पर एक राय नहीं है।

वर्ष 2001 में राजग सरकार के समय बीमा क्षेत्र में 26 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दी गई थी। इस का परिणाम यह निकला कि कई विदेशी बीमा कंपनियों ने भारतीय बैंकों और बीमा कंपनियों के साथ मिलकर बीमा क्षेत्र में प्रवेश किया।

वर्ष 2011-12 तक कुल जीवन बीमा व्यापार में निजी क्षेत्र के संयुक्त उपक्रमों/कंपनियों का हिस्सा 30 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। 26 प्रतिशत की सीमा में रहते हुए विदेशी निवेशक अपने साझेदारी के उपक्रमों अथवा कंपनियों के निर्णयों में बड़ी भागीदारी नहीं निभा सकते थे। अब उनका हिस्सा 49 प्रतिशत होने पर अपने उपक्रमों में उनका प्रभाव बढ़ जाएगा।

इसी तरह अभी तक बीमा कंपनियों तथा बैंकों द्वारा स्थापित पेंशन फंड ही पेंशन उत्पाद बेच सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति निजी पेंशन फंड में निवेश करना चाहता है, तो उसे बीमा कंपनियों तथा बैंकों द्वारा स्थापित पेंशन फंडों में ही निवेश करना होगा।

इसमें विदेशी निवेश की अनुमति का मतलब है कि अब विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर पेंशन के क्षेत्र में प्रवेश करेंगी। केंद्र सरकार का कहना है कि  अब बीमा और पेंशन फंडों के बाजार में नए-नए उत्पाद शामिल हो जाएंगे, जिनमें से लोगों को अपने लिए उपयोगी उत्पाद खरीदना ज्यादा आसान हो जाएगा।

विदेशी कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ने से पेंशन और बीमा में संकलित कोषों को खुले तौर पर शेयर बाजारों में लगाने का रास्ता खुल जाएगा। देश की अधिकतर बचत बैंकों, बीमा एवं पेंशन, डाकघर बचत योजनाओं आदि में लगाई जाती है।

जब यूरोप और अमेरिका की बीमा कंपनियां और पेंशन फंड अपनी विनाशकारी नीतियों के कारण डूब रहे थे, तब भी हमारे बैंक और बीमा कंपनियां भारी लाभ में चल रही थीं। पर अब भारतीय वित्त बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोलने से वैश्विक उथल-पुथल के सीधे असर का रास्ता भी खुल जाएगा।

दरअसल बहुराष्ट्रीय वित्तीय कंपनियों के वैश्विक पेंशन फंडों के लाभ अब दो प्रतिशत के आसपास सिमट गए हैं, इसलिए वे अपना लाभ बढ़ाने हेतु निवेश के नए चरागाहों की तलाश में हैं। मसलन, जेपी मॉर्गन ने पेंशन फंडों को सलाह दी है कि वे अपने निवेश को भारत के रियल इस्टेट, कृषि भूमि आदि में लगाएं।

बरबादी के कगार पर खड़ा अमेरिका और पश्चिमी देशों का वित्तीय तंत्र भारत में घुसने की कोशिश में है, और हमारी सरकार अपने नुकसान से बेपरवाह होकर उन्हें रास्ता दे रही है। जाहिर है, बीमा और पेंशन फंडों को विदेशी निवेश हेतु खोलने के घातक परिणाम होंगे।

पेंशन फंडों और बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश का प्रभाव यह होगा कि इनका धन पहले से कहीं ज्यादा मात्रा में शेयर बाजारों में लगने लगेगा। इससे वे लोग भी असुरक्षित हो जाएंगे, जो पेंशन फंडों में धन लगाकर अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं। शेयर बाजारों में पेंशन फंड लगाने का अमेरिकी मॉडल विनाशकारी सिद्ध हुआ है।

ऐसे में सरकार द्वारा लाए गए पेंशन और बीमा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्तावों के चलते देश के वित्तीय तंत्र में अनिश्चिता बढ़ेगी। यानी आम आदमी का जो पैसा अभी तक काफी सुरक्षित रहता था, वह असुरक्षित और अनिश्चित हो जाएगा। आर्थिक सुधार की दिशा में सरपट भागने को तैयार सरकार को आम लोगों की आर्थिक सुरक्षा की चिंता तो नहीं ही है, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी इन फैसलों का कोई व्यापक विरोध नहीं हो रहा, जो ज्यादा खतरनाक है।

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