समाधान : अक्षय ऊर्जा अपनाना समय की मांग, यही है भविष्य का इकलौता विकल्प
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विस्तार
पिछले चार-पांच दशकों में विश्व की बढ़ती हुई आबादी के लिए ऊर्जा की मांग काफी तेजी से बढ़ रही है। इस मांग को नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। अब नवीकरणीय ऊर्जा ही भविष्य का इकलौता विकल्प रह गया है, क्योंकि यही कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करके पर्यावरण की सुरक्षा करने में मददगार है। नवीकरणीय ऊर्जा विकल्प प्रचुर मात्रा में सरलता से उपलब्ध हैं। इन पर किसी भी देश का एकाधिकार नहीं होता है। इस कारण इनकी आपूर्ति आसानी से की जा सकती है। वर्ष 2004 में केंद्र सरकार ने तय किया था कि 20 अगस्त को अक्षय ऊर्जा दिवस के तौर पर मनाया जाएगा, ताकि अक्षय ऊर्जा या नवीकरणीय ऊर्जा के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। पिछले कई दशकों से हम जिन ऊर्जा स्रोतों का जीवाश्म ईंधन के रूप में उपयोग करते आ रहे हैं, वे सीमित हैं। निरंतर दोहन के कारण उनका भंडार कम होता जा रहा है। दूसरी बात है कि जीवाश्म ईंधन प्रदूषणकारी भी हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने 2030 के अंत तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें पवन ऊर्जा से 140 गीगावाट, सौर ऊर्जा से 280 गीगावाट, बायोमास ऊर्जा और लघु जलविद्युत परियोजनाओं से 80 गीगावाट ऊर्जा हासिल करने का लक्ष्य शामिल है।
सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई नए कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, जैसे राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन, जिसका लक्ष्य अनुसंधान एवं विकास और कच्चे माल तथा उत्पादों के घरेलू उत्पादन से देश में सौर ऊर्जा उपयोग की लागत को कम करना है। केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन भी किया गया है। पेरिस में 30 नवंबर, 2015 को संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन के दौरान भारत और फ्रांस ने इसकी संयुक्त शुरुआत की थी। कर्क और मकर रेखा के बीच आंशिक या पूर्ण रूप से बसे हुए 122 सौर संसाधन संपन्न देशों के इस गठबंधन का मुख्यालय हरियाणा के गुरुग्राम में है। इस फ्रेमवर्क में वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत व स्वच्छ जैव-ईंधन प्रौद्योगिकी के लिए शोध में निवेश को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
साफ धूप वाले दिनों में सौर ऊर्जा का औसत पांच किलोवाट घंटा प्रति वर्गमीटर होता है। एक मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिए लगभग तीन हेक्टेयर समतल भूमि की आवश्यकता होती है। उष्ण-कटिबंधीय देश होने के कारण हमारे यहां वर्ष भर में सूर्य का प्रकाश लगभग 3,000 घंटे तक मिलता है। सौर ऊर्जा उत्पादन में सबसे ज्यादा योगदान रूफटॉप सौर उर्जा और सोलर पार्क का है। यह देश में बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता का 16 प्रतिशत है। सरकार का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 60 प्रतिशत करना है।
एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2035 तक देश में सौर ऊर्जा की मांग सात गुना तक बढ़ने की संभावना है। सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने से जीडीपी दर भी बढ़ेगी। हमारे देश ने संकल्प लिया है कि वर्ष 2030 तक बिजली उत्पादन की हमारी 40 फीसदी स्थापित क्षमता ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों पर आधारित होगी। राष्ट्रीय पवन-सौर स्वच्छता नीति-2018 के अनुसार, पवन-सौर ऊर्जा उत्पादन के वर्तमान लक्ष्य 80 गीगावाट को वर्ष 2022 तक दोगुने से भी ज्यादा अर्थात 225 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
सरकार द्वारा ग्रिड से जुड़े हुए रूफटॉप और छोटे सौर ऊर्जा संयंत्र कार्यक्रमों का भी क्रियान्वयन किया जा रहा है, जिनके तहत अलग-अलग क्षेत्रों में 2100 मेगावाट की क्षमता स्थापित की जा रही है। इस कार्यक्रम में सामान्य श्रेणी वाले राज्यों में लागत के 30 प्रतिशत तक और विशेष श्रेणी वाले राज्यों में लागत के 70 प्रतिशत तक केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता मुहैया कराई जा रही है।
हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में कई चुनौतियां भी हैं। लोगों में नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर जागरूकता का अभाव है, जिससे उपलब्ध क्षमता के बावजूद भी नवीकरणीय ऊर्जा का दोहन काफी कम है। साथ ही कुशल मानव संसाधनों का भी अभाव है। भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बुनियादी ढांचा मजबूत करने की जरूरत है। इसके साथ ही ऊर्जा के नए स्रोत तलाशना भी जरूरी है। सौर ऊर्जा के साथ साथ समुद्र तटीय क्षेत्रों में पवन और जल ऊर्जा से बिजली पैदा करके ऊर्जा जरूरत को पूरा किया जा सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करने से वायु प्रदूषण भी कम किया जा सकता है।